
नगरी। एक ओर सरकार “विकसित भारत”, “अमृतकाल” और “शिक्षा का अधिकार” जैसे बड़े-बड़े दावे कर रही है। करोड़ों रुपये शिक्षा, सड़क, बिजली और स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर खर्च किए जाने का दावा किया जाता है। विज्ञापनों में हर बच्चे को आधुनिक स्कूल, प्रशिक्षित शिक्षक और बेहतर भविष्य का सपना दिखाया जाता है, लेकिन धमतरी जिले के नगरी विकासखंड के वनांचल एवं अभ्यारण क्षेत्र के कई गांव आज भी इन दावों की सच्चाई पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
इन गांवों की तस्वीर देखकर सहज ही सवाल उठता है कि क्या अभ्यारण क्षेत्र में रहने वाले बच्चे इस देश के नागरिक नहीं हैं? क्या उनके हिस्से में सिर्फ उपेक्षा और संघर्ष ही लिखा गया है?
हाल ही में अपनी वर्षों पुरानी समस्याओं को लेकर हजारों ग्रामीण धमतरी कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और सड़क, पुल-पुलिया, स्कूल भवन, बिजली, स्वास्थ्य तथा पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं की मांग करते हुए प्रशासन को चेतावनी दी कि यदि अब भी समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।
जब हमारी टीम ग्राम पंचायत खल्लारी के आश्रित ग्राम गाताबहारा सहित वनांचल क्षेत्र के अन्य गांवों में पहुंची तो सबसे दर्दनाक तस्वीर शिक्षा व्यवस्था की सामने आई। गांव में स्कूल भवन नहीं है। छोटे-छोटे बच्चे पेड़ की छांव और झोपड़ीनुमा अस्थायी कक्ष में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। बारिश हो, तेज धूप हो या ठंड—यही उनकी कक्षा है। यह दृश्य उन सभी दावों को झुठलाता है, जिनमें हर बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाने की बात कही जाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि यही हाल किसी शहर के स्कूल का होता तो शायद पूरा प्रशासन हरकत में आ जाता, लेकिन वनांचल के बच्चों की पीड़ा वर्षों से अनदेखी की जा रही है। सवाल यह भी है कि जिन बच्चों के पास सुरक्षित स्कूल भवन तक नहीं है, उनका भविष्य आखिर कैसे संवरेगा?
सिर्फ शिक्षा ही नहीं, ग्राम रिसगांव और आसपास के गांवों में सड़क और पुल-पुलिया का भी गंभीर अभाव है। नदी-नालों पर ग्रामीणों ने अपनी मेहनत से लकड़ियों का अस्थायी पुल बनाया है। इसी पुल से बच्चे स्कूल जाते हैं, मरीज अस्पताल पहुंचते हैं और ग्रामीण अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करते हैं। बरसात में यही पुल जानलेवा साबित हो सकता है, लेकिन जिम्मेदार विभाग अब तक स्थायी समाधान नहीं दे पाए हैं।
बिजली आज भी कई गांवों तक नहीं पहुंची है। स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी बेहद खराब है। किसी के बीमार होने पर कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर मरीजों के लिए अस्पताल तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है। कई बार समय पर इलाज नहीं मिलने से जान का खतरा भी पैदा हो जाता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि जब भी वे सड़क, स्कूल, पुल या बिजली की मांग करते हैं तो अभ्यारण क्षेत्र और टाइगर रिजर्व के नियमों का हवाला देकर उनकी मांगों को टाल दिया जाता है। उनका कहना है कि वन संरक्षण जरूरी है, लेकिन क्या बच्चों की शिक्षा, ग्रामीणों का जीवन और उनका संवैधानिक अधिकार उससे कम महत्वपूर्ण है?
ग्रामीण यह भी याद दिलाते हैं कि चुनाव के समय जनप्रतिनिधि इन्हीं गांवों में आकर विकास के बड़े-बड़े वादे करते हैं। उन्हें पहले से पता था कि बच्चे झोपड़ी में पढ़ रहे हैं, सड़क नहीं है, पुल नहीं है और स्वास्थ्य सुविधाएं बदहाल हैं। इसके बावजूद चुनाव जीतने के बाद इन समस्याओं के समाधान की दिशा में अपेक्षित प्रयास नजर नहीं आए।
हाल ही में जिला पंचायत अध्यक्ष ने भी गांवों का दौरा कर ग्रामीणों को विकास का भरोसा दिलाया, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि अब उन्हें केवल आश्वासन नहीं, बल्कि जमीन पर काम चाहिए। उनका कहना है कि जब हजारों लोग अपनी मांगों को लेकर कलेक्टर कार्यालय पहुंचे थे, तब अधिकांश जनप्रतिनिधि उनके साथ दिखाई नहीं दिए।
आज सबसे बड़ा सवाल शासन और प्रशासन के सामने खड़ा है—क्या वनांचल के बच्चों का भविष्य हमेशा पेड़ की छांव और झोपड़ीनुमा स्कूल तक ही सीमित रहेगा? क्या शिक्षा का अधिकार केवल शहरों के बच्चों के लिए है? क्या विकास के दावे इन गांवों तक कभी पहुंचेंगे या आने वाली पीढ़ियां भी इसी तरह मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करती रहेंगी?
वनांचल के इन गांवों की तस्वीर केवल धमतरी जिले की नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों की हकीकत है जो आज भी विकास की मुख्यधारा से दूर हैं। यदि सरकार वास्तव में हर बच्चे को समान अवसर देने का दावा करती है, तो उसे इन गांवों में शिक्षा, सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं तत्काल उपलब्ध करानी होंगी। क्योंकि किसी भी सभ्य समाज में बच्चों का भविष्य सरकारी फाइलों और अधूरे आश्वासनों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
इसी बीच हाल ही में जिला पंचायत अध्यक्ष ने भी वनांचल क्षेत्र के कई गांवों का दौरा किया। सड़क और पुल के अभाव में उन्हें अपना वाहन नदी किनारे छोड़कर पैदल गांव तक पहुंचना पड़ा। उन्होंने ग्रामीणों के बीच बैठकर शिक्षा, सड़क, पुल-पुलिया, बिजली, स्वास्थ्य और पेयजल जैसी वर्षों पुरानी समस्याओं को गंभीरता से सुना। पेड़ की छांव और झोपड़ीनुमा कक्ष में पढ़ाई कर रहे बच्चों की स्थिति देखकर उन्होंने चिंता व्यक्त की और अधिकारियों से आवश्यक जानकारी भी ली। जिला पंचायत अध्यक्ष ने ग्रामीणों को भरोसा दिलाया कि उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान निकालने के लिए शासन और प्रशासन स्तर पर गंभीर प्रयास किए जाएंगे तथा वन एवं राजस्व विभाग सहित संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय बनाकर विकास कार्यों का रास्ता तलाशा जाएगा।
हालांकि, ग्रामीणों का कहना है कि अब केवल दौरे और आश्वासन से काम नहीं चलेगा। उनका कहना है कि वर्षों से जनप्रतिनिधि गांवों में आकर समस्याएं सुनते रहे हैं, लेकिन धरातल पर अपेक्षित बदलाव दिखाई नहीं दिया। ग्रामीणों ने उम्मीद जताई कि जिला पंचायत अध्यक्ष का यह दौरा सिर्फ औपचारिकता बनकर न रह जाए, बल्कि इसके बाद स्कूल भवन, सड़क, पुल-पुलिया, बिजली और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए ठोस कार्ययोजना बने और समयबद्ध तरीके से काम शुरू हो। उनका कहना है कि यदि इस बार भी केवल आश्वासन ही मिला, तो वनांचल के बच्चों का भविष्य और हजारों ग्रामीणों का संघर्ष वहीं का वहीं रह जाएगा











