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बस्ती: जनसेवा के चोले में ‘लूट’ के नवीनीकरण की तैयारी? संजय चौधरी के पत्र पर जनता का फूटा गुस्सा!

बस्ती का सियासी भूचाल: जनता की जेब खाली, नेताओं को चाहिए लूट का 'एक्स्टेंशन'! सफेदपोशों की बेशर्मी: 5 साल के 'कुशासन' के बाद अब कार्यकाल नवीनीकरण का जुआ!

अजीत मिश्रा (खोजी)

विशेष रिपोर्ट: बस्ती में ‘सियासी सिंडिकेट’ का खेल? पांच साल की मलाई के बाद अब ‘कार्यकाल’ के विस्तार पर टिकी नजरें!

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • बस्ती डायरी: विकास की फाइलें धूल फांक रहीं, और अध्यक्ष जी को ‘कुर्सी’ का मोह सता रहा!
  • पत्र बम या स्वार्थ की चिट्ठी? संजय चौधरी के सुझाव पर जनता ने सरेआम उतारी इज्जत!
  • सोशल मीडिया पर ‘जगहंसाई’: “सब लुटेरे हैं” – जनता की इन टिप्पणियों ने खोली जिला पंचायत की पोल।
  • प्रशासक से डर क्यों? आखिर क्यों अधिकारियों की नियुक्ति से घबरा रहे हैं ‘माननीय’?
  • बस्ती मंडल की पुकार: 1182 पंचायतें बदहाल, फिर भी ‘बोनस’ समय की तलाश में नेता।
  • डबल इंजन की साख दांव पर: क्या मुख्यमंत्री अपनी ही पार्टी के नेताओं की ‘लूट’ वाली मंशा पर लगाएंगे लगाम?

बस्ती। राजनीति में जब सेवा का संकल्प ‘स्वार्थ’ में बदल जाए, तो जनता के हक पर डकैती शुरू हो जाती है। उत्तर प्रदेश के जनपद बस्ती से एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जिसने सत्ताधारी दल की शुचिता और जनप्रतिनिधियों की नैतिकता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। भाजपा नेता और जिला पंचायत अध्यक्ष संजय चौधरी द्वारा मुख्यमंत्री को लिखे गए एक पत्र ने जिले के सियासी गलियारों में भूचाल ला दिया है। इसे जनहित का सुझाव कहें या ‘लुटतंत्र’ को बरकरार रखने की छटपटाहट, जनता इसे ‘लूट का रिन्यूअल’ करार दे रही है।राजनीति में जब नैतिकता का पतन होता है, तो जनप्रतिनिधि लोकलाज भूलकर केवल अपनी तिजोरियां भरने के जुगाड़ में लग जाते हैं। जनपद बस्ती के भाजपा नेता संजय चौधरी और अनूप खरे आजकल चर्चाओं के केंद्र में हैं, लेकिन चर्चा विकास की नहीं, बल्कि उस ‘लूट’ की है जिसे ये नेता संवैधानिक विस्तार (रिन्यूअल) का नाम देकर जारी रखना चाहते हैं।

मुख्यमंत्री को पत्र: जनहित या स्वार्थ की सिद्धि?

सूत्रों और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे घटनाक्रम के अनुसार, जिला पंचायत अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर सुझाव दिया है कि यदि समय पर पंचायत चुनाव नहीं हो पाते, तो प्रशासक नियुक्त करने के बजाय वर्तमान अध्यक्षों और प्रधानों का कार्यकाल बढ़ा दिया जाए। तर्क यह दिया गया है कि जनप्रतिनिधि, अधिकारियों (प्रशासकों) की तुलना में अधिक गुणवत्तापूर्ण काम करते हैं।

लेकिन बस्ती की जनता इस तर्क को सिरे से खारिज कर रही है। जनता का सवाल सीधा है—क्या 5 साल की ‘लूट’ काफी नहीं थी जो अब इसके ‘रिन्यूअल’ की छटपटाहट दिखाई दे रही है?

क्या है पूरा विवाद?

मामला पंचायत चुनावों की आहट और प्रशासकों की नियुक्ति से जुड़ा है। नियमानुसार, कार्यकाल समाप्त होने पर यदि चुनाव न हों, तो शासन द्वारा प्रशासक नियुक्त किए जाते हैं। लेकिन बस्ती के जिला पंचायत अध्यक्ष संजय चौधरी ने एक नया ‘फॉर्मूला’ पेश किया है। उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मांग की है कि प्रशासक नियुक्त करने के बजाय वर्तमान जिला पंचायत अध्यक्षों, क्षेत्र पंचायत अध्यक्षों और ग्राम प्रधानों का कार्यकाल ही बढ़ा दिया जाए।

हैरानी की बात यह है कि इस सुझाव के पीछे तर्क यह दिया गया है कि ‘अधिकारियों की तुलना में जनप्रतिनिधि अधिक गुणवत्तापूर्ण कार्य कराते हैं।’

जनता की अदालत में नेताओं की पोल

अध्यक्ष जी को लगा होगा कि इस पत्र से उनकी छवि ‘विकास पुरुष’ की बनेगी, लेकिन सोशल मीडिया पर जनता ने जो प्रतिक्रिया दी है, उसने उनके दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। जनता का गुस्सा इस बात पर फूटा है कि पिछले पांच सालों में विकास के नाम पर जिले में केवल भ्रष्टाचार का नंगा नाच हुआ है।

  • 1182 पंचायतें, शून्य मॉडल: जिले की 1182 ग्राम पंचायतों, 14 क्षेत्र पंचायतों और जिला पंचायत में से एक भी ऐसी नहीं है जिसे ‘मॉडल’ के तौर पर पेश किया जा सके।
  • धन की बंदरबांट: जानकारों का कहना है कि करोड़ों का बजट आया और कागजों पर ही खर्च हो गया। नालियां चोक हैं, सड़कें उखड़ी हैं और सरकारी पैसा नेताओं की लग्जरी गाड़ियों और हवेलियों में तब्दील हो गया है।

प्रशासक बनाम ‘बेलगाम’ जनप्रतिनिधि

पत्र में अधिकारियों (प्रशासकों) को कमतर आंकने की कोशिश की गई है। लेकिन स्थानीय नागरिकों का तर्क इसके उलट है। लोगों का कहना है कि प्रशासक कम से कम ‘नौकरी जाने के डर’ से नियमों के दायरे में रहकर काम करता है। जबकि इन जनप्रतिनिधियों को न तो कानून का डर है और न ही नैतिकता का। जनता के बीच चर्चा है कि ये नेता केवल इसलिए कार्यकाल बढ़ाना चाहते हैं ताकि जो कसर पिछले पांच सालों में रह गई थी, उसे ‘बोनस समय’ में पूरा कर लिया जाए।

सोशल मीडिया पर उठी विरोध की लहर

सोशल मीडिया पर आलोक कुमार सिंह, अमर बहादुर सिंह और मंटू पांडेय जैसे लोगों ने सीधे अध्यक्ष की कार्यप्रणाली पर सवाल दागे हैं।

  • शिवकुमार चौधरी लिखते हैं, “अपना विश्वास अपना विकास जय हो,” जो एक व्यंग्य है कि नेता केवल अपना ही विकास कर रहे हैं।
  • बृजेश पटेल ने डबल इंजन सरकार की साख पर सवाल उठाते हुए कहा कि समय से चुनाव न करा पाना प्रशासन की विफलता है।
  • दुर्गेश शुक्ल का कटाक्ष सबसे तीखा था, उन्होंने लिखा, “कुछ नहीं मिलेगा, चोरी का बहुत मौका मिल जाएगा।”
  • रवि पांडेय ने दोटूक कहा कि “सब लुटेरे हैं, कोई दूध का धुला नहीं है।”
  • सत्येंद्र सिंह ‘भोलू’ ने चुटकी लेते हुए लिखा कि यह सब केवल “और लूट की खातिर” किया जा रहा है।
  • राहुल कुमार का कटाक्ष और भी तीखा था— “ताकि जो गलती से छूट गया, उसे भी लूटा जा सके।”

जनता का मानना है कि पिछले पांच सालों में जिला पंचायत से लेकर ग्राम पंचायतों तक सरकारी धन की जैसी बंदरबांट हुई है, उसने जिले को कंगाल कर दिया है। 1182 ग्राम पंचायतों में से एक भी ‘मॉडल’ नहीं बन पाई, जबकि धन पानी की तरह बहाया गया।

बस्ती का बड़ा सवाल: क्या मुख्यमंत्री लेंगे संज्ञान?

बस्ती की जनता यह पूछ रही है कि क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, जो भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का दावा करते हैं, ऐसे सुझावों पर ध्यान देंगे? क्या एक भी आम आदमी का समर्थन न पाने वाले इन नेताओं को फिर से जनता की गाढ़ी कमाई लूटने का लाइसेंस मिलेगा? अध्यक्ष जी का दावा है कि जनप्रतिनिधि बेहतर काम करते हैं, लेकिन जानकारों का कहना है कि प्रशासक (अधिकारी) कम से कम नौकरी जाने के डर से नियमों का पालन तो करते हैं। इसके विपरीत, इन बेलगाम जनप्रतिनिधियों के पास भ्रष्टाचार का कोई पैमाना ही नहीं बचा है।

निष्कर्ष: यह पत्र केवल एक सुझाव नहीं, बल्कि जनता के जनादेश का अपमान है। पांच साल की विफलता के बाद कार्यकाल विस्तार की मांग करना बेशर्मी की पराकाष्ठा है। बस्ती मंडल की जनता अब जाग चुकी है और वह ‘लूट के इस रिन्यूअल’ को किसी भी कीमत पर स्वीकार करने के मूड में नहीं है।बस्ती की जनता अब जागरूक हो चुकी है। जिला पंचायत अध्यक्ष के सुझाव पर एक भी आम आदमी का समर्थन न मिलना यह साबित करता है कि जनता इनके “विकास के दावों” के पीछे छिपी “लूट की मंशा” को पहचान चुकी है। अब देखना यह है कि क्या शासन इन “स्वयंभू विकासपुरुषों” की बातों में आता है या जनता की भावनाओं का सम्मान करते हुए कड़े कदम उठाता है।

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