बस्ती: प्रशासन की ‘साख’ पर भारी सरदार कुलवेंद्र की चुनौती, क्या रसूखदारों के आगे नतमस्तक है ‘पालिका’?
"बस्ती में कानून के दो चश्मे: गरीबों पर 'बुलडोजर', लेखपाल के घर 'फूलों की चादर'!" "प्रशासन का अनोखा गणित: 50 फीट की सड़क को 25 फीट बनाने का 'जादुई' करिश्मा।"
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती: प्रशासन की दोहरी नीति पर बरसे सरदार कुलवेंद्र सिंह, लेखपाल के अवैध निर्माण को लेकर दिया ‘ओपन चैलेंज’
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश
- साहब! सरकारी ठप्पा है या ‘सुरक्षा कवच’? लेखपाल के अवैध निर्माण के आगे सिस्टम ने टेके घुटने।”
- “खुल जा सिम-सिम! सरदार कुलवेंद्र ने ललकारा, क्या लेखपाल के रसूख का ताला तोड़ पाएगा प्रशासन?”
- “ईमानदारी का ‘पुरस्कार’: खुद का कब्जा हटाया तो रास्ता बंद पाया, लेखपाल का घर देख प्रशासन को आया प्यार!”
- “बस्ती का अजूबा: यहाँ सड़क नहीं घटती, रसूखदारों की दीवारें बढ़ जाती हैं।”
- “प्रशासन की ‘सेलेक्टिव’ मर्दानगी: रेहड़ी वालों से जंग, लेखपाल के आगे ‘शांति भंग’!”
- “चुनौती स्वीकार है? या साहब के ‘खास’ होने का डर बरकरार है?”
- “विकास की नई परिभाषा: सड़क बीच में लेखपाल का मकान, जनता परेशान और अधिकारी मेहरबान।”
- “बुलडोजर का तेल खत्म या लेखपाल से डर? सरदार की चुनौती ने उड़ाई प्रशासन की नींद!”
बस्ती (ब्यूरो रिपोर्ट)। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में अतिक्रमण और प्रशासन के पक्षपातपूर्ण रवैये को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। मानसरोवर की यात्रा करने वाले देश के पहले सिख सरदार कुलवेंद्र सिंह मजहबी ने बस्ती जिला प्रशासन और नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी (ईओ) को खुलेआम चुनौती देते हुए उनके कार्य करने के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
क्या है पूरा मामला?
सरदार कुलवेंद्र सिंह का आरोप है कि शहर के बादशाह टॉकीज के बगल से रौता की ओर जाने वाली सड़क पर एक लेखपाल के परिवार द्वारा अवैध निर्माण किया गया है। उन्होंने कहा कि प्रशासन ने उनसे कहकर उनका कब्जा तो हटवा दिया और उन्होंने कानून का सम्मान करते हुए खुद अपना निर्माण तुड़वा लिया, लेकिन उसी जगह पर एक प्रभावशाली लेखपाल का अवैध निर्माण आज भी जस का तस खड़ा है।
कुलवेंद्र सिंह ने तल्ख तेवरों में कहा, “प्रशासन में अगर वाकई हिम्मत है, तो इस लेखपाल के अवैध निर्माण को ध्वस्त करके दिखाए। हमने प्रशासन की बात मानी, लेकिन लेखपाल के अतिक्रमण के कारण आज न मेरा गेट खुल पा रहा है और न ही सामने का रास्ता साफ हो रहा है।”
गरीबों पर डंडा, रसूखदारों को छूट!
मीडिया से रूबरू होते हुए कुलवेंद्र सिंह ने प्रशासन की कार्यशैली को ‘गरीब विरोधी’ करार दिया। उन्होंने कहा कि नगर पालिका और जिला प्रशासन की ताकत केवल उन गरीबों पर चलती है जो सड़क किनारे रेहड़ी-पटरी लगाकर अपना गुजर-बसर करते हैं। लेकिन जब मामला किसी सरकारी कर्मचारी या रसूखदार व्यक्ति के परिवार का आता है, तो अधिकारी आंखों पर पट्टी बांध लेते हैं।
हादसों को न्योता देती संकरी सड़क
खबर के मुताबिक, नियमानुसार सड़क के मध्य से 50 फीट की दूरी छोड़ी जानी चाहिए थी, लेकिन मौके पर स्थिति यह है कि 25 फीट भी जगह नहीं छोड़ी गई है। अतिक्रमण के कारण सड़क इतनी संकरी हो गई है कि:
- आए दिन सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं।
- बड़े वाहनों के टकराने का खतरा हमेशा बना रहता है।
- आम जनता का पैदल चलना भी दूभर हो गया है।
- प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
कुलवेंद्र सिंह ने सीधे तौर पर प्रशासन को कटघरे में खड़ा करते हुए पूछा है कि आखिर इस अतिक्रमण को हटाने में देरी क्यों हो रही है? क्या प्रशासन लेखपाल के परिवार के दबाव में है? उन्होंने कहा कि यह भेदभावपूर्ण रवैया शहर की बदहाली का मुख्य कारण है।
क्षेत्र के लोग भी अब सवाल पूछ रहे हैं कि जिस प्रशासन ने ‘जीरो टॉलरेंस’ का नारा दिया है, वह एक लेखपाल के अवैध निर्माण के सामने इतना लाचार क्यों दिख रहा है? सरदार कुलवेंद्र सिंह की इस सार्वजनिक चुनौती ने अब गेंद प्रशासन के पाले में डाल दी है।
सड़क 50 फीट की, पर छोड़ी सिर्फ 25 फीट!
नियमों के मुताबिक, सड़क के बीच से 50 फीट जगह खाली होनी चाहिए, लेकिन हकीकत यह है कि वहां 25 फीट भी जगह नहीं छोड़ी गई है। संकरी सड़क के कारण आए दिन हादसे हो रहे हैं और बड़े वाहनों का गुजरना दूभर हो गया है। कुलवेंद्र सिंह का आरोप गंभीर है:
“प्रशासन और नगर पालिका का सारा जोर सिर्फ गरीबों पर चलता है। जहां रसूखदारों का मामला आता है, वहां अधिकारी चुप्पी साध लेते हैं।”
बस्ती मंडल के अधिकारियों से तीखे सवाल:
- क्या नगर पालिका और प्रशासन केवल कागजों पर अतिक्रमण मुक्त शहर का सपना देख रहे हैं?
- एक लेखपाल के रसूख के आगे पूरी प्रशासनिक मशीनरी क्यों नतमस्तक है?
- अगर भविष्य में इस संकरी सड़क की वजह से कोई बड़ा हादसा होता है, तो क्या प्रशासन इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेगा?
निष्कर्ष : सरदार कुलवेंद्र सिंह द्वारा दिया गया यह ‘ओपन चैलेंज’ पूरे बस्ती मंडल में चर्चा का विषय बना हुआ है। यदि प्रशासन इस चुनौती को स्वीकार कर निष्पक्ष कार्रवाई नहीं करता, तो जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि कानून केवल आम आदमी के लिए है, खास लोगों के लिए नहीं। अब देखना यह है कि क्या बस्ती प्रशासन अपने इकबाल को बुलंद करने के लिए इस अवैध निर्माण पर बुलडोजर चलाएगा या चुप्पी साधे रखेगा।सरदार कुलवेंद्र सिंह ने जो चुनौती दी है, वह सीधे तौर पर जिला प्रशासन की निष्पक्षता पर सवालिया निशान है। जनता अब देख रही है कि प्रशासन इस ‘ओपन चैलेंज’ को स्वीकार कर अवैध निर्माण पर बुलडोजर चलाता है या फिर रसूखदारों की फाइलों के नीचे अपनी ईमानदारी को दबाए रखता है।
अगर यह अतिक्रमण नहीं हटा, तो यह साफ हो जाएगा कि बस्ती में कानून का राज नहीं, बल्कि ‘कनेक्शन’ का राज चलता है।










