बस्ती में पवन सिंह के कार्यक्रम में हंगामा: कांवड़िए को मंच से धक्का देने पर उठे सवाल,
यदि धार्मिक आयोजनों में ही भक्तों का अपमान होना है, तो फिर इस तथाकथित सेवा का ढोंग बंद कर देना चाहिए। बस्ती की इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब मंचों पर अहंकार बैठता है, तो आस्था सबसे पहले दम तोड़ती है। जनता सब देख रही है, और वक्त आने पर इस अपमान का जवाब अपनी ही शैली में देना जानती है।
भक्ति की आड़ में अहंकार का प्रदर्शन: बस्ती में पवन सिंह के कार्यक्रम का काला सच
बस्ती: उत्तर प्रदेश के धार्मिक और सांस्कृतिक पन्नों में एक और काला अध्याय जुड़ गया है। मामला जिले के प्रतिष्ठित ‘मां शांति सेवा संस्थान’ के उस आयोजन का है, जहां एक तरफ दो लाख कांवड़ियों की सेवा का ढिंढोरा पीटा जा रहा था, तो दूसरी तरफ मंच के भीतर अहंकार का ऐसा नंगा नाच हुआ जिसने धर्म और आस्था के मर्म पर ही सवालिया निशान खड़े कर दिए।
सोमवार रात का यह वाकया महज़ एक मामूली धक्का-मुक्की नहीं, बल्कि उस सोच का जीता-जागता प्रमाण है जो तथाकथित वीआईपी संस्कृति के नशे में चूर होकर आम इंसान और शिवभक्त की गरिमा को पैरों तले कुचलने से नहीं हिचकिचाती।
जब आस्था को मंच से नीचे धकेल दिया गया
कार्यक्रम में भोजपुरी सिनेमा के चमकते सितारे पवन सिंह की मौजूदगी थी, और भीड़ में उनके दीवाने कांवड़िये भी मौजूद थे। एक आम शिवभक्त, जो हज़ारों किलोमीटर की कांवड़ यात्रा की थकान और भोलेनाथ की भक्ति में सराबोर होकर अपने चहेते कलाकार के साथ एक तस्वीर खिंचवाने की आस लिए मंच के करीब पहुंचा—उसका अपराध क्या था? क्या उसकी भक्ति इस तथाकथित ‘संस्थान’ के अध्यक्ष तेज प्रताप सिंह के अहंकार से छोटी थी?
आरोप है कि तेज प्रताप सिंह ने उस कांवड़िये को न सिर्फ रोका, बल्कि सरेआम धक्का देकर मंच से नीचे गिरा दिया। यह दृश्य उस संगठन के असली चरित्र को बेनकाब करता है जो कागजों और भाषणों में ‘सेवा’ का पाठ पढ़ाता है, लेकिन हकीकत में आम जनता और श्रद्धालुओं को कीड़े-मकोड़े समझता है। क्या यही वह संस्कार है जो कांवड़ यात्रा के दौरान सिखाए जाते हैं?
सेलिब्रिटी की मज़बूरी और आयोजकों का ढोंग
जब माहौल बिगड़ा और जनता का गुस्सा फूटने को हुआ, तब जाकर स्टार पवन सिंह को मसीहा की भूमिका निभानी पड़ी। उन्होंने खुद आगे आकर उस कांवड़िये को मंच पर बुलाया और गले लगाकर तस्वीर खिंचवाई। पवन सिंह की यह सूझबूझ तो सराहनीय कही जा सकती है, लेकिन इसने आयोजकों के उस पाखंड को पूरी तरह बेनकाब कर दिया जो कुछ पलों पहले तक अपनी हनक दिखाने में व्यस्त थे।
सवाल यह उठता है कि ऐसे आयोजनों का क्या फायदा जहाँ भगवान शिव के कांवड़िए, जो खुद साक्षात शिव के रूप माने जाते हैं, आयोजकों के पैरों की धूल समझकर दुत्कारे जाएं?
आस्था की आड़ में अहंकार का कारोबार
आज आवश्यकता इस बात की है कि इस घटना की गहरी समीक्षा हो। ‘मां शांति सेवा संस्थान’ जैसे संगठनों को यह समझ लेना चाहिए कि सेवा का मतलब सिर्फ प्रेस विज्ञप्ति छपवाना या भीड़ जुटाकर अपनी पीठ थपथपाना नहीं होता। सेवा के लिए जिस विनम्रता और त्याग की आवश्यकता होती है, वह इस घटना में पूरी तरह नदारद दिखा।
यदि धार्मिक आयोजनों में ही भक्तों का अपमान होना है, तो फिर इस तथाकथित सेवा का ढोंग बंद कर देना चाहिए। बस्ती की इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब मंचों पर अहंकार बैठता है, तो आस्था सबसे पहले दम तोड़ती है। जनता सब देख रही है, और वक्त आने पर इस अपमान का जवाब अपनी ही शैली में देना जानती है।









