
समीर वानखेड़े ब्यूरो चीफ:
बल्लारपुर (चंद्रपुर) नगर पालिका के मुख्याधिकारी ने 6 अप्रैल तक का अल्टीमेटम देकर शहर के मुख्य और आंतरिक मार्गों से अतिक्रमण हटाने की नोटिस जारी की थी। चेतावनी दी गई थी कि तय तारीख तक खुद अतिक्रमण नहीं हटाया तो पालिका कार्रवाई करेगी। 6 अप्रैल से अतिक्मुरमण विरोधी मुहिम बड़े जोर-शोर से शुरू भी हुई। जेसीबी, कर्मचारी और अधिकारी सड़क पर उतरे तो लोगों को लगा कि अब शहर को अतिक्रमण और अवैध निर्माण से मुक्ति मिलेगी।
लेकिन 4 दिन बाद ही मुहिम की हवा निकल गई। 10 अप्रैल के बाद से न कोई कर्मचारी दिखा, न अधिकारी। सड़कें फिर जस की तस हो गईं।
‘वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज’ की बात सच साबित
वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज ने पहले ही आशंका जताई थी कि नगर पालिका प्रशासन में इच्छाशक्ति की कमी है और राजनीतिक दबाव के चलते बड़े अतिक्रमण पर कार्रवाई नहीं होती। मौजूदा हालात ने इस बात को सही साबित कर दिया।
छोटे दुकानदार निशाने पर, रसूखदारों को छूट
इस बार भी कार्रवाई सिर्फ खोमचे-ठेले लगाने वाले छोटे दुकानदारों तक सीमित रही। सड़क किनारे रोजी-रोटी कमाने वालों की दुकानें तोड़ी गईं, लेकिन सालों से यातायात बाधित कर रहे रसूखदारों और धनी लोगों के अवैध निर्माणों पर पालिका हाथ तक नहीं लगा सकी।
स्थानीय नागरिकों का सवाल है कि हर बार मुहिम ढोल-नगाड़ों के साथ शुरू होती है, पर छोटे दुकानदारों पर कार्रवाई के बाद क्यों शांत हो जाती है? बड़े अवैध निर्माणों के आगे प्रशासन बेबस क्यों हो जाता है?
जनता की मांग: निष्पक्ष और मजबूत अधिकारी चाहिए*
शहरवासी चाहते हैं कि अतिक्रमण और अवैध निर्माण की समस्या का स्थायी समाधान हो। इसके लिए नगर पालिका को ऐसा मुख्याधिकारी चाहिए जिसमें राजनीतिक दबाव झेलने की इच्छाशक्ति हो और जो बिना भेदभाव के कार्रवाई कर सके।
फिलहाल 6 अप्रैल का अल्टीमेटम, 10 अप्रैल तक कार्रवाई और उसके बाद सन्नाटा — बल्लारपुर की यही ‘अतिक्रमण हटाओ’ कहानी फिर दोहराई गई है।







