उत्तर प्रदेशबस्ती

​बस्ती में सरकारी डॉक्टरों की मनमानी: निजी प्रैक्टिस के आगे नतमस्तक प्रशासन

शासन के आदेशों को ठेंगा दिखा रहे सरकारी डॉक्टर, निजी प्रैक्टिस से भर रहे जेब सीएमओ की 'मेहरबानी' से बेलगाम हुए निजी प्रैक्टिस करने वाले चिकित्सक

अजीत मिश्रा (खोजी)

सरकारी संरक्षण में फली-फूल रही ‘निजी प्रैक्टिस’ की बीमारी

संपादकीय

  • सरकारी अस्पताल में मरीजों की अनदेखी: डॉक्टर ओपीडी के बजाय निजी आवास पर व्यस्त
  • बदली के आदेशों पर भारी ‘मेहरबानी’, एक ही जगह पर पाँच साल से जमे डॉक्टर

​बस्ती।। स्वास्थ्य सेवाओं का मूल मंत्र ‘सेवा’ है, लेकिन बस्ती के सरकारी अस्पतालों में तैनात कुछ चिकित्सकों के लिए यह सेवा सिर्फ अपने निजी जेबें भरने का जरिया बनकर रह गई है। उजागर हुई स्थिति बेहद चिंताजनक और व्यवस्था पर करारा तमाचा है। यहाँ सरकारी डॉक्टर धड़ल्ले से ‘निजी प्रैक्टिस’ कर रहे हैं, और प्रशासन मूकदर्शक बना बैठा है।बस्ती के सरकारी अस्पतालों, राजकीय और स्वशासी मेडिकल कॉलेजों में तैनात चिकित्सकों की ‘निजी प्रैक्टिस’ का मुद्दा एक बार फिर गंभीर हो गया है। शासन के तमाम सख्त निर्देशों और कार्रवाई की चेतावनी के बावजूद, सरकारी डॉक्टर खुलेआम निजी प्रैक्टिस कर रहे हैं और मरीजों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहे हैं।

आदेशों की उड़ रही धज्जियां

​प्रमुख सचिव द्वारा जारी आदेश और शासन की स्पष्ट चेतावनी कि ‘निजी प्रैक्टिस’ करने वाले चिकित्सकों का भत्ता बंद होगा, उनका पंजीकरण निरस्त किया जाएगा और उन्हें सेवा से बर्खास्त भी किया जा सकता है, महज़ कागज़ी घोड़े साबित हो रहे हैं। ज़मीनी हकीकत यह है कि न तो इन आदेशों का कोई खौफ है और न ही प्रशासन की कार्रवाई का असर।प्रमुख सचिव, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवा द्वारा जारी आदेशों में स्पष्ट किया गया था कि निजी प्रैक्टिस करने वाले चिकित्सकों को चिन्हित कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। शासन ने चेतावनी दी थी कि:

  • यदि कोई सरकारी डॉक्टर निजी प्रैक्टिस करते पाया जाता है, तो सबसे पहले उनका भत्ता बंद किया जाएगा।
  • इसके बाद उनके पंजीकरण को निरस्त करने के लिए नेशनल मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को लिखा जाएगा।
  • दोषी पाए जाने पर उन्हें सेवा से बर्खास्त भी किया जा सकता है।

सीएमओ की ‘मेहरबानी’ और संदिग्ध भूमिका

​इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) की भूमिका पर उठ रहा है। जब जाँच में कुछ चिकित्सक दोषी पाए गए, तो उन पर कार्रवाई की तलवार लटकने के बजाय ‘सीएमओ की मेहरबानी’ बरसी। आखिर यह संरक्षण क्यों? क्या सीएमओ का काम भ्रष्ट चिकित्सकों को बचाना है या स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ बनाना?शासन के निर्देशों के अनुपालन के लिए जिलाधिकारी के नेतृत्व में एक टीम का गठन किया गया था, जिसमें एसपी, सीएमओ और जिलाधकारी द्वारा नामित अभिसूचना इकाई के सदस्य शामिल थे। हालांकि, इस टीम का जमीनी स्तर पर कोई विशेष प्रभाव नहीं दिख रहा है।

विशेष रूप से सीएमओ की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं:

  • जाँच के दौरान कुछ डॉक्टर निजी प्रैक्टिस करते हुए पकड़े भी गए, लेकिन सीएमओ की ‘मेहरबानी’ के चलते उन पर कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई।
  • सीएमओ द्वारा कार्रवाई न किए जाने के कारण विभाग के भीतर ही सवाल उठ रहे हैं कि आखिर वे इन चिकित्सकों का बचाव क्यों कर रहे हैं।

नियम ताक पर, मरीज लाचार

​कैली अस्पताल से लेकर सीएससी तक, डॉक्टरों की मनमानी का आलम यह है कि वे ओपीडी में देर से पहुंचते हैं और मरीजों को अपने निजी आवासों पर बुलाकर भारी फीस वसूलते हैं। स्थानांतरण नीति भी केवल दिखावा बनकर रह गई है; कुछ चिकित्सक वर्षों से एक ही जगह जमे हुए हैं, जबकि विभाग केवल खानापूर्ति के लिए चुनिंदा लोगों का तबादला कर कोरम पूरा कर देता है।अस्पतालों में डॉक्टरों की मनमानी का आलम यह है कि मरीजों को सरकारी सुविधाएँ समय पर नहीं मिल पा रही हैं:

  • कैली अस्पताल: यहाँ के चिकित्सक अक्सर ओपीडी में देर से पहुंचते हैं।
  • निजी आवास पर बुलाना: कुछ डॉक्टर ओपीडी में आने वाले मरीजों को अपने निजी आवास पर बुलाते हैं और वहाँ उनसे भारी फीस वसूली जाती है।
  • स्थानांतरण नीति का मजाक: शासन की स्थानांतरण नीति के तहत हर साल डॉक्टरों का तबादला होना चाहिए, लेकिन कुछ डॉक्टर एक ही स्थान पर पांच वर्षों से जमे हुए हैं। सीएमओ केवल कुछ ही लोगों का स्थानांतरण करके खानापूर्ति कर देते हैं।

निष्कर्ष

​सरकारी अस्पतालों में तैनात डॉक्टर जब निजी कमाई को प्राथमिकता देने लगते हैं, तो इसका सीधा खामियाजा गरीब मरीज को भुगतना पड़ता है। अब समय आ गया है कि दिखावे की जाँच के बजाय सख्त विभागीय और कानूनी कार्रवाई हो। यदि सीएमओ की भूमिका संदिग्ध बनी रहती है, तो उनके विरुद्ध भी शासन को कठोर रुख अपनाना होगा।इस स्थिति के कारण न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता गिरी है, बल्कि गरीब मरीजों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है।

जनता यह पूछने का हक रखती है कि आखिर इन ‘निजी प्रैक्टिस’ करने वाले डॉक्टरों को सरकारी संरक्षण कौन दे रहा है?

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