बस्ती का ‘चालान उद्योग’: पार्किंग के नाम पर सन्नाटा, वसूली में पुलिस सुपरफास्ट!
नगर पालिका की लापरवाही, जनता की जेब पर डाकी: बिना पार्किंग सुविधा दिए चालान काटना कितना जायज? सिस्टम फेल, जनता पस्त: नगर पालिका की 'नींद' का हर्जाना भर रहे बस्ती वाले!
अजीत मिश्रा (खोजी)
🚔बस्ती: पार्किंग के नाम पर ‘शून्य’, चालान में ‘नंबर वन’ – सिस्टम की नाकामी का दंड भुगत रही जनता🚔
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश
- हवा में टांग दें क्या गाड़ियां? पार्किंग मुहैया कराने में प्रशासन फेल, रसीद फाड़ने में ‘शेर’।
- पार्किंग का अता-पता नहीं, फिर किस हक से कट रहे चालान? बस्ती में उबाल।
- लेटर-लेटर का खेल बंद करो साहब! ट्रैफिक पुलिस और नगर पालिका की जंग में जनता बलि का बकरा।
- पक्के बाजार में ‘पक्का’ जाम: जीआईसी का विकल्प महज एक छलावा या प्रशासनिक मजबूरी?
बस्ती। तानाशाही और कुप्रबंधन का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि जिस जनता को सुविधाएं देने की जिम्मेदारी प्रशासन की है, वही प्रशासन अब जनता की जेब पर डाका डाल रहा है। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में इन दिनों ट्रैफिक पुलिस और नगर पालिका के बीच तालमेल की कमी का खामियाजा आम आदमी को ‘चालान’ के रूप में भुगतना पड़ रहा है। शहर में पार्किंग की जगह एक इंच नहीं है, लेकिन जुर्माने की रसीदें फुट-पट्टी नापकर काटी जा रही हैं।
🧭नगर पालिका की ‘कुंभकर्णी’ नींद, जनता पर ‘जुर्माने’ की मार
शहर के मुख्य बाजारों, अस्पतालों और रोडवेज के पास जाम लगना अब नियति बन चुकी है। ताज्जुब की बात यह है कि नगर पालिका को कई बार लिखित रूप में पार्किंग स्थलों और ट्रैफिक लाइटों की मांग भेजी गई, लेकिन विभाग फाइलों के ढेर पर सो रहा है। जब शहर में अधिकृत पार्किंग ही नहीं है, तो क्या लोग अपनी गाड़ियां हवा में टांग दें? सोशल मीडिया पर ‘बस्ती प्रोसेल’ के पोस्ट ने इस गुस्से को और हवा दे दी है, जहाँ लोग पूछ रहे हैं कि— “सुविधाएं जीरो, तो वसूली किस बात की?”
🧭शादी का सीजन और बाजार की बदहाली
पक्के बाजार का हाल यह है कि शादी-ब्याह की भीड़ के कारण पैर रखने की जगह नहीं है। सड़कें संकरी हैं और ऊपर से प्रशासन का ‘जुल्म’। दुकानदार परेशान हैं क्योंकि ग्राहक बाजार आने से डरने लगा है और आम नागरिक इसलिए बेहाल है क्योंकि उसे नहीं पता कि उसकी गाड़ी कहाँ सुरक्षित रहेगी।
🚧ट्रैफिक पुलिस का अपना ‘राग’, जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का खेल
इस पूरे विवाद पर ट्रैफिक इंस्पेक्टर का तर्क भी अजीबोगरीब है। उनका कहना है कि: “हमने माइक से चिल्लाकर कह दिया था कि गाड़ियां बाजार में न लाएं, जीआईसी स्कूल में खड़ी करें।” सवाल यह उठता है कि क्या पूरा शहर एक ही स्कूल के मैदान में सिमट जाएगा? क्या बुजुर्गों और मरीजों से यह उम्मीद की जाती है कि वे जीआईसी में गाड़ी खड़ी कर कोसों दूर पैदल चलकर बाजार या अस्पताल आएं?
🎯सिस्टम का फेलियर: कौन लेगा जिम्मेदारी?
ट्रैफिक पुलिस मानती है कि उन्होंने नगर पालिका को कई बार लिखा, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। तो क्या इस ‘लेटर-लेटर’ के खेल के बीच जनता की गाढ़ी कमाई चालान में फूंकना ही एकमात्र समाधान है? शहर के बड़े अस्पतालों के बाहर एम्बुलेंस तक फंसी रहती है, लेकिन नगर पालिका के पास पार्किंग बनाने का न तो समय है और न ही नियत।
✍️प्रशासन से ‘बस्ती’ के सीधे सवाल
- नगर पालिका से सवाल: शहर में पिछले कई सालों से पार्किंग का बजट कहाँ जा रहा है? जब सड़कों पर गाड़ियां खड़ी होना मजबूरी है, तो नगर पालिका ने अब तक मल्टी-लेवल या चिह्नित पार्किंग स्थल क्यों नहीं विकसित किए?
- ट्रैफिक पुलिस से सवाल: चालान काटना समाधान है या सिर्फ राजस्व वसूली का जरिया? क्या पुलिस का काम केवल जुर्माना वसूलना है या सड़कों को अतिक्रमण मुक्त कराकर सुगम यातायात सुनिश्चित करना भी है?
- नगर पालिका और पुलिस के बीच समन्वय पर सवाल: ट्रैफिक इंस्पेक्टर का कहना है कि उन्होंने नगर पालिका को कई बार पत्र लिखे। क्या उन पत्रों को कूड़ेदान में डाल दिया गया? इन दो विभागों की आपसी खींचतान का खामियाजा आम जनता क्यों भुगते?
- विकल्प पर सवाल: आपने कह दिया कि गाड़ियां ‘GIC स्कूल’ में खड़ी करें। क्या प्रशासन ने यह सोचा है कि पक्के बाजार से GIC की दूरी एक आम नागरिक, बुजुर्ग या मरीज के लिए कितनी व्यावहारिक है? क्या यह तुगलकी फरमान नहीं है?
- अस्पतालों और रोडवेज की बदहाली पर सवाल: शहर के लाइफलाइन इलाकों (अस्पताल और बस स्टेशन) में एम्बुलेंस तक जाम में फंसती है। क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है या फिर वीआईपी मूवमेंट के अलावा आम जनता की जान की कोई कीमत नहीं है?
✍️बस्ती की जनता अब यह पूछ रही है:
- अगर नगर पालिका पार्किंग नहीं दे पा रही, तो ट्रैफिक विभाग उन पर कार्रवाई क्यों नहीं करता?
- क्या सारा ‘अनुशासन’ सिर्फ आम आदमी की जेब खाली करने के लिए है?
- आखिर कब तक बस्ती के विकास को पार्किंग और जाम के नाम पर बंधक बनाया जाएगा?
बस्ती से तीखी रिपोर्ट।










