
सागास द्वारा मंदिरा, मांस, बाली का भोग नहीं लेने के वचन पर रुकी बड़ी माता,
लकवा रोगी होते हैं ठीकबाड़िया माता की प्राण प्रतिष्ठा व मंदिर निर्माण के बाद 1969 से 1971 में हुए चमत्कारी, लकवा रोग को ठीक करने , आस्था, विश्वास, शक्ति की रानी बड़िया माता आज अपनी प्रसिद्ध के कारण दूर आस्था, विश्वास के साथ माता के दरबार में आते हैंरारा मणिवास सेन कोशिथल ने बताया कि रायपुर से 10 किमी दूर, कोशिथल से 7 किमी दूर नंदासा जागीर से 3 किमी दूर कोशिथल, रायपुर, बागोर से आने का साधन माता के भक्तों के लिए उपलब्ध है। बहुत से समाज द्वारा निर्मित मस्जिद का निर्माण हुआ है जहां माता के दरबार में 10 से 30 दिन तक मनाया जा सकता है। जब तक ठीक नहीं हो जाता तब तक भजन संध्या और संगीत का आयोजन शनिवार, रविवार, दोनों, नवरात्रि में भक्तों का तांता लगा रहता है। आजकल भजन-कीर्तन कार्यक्रम आयोजित होते हैं जिनमें बड़े-बड़े कलाकार आते हैं, साथ ही मंदिर में स्थापित मंदिर में माता-पिता, माता-पिता भी ले जा सकते हैं। जोधा भोपाजी की मूर्ति की स्थापना की इच्छा है कि बड़िया माता के प्रसिद्ध बड़े श्याम मंदिर में भी उनके दिव्य दर्शन की कामना है। दर्शन लाभ के लिए लोगों को पता है कि बदिया गांव का नाम क्या है* वर्तमान गांव का नाम पहले कुम्हारों का वड़िया था फिर देवी मां का चमत्कार और इस स्थान पर राज बिमान होने के साथ ही बदिया का माता जी के नाम से बुलाया जाने लगासगस बागी सागास में स्थित है बड़िया माता जी का मंदिर, जहां बना है मंदिर सांयकाल के समय से ही जगदमवा का प्रिय अस्त्र सुदर्शन चक्र का आणव सागास जी महाराज द्वारा भगवती को लाभ वाम मांस, राक्षस, बलि का भोग नहीं लेने का वचन समस जी से लेश मां ने फिर अपने परम भक्त श्री किशना जी गुर्जर खटाना की बेटी जम्बू को लकवा बीमारी का चमत्कार बताया गांव के लोगों को भी लकवा बीमारी को चमत्कार का चमत्कार टोटके के बाद उन्होंने इस निर्धन परिवार माँ भगवती से प्रार्थना कर बाई जम देवी की वाणी माता के चमत्कार पिता जी किशना जी के दर्शन नीचे दिए गए हैं कि तुम मेरा वहां स्थान बनाओ जह्यं सुदर्शन चक्र आ कर रुके पुत्री को साथ ले जाओ गांव के दर्शनार्थियों को लेकर वर्तमान मंदिर में वह देवी की स्थापना हुई विक्रम संवत 1985 सुदी 13 के शुभ उत्सव में मैया जी के पांच नमुनो को स्थापित कर दियाये। 15 किशना जी ने की सेवा पूजा की वी.सं. 2001 स्वर्ग सिधारने के बाद उनके पुत्र जोधराज गुर्जर की मां ने दिव्यदर्शन मंदिर व मूर्ति जोधराज के महत्वपूर्ण प्रयास से व मैया के भक्त वि.सं. 2026 से 2028 (सं. 1969 से स्थापना के लिए कहा गया है। 1971 तक मंदिर और मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होगी। तब से लेकर उनकी वंशावली मां भगवती की पूजा शुरू हो रही है। वि.सं. 2063 के 12 रविवार (दिनांक) 06-) 08-2006 जोधराज के स्वर्ग सिधारने के बाद उनके पुत्र भेरूलाल, लाइब्रलाल दीपक, पार्स, सुरस्विन मां भगवती की सेवा पूजा कर रहे हैं। भेरू लाल गुर्जर भोपाजी को अति माता कहते हैं






