प्रशासनिक ‘संवादहीनता’ बनी सुशासन की राह का रोड़ा: सीयूजी नंबर बन रहे महज़ ‘शो-पीस’, जनता त्रस्त
"सुशासन के दावों पर 'संवादहीनता' का ग्रहण: जनता की पुकार सुनने वाला कोई नहीं!" "सरकारी सीयूजी नंबर बने 'शो-पीस': फोन नहीं उठाते जिम्मेदार, कागजों पर सिमटा समाधान"
अजीत मिश्रा (खोजी)
सुशासन के दावों पर ‘संवादहीनता’ का ग्रहण: क्या अधिकारी जनता के लिए केवल ‘शो-पीस’ हैं?
- “IGRS पोर्टल पर ‘फर्जी निस्तारण’ का खेल: जनता परेशान, अधिकारी मस्त!”
- “अजीत मिश्रा (खोजी) की रिपोर्ट: बस्ती से लखनऊ तक, ‘संवादहीन’ अधिकारी कब सुधरेंगे?”
- “क्या योगी सरकार के आदेशों को ठेंगा दिखा रहे हैं अफसर? सीयूजी नंबर पर मची चुप्पी”
- “जनता की सेवा या ‘फर्जीवाड़े’ की पराकाष्ठा? प्रशासनिक लापरवाही की पोल खोलती पड़ताल”
बस्ती/उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश की योगी सरकार प्रदेश में सुशासन, पारदर्शिता और जनता की शिकायतों के त्वरित निस्तारण के लिए तमाम दावे करती है। मुख्यमंत्री के कड़े निर्देश हैं कि हर अधिकारी जनता की समस्याओं को प्राथमिकता दे, फोन रिसीव करे और समाधान सुनिश्चित करे। लेकिन, धरातल पर हकीकत इन दावों के बिल्कुल विपरीत है। बस्ती मंडल सहित पूरे प्रदेश में ‘संवादहीनता’ की एक ऐसी दीवार खड़ी हो गई है, जिसे तोड़ पाना अब आम जनता के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है।
सीयूजी नंबर: सुविधा या केवल एक सरकारी औपचारिकता?
प्रशासन ने जनता की सुविधा के लिए अधिकारियों को सीयूजी (CUG) नंबर जारी किए। उद्देश्य यह था कि आपात स्थिति में फरियादी सीधे अधिकारी से संपर्क कर सके। मगर आज स्थिति यह है कि कई जिम्मेदार अधिकारियों के फोन या तो ‘स्विच ऑफ’ मिलते हैं, या फिर बजते रहते हैं लेकिन उठाया नहीं जाता।
पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों की यह आम शिकायत है कि दर्जनों बार कॉल करने के बाद भी न तो कोई जवाब मिलता है और न ही ‘कॉल बैक’ की कोई परंपरा बची है। जब अधिकारी जनता की आवाज सुनने तक को तैयार नहीं हैं, तो फिर सरकारी तंत्र की सार्थकता पर सवाल उठना लाजमी है।
आईजीआरएस (IGRS) पोर्टल: समाधान का जरिया या कागजी खानापूर्ति?
जब फोन नहीं उठाया जाता, तो जनता अपनी पीड़ा लेकर आईजीआरएस पोर्टल का सहारा लेती है। यहां भी अधिकारी और अधिक ‘रचनात्मक’ हो जाते हैं। पीड़ितों का आरोप है कि अधिकांश शिकायतों को बिना धरातलीय जांच के ही ‘निस्तारित’ दिखा दिया जाता है। अधिकारियों द्वारा गलत रिपोर्ट लगाना अब एक बीमारी बन चुका है। पीड़ित व्यक्ति, जिसने न्याय की उम्मीद में शिकायत की थी, उसे न्याय के बजाय सिर्फ ‘कागजी निस्तारण’ का ठेंगा दिखाया जाता है।
अविश्वास की बढ़ती खाई और प्रशासनिक विफलता
प्रशासन और जनता के बीच का संवाद ही लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी है। जब यह संवाद टूटता है, तो जनता के मन में प्रशासन के प्रति अविश्वास पनपता है।
- मजबूरी: फोन न उठने और सुनवाई न होने के कारण जनता को मजबूरी में धरना-प्रदर्शन या सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ रहा है।
- परिणाम: छोटी-छोटी समस्याएं, जिनका समाधान एक फोन कॉल से हो सकता था, समय पर ध्यान न दिए जाने के कारण बड़े विवादों और गंभीर कानून-व्यवस्था की समस्या का रूप ले लेती हैं।
‘जनता दरबार’ की सार्थकता पर उठे सवाल
कुछ सामाजिक संगठनों ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि कई अधिकारी केवल दिखावे के लिए ‘जनता दरबार’ लगाते हैं। वहां समस्याएं सुनी तो जाती हैं, लेकिन समाधान फाइलों की भूल-भुलैया में कहीं खो जाता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार संवेदनशील बनने की नसीहत दे रहे हैं, लेकिन कुछ अधिकारी अपनी हठधर्मिता से सरकार की छवि को धूमिल करने का कोई अवसर नहीं छोड़ रहे हैं।
जनता की सरकार से सीधी मांग
अब प्रदेश की जनता ने अपनी अपेक्षाएं स्पष्ट कर दी हैं। यदि सरकार वास्तव में ‘जीरो टॉलरेंस’ के साथ काम करना चाहती है, तो उसे इन निम्नलिखित बिंदुओं पर सख्त कदम उठाने होंगे:
- जवाबदेही तय हो: जो अधिकारी जनता की कॉल नहीं उठा रहे हैं, उनके सीयूजी नंबरों की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) की जांच होनी चाहिए।
- गलत रिपोर्ट पर दंड: आईजीआरएस पोर्टल पर गलत रिपोर्ट लगाने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाए।
- संवेदनशीलता का प्रशिक्षण: जो अधिकारी खुद को ‘राजा’ समझ बैठे हैं, उन्हें यह अहसास कराया जाए कि वे जनता के सेवक हैं, स्वामी नहीं।
क्या सुधरेंगे हालात?
प्रदेश के प्रबुद्धजन अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपेक्षा कर रहे हैं कि वे इस संवादहीनता को गंभीरता से लें। सवाल यह है कि जनता के सेवक कहे जाने वाले अधिकारी कब अपनी जवाबदेही समझेंगे?
- जनता की मांग: लगातार शिकायतें दरकिनार करने वाले और जनता की कॉल न उठाने वाले अधिकारियों की सीयूजी कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) की जांच होनी चाहिए।
- सख्त कार्रवाई: जो अधिकारी सरकार की छवि धूमिल कर रहे हैं, उनके खिलाफ विभागीय जांच और कठोर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
निष्कर्ष:
सुशासन का मतलब केवल सरकारी आदेश जारी करना नहीं, बल्कि उन आदेशों का जमीनी स्तर पर असर दिखना है। अगर अधिकारी जनता की उपेक्षा करना जारी रखेंगे, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल उद्देश्य ही खतरे में पड़ जाएगा। क्या योगी सरकार उन लापरवाह अधिकारियों पर ‘चाबुक’ चलाएगी जो सिस्टम को दीमक की तरह खोखला कर रहे हैं? यह बड़ा सवाल अब प्रदेश की जनता की जुबां पर है।







