सरकारी जमीन पर ‘टावर’ का कब्जा, ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावों पर मचा बवंडर!
रुधौली की शर्मनाक हकीकत: कानून के पहरेदारों के रहते सरकारी जमीन पर अवैध टावर! प्रशासनिक मिलीभगत या मजबूरी? डुमरी में सरकारी जमीन 'हड़पने' का खेल जारी।
अजीत मिश्रा (खोजी)
‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा बनाम जमीनी हकीकत: सरकारी जमीन पर ‘कब्जा-ए-टावर’
- कागजों पर कार्रवाई, जमीन पर कब्जा; क्या अब भी ‘अवैध’ है प्रशासन की चुप्पी?
- सरकारी जमीन बनाम दबंगई: क्या प्रशासन ने टावर कंपनी के आगे घुटने टेक दिए?
- ‘जीरो टॉलरेंस’ का टावर: जहां कानून हार गया और अवैध कब्जा जीत गया!
- तहसील से कमिश्नर तक पहुंची गुहार, फिर भी सरकारी जमीन पर ‘टावर’ बरकरार!
बस्ती। प्रदेश सरकार भले ही भ्रष्टाचार और अवैध कब्जों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का ढोल पीटे, लेकिन बस्ती जिले की रुधौली तहसील का ‘ग्राम डुमरी’ इस नीति की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है। यहाँ सरकारी जमीन पर खड़ा हुआ मोबाइल टावर न केवल कानून के मुंह पर तमाचा है, बल्कि प्रशासनिक कार्यशैली की संवेदनहीनता और मिलीभगत का एक जीता-जागता उदाहरण भी है।
कानून फाइलों में कैद, अतिक्रमण बदस्तूर जारी
मामला बेहद सीधा है—गाटा संख्या 411 और 408, जो क्रमशः खंडक और सार्वजनिक रास्ते की भूमि के रूप में दर्ज हैं, पर अवैध रूप से मोबाइल टावर का निर्माण कर लिया गया। राजस्व विभाग की टीम ने पैमाइश कर इसकी पुष्टि भी की, धारा-67 के तहत कार्रवाई हुई और थाने में मुकदमा भी दर्ज हुआ। लेकिन, उसके बाद क्या?
उसके बाद सिर्फ ‘अंधेरगर्दी’ रही। वर्षों बीत गए, लेकिन वह टावर आज भी वहीं खड़ा है। सवाल यह है कि आखिर वे कौन सी अदृश्य शक्तियाँ हैं, जो प्रशासनिक आदेशों को ठेंगा दिखा रही हैं?
प्रशासनिक चुप्पी का ‘मौन’ अर्थ
जब उपजिलाधिकारी और जिलाधिकारी स्तर से न्याय की उम्मीदें दम तोड़ गईं, तो ग्रामीणों ने मंडलायुक्त की चौखट तक गुहार लगाई। लेकिन, अफसोस! आला अधिकारियों तक मामला पहुँचने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है।
क्या प्रशासन किसी दबाव में है? या फिर ‘दबंग’ और ‘कंपनी’ के आगे राजस्व विभाग और जिले का प्रशासन नतमस्तक हो चुका है? ग्रामीणों का आरोप है कि निजी लाभ के लिए कंपनी को गुमराह किया गया और अब एक व्यक्ति इसका आर्थिक लाभ उठा रहा है। प्रशासन का इस पर चुप रहना, उसकी निष्पक्षता और कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
निष्कर्ष: सत्ता की साख दांव पर
एक तरफ सरकार भ्रष्टाचार मिटाने के दावे करती है, और दूसरी तरफ सरकारी जमीनों पर सरेआम अवैध निर्माण हो रहे हैं। यदि कानूनी कार्रवाई और प्रशासनिक आदेशों का कोई वजूद नहीं है, तो जनता आखिर जाए तो कहाँ जाए?
यह मामला महज एक टावर का नहीं है, बल्कि यह इस बात का पैमाना है कि तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार आम आदमी की सुनवाई को कितना मुश्किल बना देता है। अगर प्रशासन अब भी नहीं चेता, तो ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावे केवल कागजों तक ही सिमट कर रह जाएंगे।
प्रशासन को जवाब देना होगा—कब तक सरकारी जमीन पर अवैध ‘टावर’ की छाया में न्याय का गला घोंटा जाता रहेगा?








