बस्ती नगर पालिका में भ्रष्टाचार चरम पर: चार महीने भी नहीं टिक सकीं रोड लाइटें, अंधेरे में डूबीं पॉश कॉलोनियां
विकास के नाम पर 'अंधेर नगरी': आवास विकास और बैरिहवा में पसरा सन्नाटा, कमीशनखोरी की भेंट चढ़ीं स्ट्रीट लाइटें करोड़ों का बजट... चार महीने की रोशनी! बस्ती नगर पालिका की घटिया निर्माण नीति से जनता त्रस्त
अजीत मिश्रा (खोजी)
नगर पालिका बस्ती में भ्रष्टाचार चरम पर: चार महीने भी नहीं टिक सकीं रोड लाइटें, अंधेरे में डूबीं पॉश कॉलोनियां
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
- रोड लाइटें हुईं ‘फुस’, अंधेरे में बस्ती की वीआईपी कॉलोनियां!
- कागजों पर चमका शहर, जमीन पर छाया अंधेरा; नगर पालिका का एक और कारनामा
- चार महीने में ही खुली पोल, भ्रष्टाचार के अंधेरे में डूबा बस्ती शहर
- हुक्मरान सोए, रोशनी खोई: आवास विकास और बैरिहवा में शाम ढलते ही डराने लगती हैं सड़के
- साहब! टैक्स हमारा… तो अंधेरा क्यों? नगर पालिका बस्ती के खिलाफ फूटा जनता का गुस्सा
- महीनों से खराब पड़ी हैं आधुनिक लाइटें, सुरक्षा भगवान भरोसे, जिम्मेदार मौन।
- मानकों को ताक पर रखकर हुई घटिया सामग्री की खरीद, उच्च स्तरीय जांच की मांग।
बस्ती।। कहने को तो बस्ती को ‘स्मार्ट’ बनाने और संवारने के लंबे-चौड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि नगर पालिका बस्ती इस समय आकंठ भ्रष्टाचार और घोर लापरवाही के दलदल में डूबी हुई है। जनता की गाढ़ी कमाई और टैक्स के पैसों को किस तरह सफेद हाथी योजनाओं में फूंक दिया जाता है, इसका जीता-जागता सबूत शहर की सड़कों पर पसरा सन्नाटा और अंधेरा दे रहा है।
हाल ही में लाखों-करोड़ों की लागत से शहर को रोशन करने के लिए लगाई गईं आधुनिक रोड लाइटें महज चार महीने भी जलने में पूरी तरह विफल रहीं। नतीजा? शहर के सबसे प्रमुख और संभ्रांत माने जाने वाले इलाके— आवास विकास कॉलोनी और बैरिहवा—आजकल शाम ढलते ही घने अंधेरे के आगोश में समा जाते हैं।
विकास के नाम पर ‘अंधेर नगरी, चौपट राजा’
नगर पालिका प्रशासन की कार्यप्रणाली पर अब सीधे तौर पर सवाल उठने लगे हैं। जो लाइटें सालों-साल चलने के वादे के साथ खरीदी और लगाई गई थीं, वे चार महीने के भीतर ही ‘शो-पीस’ बनकर रह गईं। यह महज़ एक तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर घटिया सामग्री की खरीद और टेंडर प्रक्रिया में बड़े स्तर पर हुए बंदरबांट की बू दे रहा है।
बड़ा सवाल: आखिर किस अधिकारी और ठेकेदार की जुगलबंदी ने मानकों को ताक पर रखकर इन घटिया लाइटों की आपूर्ति को हरी झंडी दी? क्या महज चार महीने में खराब हो जाने वाले उपकरणों की कोई गारंटी-वारंटी तय नहीं की गई थी? या फिर ‘कमीशनखोरी’ के खेल में जनता की सुरक्षा को ताक पर रख दिया गया?
अंधेरे के साए में सुरक्षा भगवान भरोसे
आवास विकास कॉलोनी और बैरिहवा जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में स्ट्रीट लाइटें गुल होने से स्थानीय नागरिकों में भारी आक्रोश है। स्थिति यह है कि:
- बढ़ता अपराध का ग्राफ: अंधेरे का फायदा उठाकर राहजनी, मोबाइल छिनैती और चोरी की घटनाओं का खतरा दोगुना हो गया है।
- महिलाओं और बच्चों में खौफ: शाम के बाद ट्यूशन से लौटने वाले बच्चों और कामकाजी महिलाओं के लिए इन अंधेरी सड़कों से गुजरना किसी डरावने अनुभव से कम नहीं है।
- आवागमन में भारी दिक्कत: सड़कों के गड्ढे अंधेरे में दिखाई न देने के कारण आए दिन दोपहिया वाहन चालक चोटिल हो रहे हैं।
जिम्मेदार मौन, जनता त्रस्त
हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर समस्या और स्थानीय निवासियों द्वारा बार-बार शिकायत किए जाने के बावजूद नगर पालिका के जिम्मेदार अधिकारी कान में तेल डालकर सोए हुए हैं। भ्रष्टाचार का आलम यह है कि शिकायतों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है और ‘जल्द ठीक कराने’ का रटा-रटाया आश्वासन देकर पल्ला झाड़ लिया जाता है।
निष्कर्ष: अब तो जागिए हुक्मरान!
बस्ती नगर पालिका की यह बदहाली साफ तौर पर दर्शाती है कि यहाँ विकास सिर्फ कागजों पर और भ्रष्टाचार चरम पर है। जनता अब इस ‘अंधेर नगरी’ की व्यवस्था से ऊब चुकी है। यदि जल्द ही आवास विकास और बैरिहवा समेत पूरे शहर की लाइटों को दुरुस्त नहीं किया गया और इस घटिया खरीद की उच्च स्तरीय जांच कराकर दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो जनाक्रोश को सड़कों पर उतरने से कोई रोक नहीं पाएगा।
नगर पालिका प्रशासन को यह याद रखना होगा कि जनता ने उन्हें टैक्स की भारी-भरकम रकम अंधेरे में ठोकरें खाने के लिए नहीं, बल्कि शहर को रोशन करने के लिए दी है।










