

जब श्री राम रावण युद्ध शुरू होने वाला था तो राम ने कहा मैं युद्ध शुरु होने से पहले लंका विजय के लिए एक यज्ञ करना चाहता हूं और उसके लिए मुझे एक महा पंडित चाहिए जो शैव अर्थात शिव को पूजने वाला और मेरी तरह वैष्णव हो। तो जामवंत ने कहा प्रभू इस युद्ध भूमि में ऐसा महापंडित मिलना असंभव है लेकिन मैं एक ऐसे पंडित को जानता हूं जो शिव भक्त भी है और आप की तरह वैष्णव भी लेकिन वो आप का पुरोहित बनेगा नही तो श्री राम ने उस पंडित का नाम पूछा तो जामवंत ने कहा उसका नाम रावण है। थोड़ी देर चुप रहने के बाद श्री राम ने कहा आप लंका जाइए और रावण से कहिए क्या वो मेरे पुरोहित बनेंगे तब जामवंत रावण के पास जाते हैं और कहते हैं।
हे! महापंडित रावण मेरे साथ दो लोग हैं जो आप से यज्ञ करवाना चाहते हैं क्या आप उनका पुरोहित होना स्वीकार करेगे तो रावण ने बिना हां ना कहे पूछा कही आप अयोध्या से निर्वासित राजकुमारों की बात तो नही कर रहे हैं तो जामवंत ने कहा, हां फिर रावन ने एक प्रश्न किया क्या यज्ञ का उद्देश्य लंका विजय है तो फिर जामवंत ने कहा, हां इसके बाद भी क्या आप उनके पुरोहित बनेंगे तो रावण ने कहा किसी पंडित के दरवाजे पर कोई यज्ञ करने के लिए आमंत्रित करे तो उसे एक पंडित कैसे अस्वीकार कर सकता है। आप उनसे कहिए मैं उनका पुरोहित बनने को तैयार हूं। तब रावण ने नवों ग्रहों को बुलाया और यज्ञ के लिए शुभ मुहर्त निकालने को कहा और मुहूर्त निकला अगले दिन भोर में 5 बजे का, तब जामवंत ने कहा लेकिन आप पूजा के लिए सामग्री बता दीजिए तब रावण ने जवाब दिया हमारे यजमान तो वनवासी हैं उनके पास पूजा की कुछ सामग्री कम पड़ जाए तो पुरोहित का कर्तव्य है पूरी सामग्री खुद अपने पास से ले जाए, क्योंकि रावण जानता था राम विवाहित हैं और विवाहित पुरुष के बगल में उसकी पत्नी ना बैठे तो पूजा पूर्ण नही होती है और मैं अपूर्ण पूजा नही कर सकता। इसके बाद जामवंत चले और रावण अशोक वाटिका सीता के पास गया और सीता से कहा तुम्हारा पति एक यज्ञ करने वाला है जिसमे मैं उसका पुरोहित हूं, कल मेघनाथ सुबह रथ लेकर आएगा तुम उस पर बैठ जाना और उसके साथ यज्ञ स्थल पर चले जाना और यज्ञ खत्म होने के बाद फिर वापस लंका चली आना, इसके बाद सुबह रावण यज्ञ स्थल पर पंहुचा यह देख कर राम और लक्ष्मण ने रावण के पैर छुए और आशीर्वाद लिया, रावण ने यज्ञ शुरु करने से पहले राम से पूछा तुम्हारी पत्नी कहां हैं तो राम ने कहा पुरोहित जी उनका हरण हो गया है तब रावण ने राम से कहा मैंने तो पहले ही कह दिया अगर मेरे यजमान के यज्ञ में कुछ पूजन सामग्री कम पड़ जायेगी तो पुरोहित का कर्तव्य है कि उसको उपलब्ध कराए तब उसने मेघनाथ से कहा पुत्र सीता को राम के बगल में बैठा दो तब सीता को उनके बगल में बैठा कर रावण ने यज्ञ पूर्ण कर शिवलिंग की स्थापना की और नाम रखा रामेश्वर अर्थात राम ही ईश्वर है और ईश्वर ही राम। यज्ञ पूर्ण होने के बाद राम ने रावण से कहा आचार्य आप अपनी दक्षिणा बताईए तो रावण ने कहा यजमान समय आने पर ले लूंगा तब राम ने कहा ठीक है आचार्य बता तो दीजिए आप को क्या चाहिए तब पता नही उस समय आप को दक्षिणा देने की स्थिति में रहूं या नही, तब रावण ने राम से कहा यजमान मुझे दक्षिणा में बस यही चाहिए की जब मेरी मृ’त्यु हो तो मेरे सामने आप दोनों भाई मौजूद हों, यह सुन कर राम की आंखे भर आई और दोनों भाई रावण का पैर छूते हुए कहा ऐसा ही होगा आचार्य, इसीलिए हम कहते हैं राम को तो छोड़ो हम रावण का भी अपमान सहन नही कर सकते।
🙏#जय_श्री_राम_जय_सनातन 🙏






