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बस्ती भाजपा में ‘भीतरघात’ का ज्वालामुखी: क्या 2027 में होगा सूपड़ा साफ?

सत्ता के 'दो धुरों' की तानाशाही: 25 साल की निष्ठा को अपनों ने ही कुचला!

अजीत मिश्रा (खोजी)

🥀विशेष रिपोर्ट: बस्ती भाजपा में ‘अपनों’ की जंग, क्या 2027 में खिलेगा कमल या होगा सूपड़ा साफ?🥀

  • पंकज जी! डूब रही है बस्ती भाजपा की नैया, बचा सकें तो बचा लीजिए!
  • कार्यकर्ताओं का खून-पसीना बनाम आयातित नेताओं का दबदबा: बस्ती में कौन असली, कौन पराया?
  • सांसद और विधायक गंवाए, अब क्या संगठन भी गंवाएगी भाजपा? एक पत्र ने खोली कलह की पोल।
  • निष्कासन का खेल या सच बोलने की सजा? बस्ती मंडल की वरिष्ठ कार्यकर्ता ने उठाई बगावत की आवाज।

बस्ती | 07 अप्रैल 2026 | ब्यूरो रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘बस्ती’ का किला कभी भाजपा का अभेद्य दुर्ग माना जाता था, लेकिन आज उसी किले की दीवारें अंदरूनी कलह और ‘अपनों’ की गद्दारी से दरक रही हैं। पार्टी के भीतर सुलग रही यह चिंगारी अब एक पत्र के जरिए प्रदेश नेतृत्व के दरवाजे तक जा पहुंची है, जिसने जिले के दो कद्दावर नेताओं— पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी और वर्तमान जिलाध्यक्ष विवेकानंद मिश्र के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया है।

🌵25 साल की निष्ठा पर भारी पड़ी ‘गुटबाजी’

खबर की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 25 वर्षों तक भाजपा की निस्वार्थ सेवा करने वाली वरिष्ठ कार्यकर्ता किरण सिंह (मंडल अध्यक्ष, हरैया) ने सीधा मोर्चा खोल दिया है। प्रदेश उपाध्यक्ष पंकज सिंह को लिखे पत्र में उन्होंने जो दर्द बयां किया है, वह केवल एक कार्यकर्ता की पीड़ा नहीं, बल्कि संगठन के पतन की आहट है। पत्र में स्पष्ट आरोप है कि जिले में लोकतंत्र नहीं, बल्कि ‘दो चेहरों’ की तानाशाही चल रही है।

🌵हार का ‘पोस्टमार्टम’: एक सांसद और चार विधायकों की बलि!

रिपोर्ट के मुताबिक, जिले में भाजपा को जो करारी शिकस्त झेलनी पड़ी, जिसमें एक सांसद और चार विधायकों को हार का मुंह देखना पड़ा, उसका मुख्य कारण कोई बाहरी लहर नहीं बल्कि संगठन के भीतर का ‘भीतरघात’ था। आरोप है कि हरीश द्विवेदी और विवेकानंद मिश्र की कार्यशैली ने जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं में रोष भर दिया है।

“जो व्यक्ति कभी भाजपा का झंडा उठाने लायक नहीं था, उसे संगठन में मलाईदार पद दिए जा रहे हैं, जबकि खून-पसीना बहाने वाले पुराने निष्ठावानों को 3 अप्रैल की सूची में बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।”

🌵आयातित नेताओं का बोलबाला, मूल कार्यकर्ताओं का निकाला?

समीक्षात्मक दृष्टि से देखें तो यह स्थिति आत्मघाती है। अन्य दलों से आए लोगों को तरजीह देना और संगठन के पुराने स्तंभों को उखाड़ फेंकना बस्ती भाजपा के लिए ‘भस्मासुर’ साबित हो रहा है। किरण सिंह का निष्कासन इस बात का प्रमाण है कि जिले में सच बोलने की सजा ‘देशनिकाला’ है।

🌵2027 की चेतावनी: क्या अब भी सो रहा है नेतृत्व?

रिपोर्ट का सबसे आक्रामक पहलू वह चेतावनी है जिसमें कहा गया है कि यदि प्रदेश अध्यक्ष की आंखें अब भी नहीं खुलीं, तो 2027 के विधानसभा चुनाव में बस्ती से भाजपा का सूपड़ा साफ होने से कोई नहीं बचा पाएगा। बड़ा सवाल:

  • क्या भाजपा नेतृत्व इन ‘दो दिग्गजों’ के मोह में पूरे जिले की बलि चढ़ा देगा?
  • क्या संगठन में निष्ठा की जगह अब केवल ‘जी-हुजूरी’ बची है?

बस्ती मंडल की जनता और कार्यकर्ता अब ऊपर की ओर देख रहे हैं। फैसला पंकज सिंह और प्रदेश नेतृत्व को करना है— पार्टी बचानी है या फिर ‘पसंदीदा’ चेहरों की कुर्सी?

  • ‘अपनों’ की आग में जलता संगठन: बस्ती में कमल खिलाने वालों को ही किया बाहर!
  • पार्टी की सेवा का सिला ‘निष्कासन’: जिलाध्यक्ष और पूर्व सांसद की जुगलबंदी पर उठे सवाल।
  • बस्ती भाजपा की ‘बीमारी’ गहरी है: क्या प्रदेश नेतृत्व करेगा समय पर इलाज?

ब्यूरो रिपोर्ट, बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।

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