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“उत्तरपुस्तिका में इतिहास की हत्या?” — इंटरमीडिएट परीक्षा की कॉपी ने खोली शिक्षा व्यवस्था की भयावह सच्चाई!

यह मामला शिक्षा में बढ़ती लापरवाही, अनुशासनहीनता और शॉर्टकट संस्कृति का परिणाम है।

🚨 “उत्तरपुस्तिका में इतिहास की हत्या?” — इंटरमीडिएट परीक्षा की कॉपी ने खोली शिक्षा व्यवस्था की भयावह सच्चाई! 🚨

शिक्षा की गिरती साख का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। इंटरमीडिएट परीक्षा की एक उत्तरपुस्तिका ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इतिहास के प्रश्न के उत्तर में छात्र ने लिखा — “बाबर का बाप शिवाजी।” इतना ही नहीं, कॉपी के बीच में सौ रुपये का नोट दबा हुआ मिला और अंतिम पन्नों पर रील्स की भाषा, फूहड़ टिप्पणियाँ और अशोभनीय शब्द लिखे पाए गए। यह घटना केवल एक विद्यार्थी की गलती नहीं, बल्कि उस व्यापक शैक्षिक संकट की ओर इशारा करती है जो धीरे-धीरे हमारी शिक्षा की नींव को कमजोर कर रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला शिक्षा में बढ़ती लापरवाही, अनुशासनहीनता और शॉर्टकट संस्कृति का परिणाम है। जब उत्तरपुस्तिका में नोट रखकर अंक पाने की उम्मीद की जाती है, तो यह परीक्षा प्रणाली की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। वहीं इतिहास जैसे महत्वपूर्ण विषय में बुनियादी तथ्यों की गलत प्रस्तुति यह दर्शाती है कि विद्यार्थियों तक सही और प्रमाणिक ज्ञान नहीं पहुँच पा रहा है।

आज विद्यालयों में गहन अध्ययन और विचार-विमर्श की परंपरा कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। पुस्तकालयों की जगह सोशल मीडिया ने ले ली है। अधूरी और भ्रामक जानकारियाँ तेज़ी से फैल रही हैं। “व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय” जैसी प्रवृत्तियाँ विद्यार्थियों की सोच को प्रभावित कर रही हैं, जहाँ तथ्यों से अधिक वायरल कथाओं पर भरोसा किया जा रहा है। इसका सीधा असर उनकी उत्तरपुस्तिकाओं और बौद्धिक क्षमता पर दिखाई देने लगा है।

शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि तर्कशील और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है। यदि उत्तरपुस्तिका में फूहड़ टिप्पणियाँ और असंगत सामग्री लिखी जा रही है, तो यह अनुशासन और मूल्य-आधारित शिक्षा की कमी को दर्शाता है। यह स्थिति आने वाले समय के लिए खतरे की घंटी है।

समाज और प्रशासन दोनों के लिए यह आत्ममंथन का समय है। आवश्यक है कि विद्यालयों में पढ़ाई का माहौल सुदृढ़ किया जाए, शिक्षकों को संसाधन और प्रशिक्षण दिए जाएँ, तथा विद्यार्थियों में अध्ययन के प्रति गंभीरता विकसित की जाए। अभिभावकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है — उन्हें बच्चों को डिजिटल अराजकता से बचाकर सही दिशा देनी होगी।

यह सिर्फ एक कॉपी की कहानी नहीं है; यह भविष्य की दिशा का प्रश्न है। यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ इतिहास और ज्ञान की जगह भ्रम और लापरवाही को आगे बढ़ाएँगी। शिक्षा को मज़ाक बनने से बचाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।


संपादक – एलिक सिंह
वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़
ब्यूरो प्रमुख – हलचल इंडिया न्यूज़, सहारनपुर

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