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बस्ती शर्मसार: खाकी के गुरूर ने मासूमों को सड़क पर रौंदा, ए.आर.टी.ओ. की ‘गुंडागर्दी’ पर सी.डब्ल्यू.सी. का हंटर!

नियमों की वेदी पर बलि चढ़ी मासूमियत: बीच सड़क लावारिस छोड़े गए बच्चे, ए.आर.टी.ओ. से मांगा गया जवाब।

अजीत मिश्रा (खोजी)

🎯बस्ती: वर्दी का अहंकार या नौनिहालों से दुश्मनी? ए.आर.टी.ओ. की सनक ने सड़क पर लावारिस छोड़े मासूम!🎯

  • ए.आर.टी.ओ. साहब! आपके कागजों की कीमत बच्चों की सुरक्षा से बड़ी है क्या?
  • वर्दी की सनक: ड्राइवर से छीना मोबाइल, बच्चों को धूप में पैदल चलने को किया मजबूर, घेरे में पी.टी.ओ.।
  • अंकल! हम स्कूल कैसे जाएंगे? मासूमों की गुहार अनसुनी कर बस ले उड़े अफसर!
  • संवेदनहीनता की पराकाष्ठा: सुनसान राह, डरे हुए बच्चे और ‘कानून’ का डंडा—बस्ती का शर्मनाक वाकया।
  • जुर्माना मंजूर है, पर बच्चों की प्रताड़ना का हिसाब कौन देगा? – स्कूल प्रबंधक का बड़ा सवाल।

ब्यूरो, बस्ती मंडल | 06 अप्रैल, 2026

बस्ती। नियम कानून की आड़ में संवेदनहीनता की सारी हदें पार कर देने वाला एक शर्मनाक मामला बस्ती के छावनी और हरैया क्षेत्र से सामने आया है। यहाँ परिवहन विभाग (ARTO) के तथाकथित ‘कानून के रखवालों’ ने वर्दी की हनक में यह भी भूल जाना मुनासिब समझा कि सामने अपराधी नहीं, बल्कि देश का भविष्य—नन्हे स्कूली बच्चे खड़े हैं। बीच रास्ते बस से उतारकर बच्चों को धूप और सुनसान राहों पर लावारिस छोड़ने वाले ए.आर.टी.ओ. प्रवर्तन को अब बाल कल्याण समिति (CWC) के कटघरे में ‘हाजिर’ होना पड़ेगा।

🎯क्या मासूमों की सुरक्षा से बड़ा है विभाग का टारगेट?

घटना बीते 4 अप्रैल की है। एस.एन.एस.बी. इंटर कॉलेज, डुहवा मिश्र की बस जब बच्चों को लेकर स्कूल जा रही थी, तभी हरैया के बड़हर पेट्रोल पंप के पास ए.आर.टी.ओ. विभाग की टीम ने उसे रोक लिया। विभाग की ‘बहादुरी’ देखिए—चालक का मोबाइल छीन लिया गया ताकि वह मदद न मांग सके और बच्चों की मिन्नतों को पैरों तले रौंदते हुए उन्हें बीच सड़क पर उतरने को मजबूर कर दिया गया।

✍️सवाल यह है: अगर उन सुनसान राहों पर किसी बच्चे के साथ कोई अनहोनी हो जाती, तो क्या पी.टी.ओ. प्रदीप कुमार श्रीवास्तव इसकी जिम्मेदारी लेते? क्या कागजों की वैधता, मासूमों की जान से ज्यादा कीमती है?

🎯CWC ने कसा शिकंजा: ‘अमानवीय कृत्य’ के लिए माँगा जवाब

बच्चों की लिखित शिकायत पर कड़ा रुख अपनाते हुए सी.डब्ल्यू.सी. चेयरपर्सन प्रेरक मिश्रा ने इसे बाल अधिनियम 2015 की मंशा के विरुद्ध और घोर अमानवीय कृत्य करार दिया है। उन्होंने ए.आर.टी.ओ. प्रवर्तन (प्रभारी पी.टी.ओ. प्रदीप कुमार श्रीवास्तव) से 10 अप्रैल तक स्पष्टीकरण तलब किया है। चेयरपर्सन ने दो टूक कहा है कि कार्रवाई से पहले बच्चों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाना विभाग की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए थी।

🎯प्रबंधन की चूक स्वीकार, लेकिन विभाग की गुंडागर्दी पर आक्रोश

स्कूल प्रबंधक करुणाकर मिश्रा ने माना कि बस के रजिस्ट्रेशन की वैधता समाप्त होना एक तकनीकी चूक थी, जिस पर लगा 22 हजार का जुर्माना वह भरने को तैयार हैं। लेकिन उनका दर्द वाजिब है: “जुर्माना तकलीफदेह नहीं है, पर मेरे बच्चों को जो मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना दी गई, उसका हिसाब कौन देगा?” बस्ती की जनता पूछ रही है:

  • क्या चेकिंग के नाम पर बच्चों को सड़क पर लावारिस छोड़ना ही ‘उत्तम प्रदेश’ की पुलिसिंग है?
  • ड्राइवर का मोबाइल छीनकर उसे सूचना देने से रोकना किस कानून की किताब में लिखा है?
  • प्रभारी ए.आर.टी.ओ. साहब, नियम पालन कराने निकले थे या दहशत फैलाने?

निष्कर्ष: नियमों का पालन जरूरी है, लेकिन जब नियम का पालन कराने वाला खुद संवेदना शून्य हो जाए, तो वह रक्षक नहीं, भक्षक नजर आता है। अब देखना यह है कि 10 अप्रैल को ए.आर.टी.ओ. महोदय अपनी इस ‘अमानवीय उपलब्धि’ पर क्या तर्क देते हैं। बस्ती मंडल की नजरें इस पर टिकी हैं।

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