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गायघाट का ‘चालक’ बना भ्रष्टाचार का ‘पायलट’: विकास के नाम पर 23 करोड़ की ‘लैंडिंग’ अपनी जेब में!

कागजों पर पैदा किए 'मुर्दे': आबादी बढ़ाकर करोड़ों डकार गई गायघाट नगर पंचायत।

 🚨   ‘गायघाट’ का खेल: विकास की फाइलों में भ्रष्टाचार का दीमक🚨

⭐शतरंज की ऐसी चाल… कि बड़े-बड़े धुरंधर चित! ‘नेताजी’ के पूर्व चालक का भ्रष्टाचार वाला ‘मास्टरस्ट्रोक’।

⭐आबादी 10 हजार, बजट 25 हजार का: गायघाट में सरकारी खजाने पर डाके का ‘नया फॉर्मूला’।

⭐15 से 30 फ़ीसदी कमीशन का ‘फिक्स्ड रेट’: नगर पंचायत में विकास कम, बंदरबांट ज्यादा।

⭐सफेदपोशों का संरक्षण और करोड़ों का गबन: क्या ‘गायघाट’ के इस खेल की होगी उच्चस्तरीय जाँच?

बस्ती मंडल ब्यूरो, उत्तर प्रदेश।IMG 20260322 WA0015

बस्ती। लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई ‘पंचायत’ को ग्रामीण विकास की धुरी माना जाता है, लेकिन बस्ती जिले की नगर पंचायत गायघाट से जो खबरें निकलकर आ रही हैं, वे इस व्यवस्था के चेहरे पर कालिख पोतने वाली हैं। कभी एक ‘नेताजी’ की गाड़ी दौड़ाने वाले चालक ने आज भ्रष्टाचार की ऐसी ‘स्पीड’ पकड़ी है कि बड़े-बड़े महारथी भी पीछे छूट गए हैं। यह लेख उस तंत्र की पड़ताल करता है जहाँ कागजों पर इंसान बढ़ाए जाते हैं ताकि खजाने से करोड़ों उड़ाए जा सकें।

💫आंकड़ों की बाजीगरी: जहाँ रातों-रात बढ़ गई ‘आबादी’

गायघाट नगर पंचायत में भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा हथियार बनी है—जनसंख्या। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जिस नगर पंचायत की वास्तविक जनसंख्या मुश्किल से 10,000 के आसपास होनी चाहिए थी, उसे कागजों पर 25,000 के करीब दिखा दिया गया।

👉तर्क और तथ्य: नियमानुसार, राजस्व गांवों की जो संख्या और वहां की बसावट है, उसके आधार पर जनसंख्या का इतना बड़ा उछाल नामुमकिन है।

👉फायदा: जनसंख्या जितनी अधिक दिखाई जाएगी, शासन से ’15वां वित्त आयोग’ और राज्य वित्त आयोग का बजट उतना ही भारी-भरकम आएगा।

👉नतीजा: गायघाट को हर महीने लगभग 49 लाख रुपये से अधिक का बजट मिल रहा है, जो जिले की बड़ी नगर पंचायतों (जैसे कप्तानगंज) से भी कहीं ज्यादा है।

💫कमीशनखोरी का ‘शतरंज’: 15 से 30 प्रतिशत का खेल

अखबार की रिपोर्ट चौंकाने वाला खुलासा करती है कि नगर पंचायतों में विकास कार्यों के नाम पर आने वाले बजट का 15% से 30% हिस्सा सीधे तौर पर कमीशन की भेंट चढ़ जाता है।

“अगर कोई चेयरमैन अपनी कुर्सी छोड़ता है, तो उसकी जेब में शुद्ध रूप से करोड़ों की मलाई पहुंच चुकी होती है। फर्जी काम और फर्जी भुगतान के मामलों में तो यह कमीशन 50% के पार चला जाता है।”

गायघाट के मामले में आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में जनसंख्या में धोखाधड़ी करके शासन से लगभग 23 करोड़ 40 लाख रुपये का अतिरिक्त बजट डकारा गया है। सवाल यह है कि जब वास्तविक जरूरत मात्र 10 लाख प्रति माह की है, तो 49 लाख का बजट कहाँ और किसकी जेब में खप रहा है?

💫’चेयरमैन’ और ‘साहब’ की जुगलबंदी

नगर पंचायत में भ्रष्टाचार अकेले नहीं होता। यह ‘चेयरमैन’ और ‘ईओ’ (अधिशासी अधिकारी) के संयुक्त हस्ताक्षरों का खेल है। हैरानी की बात यह है कि जिले के डीएसटीओ (District Statistics Officer) कार्यालय ने इन बढ़ी हुई जनसंख्या के आंकड़ों का सत्यापन कैसे कर दिया?

💫क्या अधिकारियों की आंखों पर पट्टी बंधी थी?या फिर सत्ता के गलियारों से आने वाले दबाव ने उनकी कलम को सच लिखने से रोक दिया?

हर साल ऑडिट होता है, हर साल आय-व्यय का हिसाब भेजा जाता है, फिर भी इतना बड़ा घोटाला जिला प्रशासन की नाक के नीचे फलता-फूलता रहा।

💫राजनीतिक संरक्षण और जमीनी हकीकत

गायघाट की इस स्थिति के पीछे स्थानीय राजनीति का भी बड़ा हाथ है। रिपोर्ट के अनुसार, बीजेपी के कुछ स्थानीय नेताओं ने समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर एक ऐसे व्यक्ति को चेयरमैन की कुर्सी तक पहुँचाया, जो कभी ‘एसी चालक’ हुआ करता था। आज उसी ‘चालक’ ने भ्रष्टाचार को अपनी मुख्य सड़क बना लिया है और बड़े नेताओं का वरदहस्त उसे जाँच की आंच से बचाए हुए है।

💫 जाँच की दरकार

यदि इस मामले की उच्च स्तरीय जाँच हो जाए, तो गायघाट से शुरू हुआ यह सिंडिकेट कई रसूखदारों को जेल की सलाखों के पीछे पहुँचा सकता है। जनता के टैक्स का पैसा, जो नालियों, सड़कों और रोशनी के लिए था, वह कुछ खास लोगों की विलासिता का साधन बन गया है।

अब देखना यह है कि क्या जिला प्रशासन इन फर्जी आंकड़ों के ‘सौदागरों’ पर नकेल कसेगा, या फिर विकास के नाम पर यह ‘लूटतंत्र’ यूँ ही जारी रहेगा?

 

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