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बस्ती RTO में ‘अंधेरगर्दी’: अरुणाचल में फीडिंग, बस्ती में ‘सेटिंग’; फर्जीवाड़े का सबसे बड़ा खेल!

बस्ती RTO बना 'भ्रष्टाचार का अड्डा': अरुणाचल के पहाड़ों से बस्ती में उतर रहे फर्जी लाइसेंस!

अजीत मिश्रा (खोजी)

विशेष रिपोर्ट: बस्ती आरटीओ का ‘अरुणाचल कनेक्शन’ – फर्जीवाड़े की सड़क पर दौड़ रहा भ्रष्टाचार का सिंडिकेट

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • सावधान! आपकी बगल में दौड़ रहा ड्राइवर ‘फर्जी’ हो सकता है; बस्ती RTO का बड़ा स्कैम उजागर।
  • न टेस्ट, न लर्नर, बस दलालों को नोट फेंको और बन जाओ ‘हैवी ड्राइवर’—बस्ती मंडल की शर्मनाक रिपोर्ट।
  • अफ़सरों की मेज के नीचे से गुजर रहा ‘अरुणाचल कनेक्शन’; आखिर क्यों मौन है बस्ती परिवहन विभाग?
  • साहब की नाक के नीचे दलालों का ‘समानांतर आरटीओ’, सेप्पा और सियांग से हो रही फर्जी एंट्री।
  • सरकारी सिस्टम में ‘सेंधमारी’: बस्ती RTO के अफ़सरों और दलालों के ‘अपवित्र गठबंधन’ का पर्दाफाश।
  •  बस्ती में बन रहे हैं ‘लाइसेंसी किलर’, अरुणाचल के फर्जी डेटा पर टिका है मौत का कारोबार।
  • ऑपरेशन बैकलॉग: कैसे कागजों में ‘पहाड़ी’ बनकर बस्ती में रिन्यू हो रहे हैं यूपी के लाइसेंस?
  • फर्जीवाड़े की ‘सुपरफास्ट एक्सप्रेस’: पडरौना से अरुणाचल और फिर बस्ती… ऐसे बदलता है खेल।

बस्ती। उत्तर प्रदेश का परिवहन विभाग तकनीक और पारदर्शिता के कितने ही दावे क्यों न कर ले, लेकिन बस्ती आरटीओ कार्यालय ने भ्रष्टाचार की एक ऐसी ‘शॉर्टकट सड़क’ बना ली है जो सीधे पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ों से होकर गुजरती है। बस्ती मंडल में इन दिनों ड्राइविंग लाइसेंस (DL) बनाने के नाम पर जो खेल चल रहा है, वह न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सड़क सुरक्षा के लिहाज से एक बड़े खतरे की घंटी भी है।नियम-कायदों को ताक पर रखकर सरकारी सिस्टम में सेंधमारी कैसे की जाती है, इसका जीता-जागता उदाहरण बस्ती आरटीओ (RTO) कार्यालय बन चुका है। यहाँ ‘दलाल तंत्र’ इतना हावी है कि सात समंदर पार नहीं तो कम से कम हजारों किलोमीटर दूर अरुणाचल प्रदेश के डेटा का इस्तेमाल कर बस्ती में फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस की ‘फैक्ट्री’ चलाई जा रही है। यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा और सड़क सुरक्षा के साथ किया जा रहा एक बड़ा खिलवाड़ है।

खेल का पर्दाफाश: सेप्पा और सियांग से ‘बैकलॉग’ का जुगाड़

जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि दलाल उत्तर प्रदेश के कुशीनगर, गोरखपुर और सिद्धार्थनगर जैसे जिलों के आवेदकों का डेटा अरुणाचल प्रदेश के सेप्पा और सियांग जिलों में ‘बैकलॉग एंट्री’ के जरिए फीड करवाते हैं।

कैसे होता है यह ‘काला खेल’?

  • पुराना रिकॉर्ड: 2013 से पहले के मैनुअल लाइसेंसों का फायदा उठाकर दलाल अधिकारियों की मिलीभगत से पिछले दरवाजे (बैकलॉग) से एंट्री करवाते हैं।
  • एड्रेस चेंज का खेल: एक बार अरुणाचल के रिकॉर्ड में नाम दर्ज होते ही, उसे बस्ती ट्रांसफर कर ‘एड्रेस चेंज’ या ‘रिन्यूअल’ के नाम पर यूपी का वैध लाइसेंस बनवा दिया जाता है।
  • लर्नर का झंझट खत्म: इस प्रक्रिया में आवेदक को न तो लर्नर लाइसेंस की जरूरत पड़ती है और न ही आरटीओ के चक्कर काटने की।

अरुणाचल में डेटा एंट्री, बस्ती में रिन्यूअल: क्या है पूरा ‘बैकलॉग’ घोटाला?

जांच में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि बस्ती में सक्रिय दलालों का सिंडिकेट ऐसे लोगों का ड्राइविंग लाइसेंस बनवा रहा है, जिन्होंने कभी गाड़ी का स्टेयरिंग तक नहीं छुआ। इस खेल के लिए अरुणाचल प्रदेश के सेप्पा और सियांग जैसे दुर्गम जिलों को चुना गया है।

मैनुअल रिकॉर्ड का फायदा: साल 2013 से पहले लाइसेंस मैनुअल बनते थे और उनका रिकॉर्ड रजिस्टर में होता था। दलाल अधिकारियों से साठगांठ कर इन्हीं पुराने वर्षों की बैक डेट में अरुणाचल के रजिस्टर में फर्जी ‘बैकलॉग एंट्री’ करवाते हैं।

बस्ती में ‘लॉन्ड्रिंग’: एक बार जब डेटा अरुणाचल के सर्वर पर ऑनलाइन दिखने लगता है, तो उसे बस्ती ट्रांसफर कर दिया जाता है। यहाँ ‘पता परिवर्तन’ (Address Change) या ‘नवीनीकरण’ (Renewal) के नाम पर आवेदन होता है और आवेदक को बिना किसी टेस्ट के यूपी का वैध स्मार्ट कार्ड लाइसेंस थमा दिया जाता है।

नियमों की अर्थी: न लर्नर की जरूरत, न ड्राइविंग टेस्ट का डर

परिवहन विभाग के नियम कहते हैं कि स्थायी लाइसेंस से पहले लर्नर लाइसेंस अनिवार्य है और एक महीने बाद आरटीओ में बायोमेट्रिक व वाहन टेस्ट देना होता है। लेकिन बस्ती आरटीओ में नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं:

  • बिना टेस्ट के परमानेंट डीएल: दलालों के जरिए आने वाली फाइलों में न तो आवेदक को आरटीओ जाने की जरूरत पड़ती है और न ही टेस्ट देने की।
  • हैवी लाइसेंस का खतरा: भारी वाहनों (बस, ट्रक) के लिए एक साल पुराना डीएल होना जरूरी है। दलाल फर्जी बैकलॉग के जरिए रातों-रात किसी भी अनाड़ी को ‘हैवी ड्राइवर’ बना रहे हैं। यह सीधे तौर पर सड़क हादसों को दावत देने जैसा है।

अधिकारियों की चुप्पी: मिलीभगत या घोर लापरवाही?

बस्ती परिवहन कार्यालय में तैनात जिम्मेदार अफसर— एआरटीओ फरीदउद्दीन, आरआई सीमा गौतम और एआरटीओ माला बाजपेई की कार्यशैली पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सवाल यह है कि:

  • क्या अधिकारियों को यह नजर नहीं आता कि अचानक बस्ती में अरुणाचल प्रदेश से इतने ट्रांसफर केस क्यों आ रहे हैं?
  • बिना बायोमेट्रिक और बिना आवेदक की भौतिक उपस्थिति के ये फाइलें कैसे पास हो रही हैं?
  • पडरौना, गोरखपुर और सिद्धार्थनगर के आवेदक आखिर अरुणाचल का रास्ता पकड़कर बस्ती क्यों आ रहे हैं?

इन मामलों ने खोली पोल (केस स्टडी)

भ्रष्टाचार के इस काले साम्राज्य के कुछ पुख्ता सबूत सामने आए हैं:

  • करण गुप्ता: डीएल नंबर UP5120200018137। इसकी बैकलॉग एंट्री अरुणाचल के सियांग जिले से कराई गई और लाइसेंस बस्ती से जारी हुआ।
  • इसी तरह UP5120200034451, UP53 20190077236, UP57 20170098787, UP6320180030001 जैसे दर्जनों ऐसे लाइसेंस हैं जो इस सिंडिकेट की गवाही दे रहे हैं।

निष्कर्ष: भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं

यह महज एक दफ्तर की लापरवाही नहीं, बल्कि एक संगठित अपराध है। अरुणाचल से लेकर बस्ती तक फैला यह जाल चीख-चीख कर कह रहा है कि आरटीओ की खिड़की पर बैठा हर शख्स इस बहती गंगा में हाथ धो रहा है। यदि शासन स्तर पर इसकी उच्च स्तरीय जांच नहीं हुई, तो फर्जी दस्तावेजों पर बने ये ‘लाइसेंसी किलर’ सड़कों पर मौत बनकर दौड़ते रहेंगे।अगर इन फर्जी लाइसेंसों पर चलने वाले अनाड़ी चालक सड़क पर किसी मासूम की जान लेते हैं, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? क्या प्रशासन सिर्फ दलालों की जेब भरने के लिए बैठा है या इन सफेदपोश अपराधियों पर कोई कार्रवाई भी होगी?

अब देखना यह है कि इस रिपोर्ट के बाद राजधानी लखनऊ में बैठे आला अफसर बस्ती के इस ‘भ्रष्टाचार के शोरूम’ पर कब ताला लगाते हैं।

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