

🚨 चर्च ऑफ इंडिया (CIPBC) और चर्च संपत्तियों पर देशव्यापी कानूनी संग्राम: इलाहाबाद हाईकोर्ट की पीआईएल से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक स्वामित्व, फर्जी डीड, रजिस्ट्री, अवैध कब्ज़ा और ध्वस्तीकरण पर ऐतिहासिक न्यायिक हस्तक्षेप (1927–2026) 🚨
भारत में चर्च संपत्तियों का इतिहास औपनिवेशिक शासनकाल से प्रारंभ होता है, जब धार्मिक एवं परोपकारी उद्देश्यों के लिए भूमि और भवन विभिन्न मिशनरी संस्थाओं, ट्रस्ट निकायों और चर्च प्रशासनों को आवंटित किए गए। समय के साथ इन संपत्तियों का पंजीकरण, प्रबंधन और उपयोग अलग-अलग संरचनाओं के अंतर्गत विकसित हुआ। 1927 के अधिनियम, जिसे प्रचलित रूप में इंडियन चर्च एक्ट 1927 कहा जाता है, तथा उससे संबंधित ट्रस्ट कानूनों ने चर्च संपत्तियों के संरक्षण और प्रशासन के लिए कानूनी ढांचा प्रदान किया। इस ढांचे का मूल सिद्धांत यह था कि ट्रस्टी संपत्ति के स्वामी नहीं बल्कि संरक्षक होते हैं और उन्हें संपत्ति का उपयोग उसी उद्देश्य के लिए करना होता है जिसके लिए वह मूल रूप से प्रदान की गई थी। किंतु स्वतंत्रता के बाद प्रशासनिक पुनर्गठन, चर्चों के विभाजन, विभिन्न डायोसिस की स्वायत्तता, और केंद्रीय निकायों की भूमिका को लेकर कई कानूनी प्रश्न उभरते रहे। हाल के वर्षों, विशेषकर 2024 से 2026 के बीच, चर्च ऑफ इंडिया (CIPBC), इंडियन चर्च ट्रस्टीज़ कलकत्ता, विभिन्न डायोसिस, बिशप, चेयरमैन, डायरेक्टर्स और मेट्रोपोलिटन की भूमिकाओं को लेकर देशभर में व्यापक कानूनी बहस देखने को मिली है।
इन विवादों का एक प्रमुख आयाम संपत्ति के स्वामित्व का प्रश्न है। कई मामलों में यह तर्क सामने आया कि संपत्तियाँ ऐतिहासिक रूप से इंडियन चर्च ट्रस्टीज़, कलकत्ता जैसे केंद्रीय निकायों के नाम दर्ज हैं, जबकि स्थानीय स्तर पर डायोसिस या पैरिश उनका वास्तविक उपयोग और प्रबंधन करते हैं। इससे यह प्रश्न उत्पन्न हुआ कि क्या केंद्रीय ट्रस्ट के पास पूर्ण स्वामित्व है या वह केवल एक संरक्षक संस्था है। यदि संपत्ति किसी विशेष डायोसिस की धार्मिक गतिविधियों के लिए समर्पित है, तो क्या केंद्रीय निकाय को उसे बेचने या हस्तांतरित करने का अधिकार है? इसी प्रकार, यदि कोई बिशप या चेयरमैन किसी संपत्ति के विक्रय का निर्णय लेता है, तो क्या वह निर्णय वैधानिक रूप से बाध्यकारी है, अथवा उसके लिए ट्रस्ट बोर्ड या सामुदायिक निकाय की सामूहिक स्वीकृति आवश्यक है? न्यायालयों ने ऐसे मामलों में मूल ट्रस्ट डीड, ऐतिहासिक रिकॉर्ड, राजस्व अभिलेख, पंजीकरण प्रमाणपत्र और शासनादेशों की गहन जांच को प्राथमिकता दी है।
उत्तर प्रदेश में चर्च संपत्तियों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में कई जनहित याचिकाएँ दायर हुईं, जिनमें आरोप लगाया गया कि कुछ स्थानों पर चर्च या ट्रस्ट संपत्तियों की अवैध बिक्री की गई, फर्जी डीड के माध्यम से रजिस्ट्री कराई गई, अथवा सरकारी या रक्षा भूमि पर अतिक्रमण किया गया। अदालतों ने स्पष्ट किया कि यदि भूमि सरकारी लीज़ पर है, तो लीज़ की शर्तों का कठोर पालन अनिवार्य है। यदि लीज़ शर्तों का उल्लंघन कर व्यावसायिक निर्माण किया गया है या भूमि का उपयोग मूल उद्देश्य से हटकर किया गया है, तो प्रशासन को कार्रवाई करने का अधिकार है। साथ ही, न्यायालयों ने यह भी रेखांकित किया कि किसी भी ध्वस्तीकरण या अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई से पहले नोटिस, सुनवाई और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए।
फर्जी डीड और संदिग्ध रजिस्ट्री के आरोपों ने आपराधिक कानून को भी इन विवादों से जोड़ दिया। यदि यह सिद्ध होता है कि किसी संपत्ति का हस्तांतरण जालसाजी, धोखाधड़ी या गलत अभिलेखों के आधार पर हुआ है, तो भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराएँ लागू हो सकती हैं। पंजीकरण अधिनियम, 1908 के अंतर्गत रजिस्ट्री की वैधता, स्टांप शुल्क, सर्किल रेट और प्राधिकृत हस्ताक्षरों की जांच आवश्यक मानी गई है। कई मामलों में यह भी देखा गया कि संपत्ति का बाजार मूल्य अत्यधिक होने के बावजूद उसे कम मूल्य पर बेचे जाने का आरोप लगाया गया, जिससे ट्रस्ट के हितों को क्षति पहुँची। न्यायालयों ने ऐसे मामलों में पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच पर बल दिया।
चर्च ऑफ इंडिया (CIPBC) और उससे संबद्ध संरचनाओं में मेट्रोपोलिटन, बिशप, चेयरमैन और डायरेक्टर्स की भूमिका प्रशासनिक नेतृत्व की होती है, किंतु संपत्ति के प्रश्न पर उनकी शक्तियाँ ट्रस्ट डीड और संविधान द्वारा सीमित होती हैं। यदि कोई पदाधिकारी व्यक्तिगत निर्णय लेकर संपत्ति का विक्रय करता है और वह निर्णय सामूहिक स्वीकृति या वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है, तो उसे न्यायिक समीक्षा के दायरे में लाया जा सकता है। न्यायालयों ने कई अवसरों पर दोहराया है कि धार्मिक पदाधिकारी का पद उसे संपत्ति का निजी स्वामी नहीं बनाता। ट्रस्ट संपत्ति सार्वजनिक विश्वास का विषय है और उसका उपयोग समुदाय के हित में होना चाहिए।
अवैध अतिक्रमण का मुद्दा भी चर्च संपत्तियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण रहा है। कई स्थानों पर बाहरी व्यक्तियों द्वारा चर्च भूमि पर कब्ज़ा करने की शिकायतें सामने आईं, जबकि अन्य मामलों में यह आरोप लगा कि स्वयं ट्रस्ट ने सरकारी भूमि पर अतिक्रमण किया या लीज़ शर्तों का उल्लंघन किया। नगर निकायों और विकास प्राधिकरणों ने कुछ मामलों में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की, जिसे न्यायालयों में चुनौती दी गई। अदालतों ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि यदि निर्माण अवैध है तो उसे हटाया जा सकता है, परंतु कार्रवाई विधिसम्मत और निष्पक्ष होनी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचे मामलों में धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक ट्रस्ट सिद्धांत के बीच संतुलन पर विचार हुआ। संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं, परंतु यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। यदि किसी धार्मिक संस्था द्वारा संपत्ति का उपयोग कानून के विरुद्ध किया जाता है, तो राज्य को हस्तक्षेप करने का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में यह सिद्धांत स्थापित किया है कि धार्मिक संस्थान भी विधि के शासन (Rule of Law) के अधीन हैं और उनकी संपत्तियों का प्रबंधन पारदर्शी एवं उत्तरदायी होना चाहिए।
2024 से 2026 के बीच न्यायपालिका की सक्रियता ने यह संकेत दिया कि धार्मिक ट्रस्टों के संपत्ति प्रबंधन में सुधार की आवश्यकता है। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि सभी चर्च संपत्तियों का डिजिटलीकरण, स्वतंत्र वार्षिक ऑडिट, सामुदायिक सहभागिता, और विक्रय या लीज़ के लिए स्पष्ट प्रक्रियात्मक मानक स्थापित किए जाने चाहिए। शासनादेशों का कठोर अनुपालन और राजस्व अभिलेखों का नियमित सत्यापन भी विवादों को कम कर सकता है। यदि किसी संपत्ति का ऐतिहासिक स्वामित्व अस्पष्ट है, तो उसे स्पष्ट करने के लिए विधिक उपाय अपनाए जाने चाहिए।
समग्र रूप से देखा जाए तो चर्च ऑफ इंडिया (CIPBC), इंडियन चर्च ट्रस्टीज़ कलकत्ता, विभिन्न डायोसिस और प्रशासनिक पदाधिकारियों से जुड़े विवाद केवल एक संस्था तक सीमित नहीं हैं; वे भारत में धार्मिक ट्रस्ट संपत्तियों के व्यापक प्रबंधन ढांचे से संबंधित हैं। यह परिदृश्य दर्शाता है कि धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए भी संपत्ति के प्रश्न पर कानून, पारदर्शिता और सार्वजनिक हित सर्वोपरि हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक की न्यायिक कार्यवाहियों ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि फर्जी डीड, संदिग्ध रजिस्ट्री, अवैध अतिक्रमण और लीज़ उल्लंघन जैसे आरोपों पर कठोर कानूनी कसौटी लागू होगी। 2026 की ओर बढ़ते भारत में यह विमर्श धार्मिक संस्थाओं के लिए एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी—चेतावनी इस बात की कि अनियमितता बर्दाश्त नहीं होगी, और अवसर इस रूप में कि पारदर्शी और उत्तरदायी प्रबंधन के माध्यम से समुदाय का विश्वास सुदृढ़ किया जा सकता है।
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संपादक – एलिक सिंह
वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़
ब्यूरो प्रमुख – हलचल इंडिया न्यूज़, सहारनपुर
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