लापरवाही की पाठशाला: बस्ती के कोचिंग सेंटरों में मौत का साया, प्रशासन मौन!
शिक्षा के मंदिर या मौत के कुएं? बस्ती में कोचिंग सेंटरों की सुरक्षा भगवान भरोसे। क्या बच्चों की जान से भी सस्ती है 'कोचिंग फीस'? बस्ती में सुरक्षा मानकों की उड़ी धज्जियां।
अजीत मिश्रा (खोजी)
संपादकीय: शिक्षा के ‘मंदिरों’ में मौत का साया, बस्ती के कोचिंग सेंटरों में सुरक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे
- बस्ती में कोचिंग माफिया बेखौफ: ‘फायर सेफ्टी’ सिर्फ नाम की, मौत का खतरा काम का!
- अंदर ‘एसी’ और बाहर ‘खतरा’: बस्ती के कोचिंग सेंटरों में शिक्षा के नाम पर खिलवाड़।
- बस्ती: कोचिंग सेंटरों पर प्रशासन का चाबुक, सुरक्षा मानकों की अनदेखी पर नोटिस।
- क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है प्रशासन? बस्ती के कोचिंग संस्थानों में सुरक्षा की खुली पोल।
बस्ती: क्या हमारे बच्चों का भविष्य केवल मोटी फीस वाली ‘लक्ष्य’ और ‘मोमेंटो’ जैसी अकादमियों के एयर-कंडीशंड कमरों में सुरक्षित है? लखनऊ की दुखद घटना के बाद जब बस्ती प्रशासन नींद से जागा और कोचिंग सेंटरों की पड़ताल शुरू हुई, तो सामने आई सच्चाई किसी डरावने सपने से कम नहीं है। शिक्षा के नाम पर दुकानों की तरह चल रहे ये संस्थान छात्रों की जान के साथ खुलेआम खिलवाड़ कर रहे हैं।
सुरक्षा के नाम पर सिर्फ दिखावा
सीओ सदर सत्येंद्र भूषण तिवारी के नेतृत्व में हुई छापेमारी ने उन दावों की कलई खोल दी है, जो ये संस्थान अपनी मार्केटिंग में करते हैं। ‘लक्ष्य एकेडमी’ में सुरक्षा उपकरण तो मिले, लेकिन उनकी वैधता (Expiry) समाप्त हो चुकी थी। यानी, आपातकाल में वे सिर्फ शो-पीस साबित होते। वहीं, ‘मोमेंटो कोचिंग सेंटर’ की हालत तो और भी भयावह है—चार कमरों में आग बुझाने का कोई इंतजाम नहीं। बरामदे में लटका एक अग्निशमन यंत्र, वह भी एक्सपायर! क्या संचालकों ने छात्रों की सुरक्षा को महज एक रस्म अदायगी मान लिया है?
मुनाफे की अंधी दौड़ में दांव पर जान
आश्चर्य इस बात पर है कि जिन कमरों में सैकड़ों छात्र अपने भविष्य को संवारने की उम्मीद लेकर बैठते हैं, वहां बुनियादी सुरक्षा मानकों तक की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। आकर्षक इंटीरियर और आलीशान दिखावट के पीछे सुरक्षा की यह भारी कमी यह स्पष्ट करती है कि संचालकों के लिए छात्रों की जान की कीमत उनकी फीस से ज्यादा नहीं है।
प्रशासन की ‘हादसा-प्रतीक्षा’ नीति
सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रशासन को ये कमियां हादसों के बाद ही क्यों दिखाई देती हैं? क्या सुरक्षा ऑडिट के लिए किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जाता है? अगर नियमित निरीक्षण होता, तो आज इन संस्थानों में छात्रों को इस तरह के असुरक्षित माहौल में बैठने की नौबत ही नहीं आती।
सिर्फ नोटिस नहीं, चाहिए कठोर कार्रवाई
सीओ सदर ने संबंधित संस्थानों को नोटिस जारी करने की बात कही है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल नोटिस से सुरक्षा सुनिश्चित हो जाएगी? इतिहास गवाह है कि नोटिस के बाद अक्सर ये संस्थान कागजी खानापूर्ति कर लेते हैं और व्यवस्था फिर से ढर्रे पर आ जाती है।
समय की मांग है कि:
- सख्त कार्रवाई हो: मानकों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों को तत्काल सील किया जाए।
- जवाबदेही तय हो: केवल संचालकों पर ही नहीं, बल्कि उन जिम्मेदार अधिकारियों पर भी सवाल उठने चाहिए जिनकी देखरेख में ये संस्थान बिना सुरक्षा के फल-फूल रहे थे।
- निरंतर निगरानी: जांच को एक ‘अभियान’ नहीं, बल्कि ‘नियमित प्रक्रिया’ बनाया जाए।
शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले इन संस्थानों में अगर सुरक्षा ही दम तोड़ती दिखाई दे, तो यह समाज और शासन दोनों के लिए एक शर्मनाक स्थिति है। प्रशासन की यह कार्रवाई अभी तो एक शुरुआत है, असली परीक्षा तब होगी जब नियमों की अनदेखी करने वालों पर ऐसी कार्रवाई होगी जो अन्य संस्थानों के लिए सबक बन जाए।
क्या हम किसी और बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं?












