

डॉ. बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर की विचारधारा का मूल संदेश था—समानता, स्वतंत्रता, बंधुता और न्याय।
इसलिए आरक्षण पर बहस हो तो उसे केवल गरीबी के चश्मे से नहीं, बल्कि संविधान में निहित सामाजिक न्याय और समान अवसर की भावना के साथ समझना चाहिए।
आज जरूरत इस बात की है कि राजनीति जाति के नाम पर समाज को बांटने के बजाय जातिगत भेदभाव, छुआछूत और सामाजिक गैरबराबरी को खत्म करने की दिशा में ठोस कदमों की बात करे।
जनप्रतिनिधियों से सवाल होना चाहिए—
क्या वे संविधान के मूल्यों के साथ खड़े हैं?
क्या वे वंचित और कमजोर वर्गों के अधिकारों की आवाज मजबूती से उठाते हैं?
क्या उनकी राजनीति समाज में बंधुता और बराबरी बढ़ाती है?
बाबासाहेब ने लोकतंत्र को केवल वोट डालने तक सीमित नहीं माना, बल्कि सामाजिक लोकतंत्र को भी महत्वपूर्ण माना। इसलिए जनता को भी हर चुनाव में नेताओं के काम, विचार और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता को परखना चाहिए।
आरक्षण पर राजनीति नहीं, संविधान की समझ चाहिए।
जातिवाद पर चुप्पी नहीं, सामाजिक बराबरी की लड़ाई चाहिए।
मैहर में ऐसी राजनीति चाहिए जो समाज को बांटे नहीं, जोड़े।



