अजीत मिश्रा (खोजी)
🛑जनऔषधि घोटाला: गरीबों के हक पर ‘सिस्टम’ का डाका🛑
- सिस्टम का कोढ़: जनऔषधि ठेकों में करोड़ों की बंदरबांट, अब कागजों में छिपाई जा रही लूट।
- IAS अर्चना वर्मा का हंटर: फाइलें खुलीं तो सामने आया १० से ८५ लाख प्रति जिला का ‘कमीशन खेल’।
- CMO की रिपोर्ट ने खोली पोल: जनऔषधि केंद्रों के नाम पर जनता की जेब पर डकैती।
- जीरो टॉलरेंस का निकला दम; रक्षकों ने ही भक्षकों के साथ मिलकर लुटा ‘जनऔषधि’ का खजाना।
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार का घुन अब उन दवाओं को भी चाट गया है, जो ‘गरीबों की संजीवनी’ कही जाती थीं। प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना, जिसका ध्येय अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराना था, आज सरकारी बाबुओं और ठेकेदारों की मिलीभगत की भेंट चढ़ चुकी है। प्रदेश के हर जिले से १० से ८५ लाख रुपये तक की अनियमितताओं की गूँज बता रही है कि यह सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित संगठित अपराध है।
🎪सत्ता की नाक के नीचे लूट का ‘नुस्खा’
जब मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) खुद जिलाधिकारी (DM) को फाइलें सौंप रहे हैं, तो तस्वीर साफ है कि पानी सिर से ऊपर निकल चुका है। आईएएस अर्चना वर्मा के कड़े रुख और कार्रवाई के आदेश ने यह तो स्पष्ट कर दिया है कि शासन स्तर पर हलचल है, लेकिन सवाल वही पुराना है— जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए?
यह घोटाला केवल कागजों और आंकड़ों की हेराफेरी नहीं है। यह उन लाखों परिवारों के विश्वास के साथ विश्वासघात है, जो निजी अस्पतालों की महँगी लूट से बचने के लिए सरकारी जनऔषधि केंद्रों का रुख करते थे। ठेकों के आवंटन में जिस तरह करोड़ों की हेराफेरी हुई, उसने यह साबित कर दिया है कि सिस्टम में बैठे कुछ ‘सफेदपोश’ गिद्धों के लिए इंसान की बीमारी भी केवल मुनाफा कमाने का एक अवसर है।
🎪 व्यवस्था का ‘मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर’
इस घोटाले के उजागर होने के बाद कई कड़वे सवाल व्यवस्था के सामने खड़े हैं:
🎯निगरानी की विफलता: आखिर कैसे वर्षों तक जिला स्तर पर १० से ८५ लाख रुपये की बंदरबांट होती रही और ऑडिट विभाग सोता रहा?
🎯ठेकों का खेल: जनऔषधि केंद्रों के संचालन के लिए योग्यता के बजाय ‘कमीशन’ को पैमाना क्यों बनाया गया?
🎯नैतिक पतन: दवाओं जैसी बुनियादी जरूरत में भ्रष्टाचार करना क्या सामाजिक और नैतिक हत्या नहीं है?
यह बेहद शर्मनाक है कि जहाँ सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को पारदर्शी बनाने का ढोल पीट रही है, वहीं ज़मीनी हकीकत में ‘जनऔषधि’ के नाम पर ‘भ्रष्टाचार की घुट्टी’ पिलाई जा रही है।
🎪सामाजिक सरोकार: अब सड़कों पर जवाबदेही तय हो
इस घोटाले का सबसे डरावना पहलू सामाजिक है। जब सरकारी योजनाओं में इस स्तर की लूट होती है, तो आम नागरिक का तंत्र से भरोसा उठ जाता है। बस्ती मंडल सहित पूरे उत्तर प्रदेश में इस जांच को केवल फाइलों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
IAS अर्चना वर्मा के आदेश स्वागत योग्य हैं, लेकिन जनता को ‘निलंबन’ नहीं, ‘निस्तारण’ चाहिए। दोषियों की संपत्ति कुर्क होनी चाहिए और उन पर ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए जो आने वाले भ्रष्टाचारियों के लिए नजीर बने।
गरीब की थाली से रोटी पहले ही गायब थी, अब उसके घावों पर लगने वाली मरहम में भी मिलावट और लूट का जहर घोल दिया गया है। उत्तर प्रदेश की जनता देख रही है कि ‘जीरो टॉलरेंस’ का नारा देने वाली सरकार इन ‘दवा-माफियाओं’ पर बुलडोजर कब चलाती है।
- दवा नहीं, भ्रष्टाचार की घुट्टी: उत्तर प्रदेश में ‘जनऔषधि’ बना ‘अफ़सर-औषधि’!
- बीमारी गरीब को, मुनाफा माफिया को: जनऔषधि घोटाले की अंतहीन दास्तां।
- बस्ती मंडल से लखनऊ तक हड़कंप: क्या सलाखों के पीछे जाएंगे दवाओं के सौदागर?
- बस्ती मंडल डायरी: जनऔषधि के नाम पर करोड़ों डकार गए भ्रष्टाचारी, जाँच की आंच में कई ‘बड़े नाम’।
✍️ग्राउंड रिपोर्ट बस्ती: स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे पनपा दवाओं का काला साम्राज्य।
वक्त आ गया है कि जनऔषधि केंद्रों को ठेकेदारों के चंगुल से मुक्त कर, सेवा का केंद्र बनाया जाए, न कि भ्रष्टाचार का अड्डा।








