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“सिद्धार्थनगर में स्वास्थ्य सेवाओं का माखौल: मौत के बाद भी नहीं बंद हुआ अवैध केंद्र।”

"10 महीने पहले गई जान, फिर भी अवैध अस्पताल पर मेहरबान प्रशासन!"

अजीत मिश्रा (खोजी)

सिद्धार्थनगर: क्या स्वास्थ्य विभाग की मेहरबानी से चल रहा है ‘मौत का खेल’?

बस्ती मंडल , उत्तर प्रदेश।

सिद्धार्थनगर के इटवा में जो हो रहा है, वह न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि आम आदमी की जान के साथ एक क्रूर मजाक भी है। 10 महीने पहले एक जच्चा-बच्चा की जान लेने वाला केंद्र आज भी उसी जगह, उसी शान से बिना किसी वैध रजिस्ट्रेशन के संचालित हो रहा है। यह सवाल किसी एक अस्पताल का नहीं, बल्कि हमारी उस व्यवस्था का है जो प्रभावशाली लोगों के दबाव में आकर मौन साधे बैठी है।

📢साख पर सवाल, जवाब नदारद

खबरों के अनुसार, यह केंद्र स्वास्थ्य विभाग के किसी भी मानक को पूरा नहीं करता। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि 10 महीने पहले इस केंद्र में एक गंभीर हादसा हो चुका है और उस पर हंगामा भी बरपा था, तो आखिर किसकी अनुमति या अनदेखी से इसे दोबारा संचालित होने दिया गया? क्या एक जान की कीमत हमारे प्रशासन के लिए इतनी कम है कि उसे चंद रसूखदारों के हस्तक्षेप से ‘रफा-दफा’ कर दिया जाए?

📢अधिकारी का बयान या खानापूर्ति?

जब सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अधीक्षक से इस बाबत सवाल किया गया, तो उनका जवाब किसी को भी संतुष्ट करने के लिए काफी नहीं है। ‘मामला संज्ञान में है’ और ‘जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी’—ये जुमले सुनते-सुनते जनता अब थक चुकी है। सवाल यह है कि कार्रवाई होने में देरी क्यों हो रही है? क्या किसी और मासूम की जान जाने का इंतजार किया जा रहा है?

📢जवाबदेही किसकी?

अगर भविष्य में कोई अनहोनी होती है, तो इसकी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या स्वास्थ्य विभाग तब भी यही कहेगा कि मामला ‘संज्ञान’ में था? जब अस्पताल का संचालन बिना वैध रजिस्ट्रेशन के हो रहा है, तो तत्काल प्रभाव से इसे सील करने में प्रशासन को कौन सी शक्ति रोक रही है?

सिद्धार्थनगर की जनता अब केवल आश्वासन नहीं, ठोस कार्रवाई चाहती है। यह समय चुप बैठने का नहीं, बल्कि इस ‘अवैध खेल’ को जड़ से खत्म करने का है। यदि प्रशासन आज नहीं जागा, तो कल का इतिहास उन्हें माफ नहीं करेगा।

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