
संवाददाता / आष्टा
वास्तविकता अपने द्वारा फोटो बया कर रहे हे
शहर की सबसे बड़ी कॉलोनी शांति नगर — जहां चारों तरफ ऊंची मंज़िलें, चकाचौंध और विकास की तस्वीरें हैं — उसी के बीच एक ऐसा घर भी है जिसका दरवाजा तक नहीं। न टीन की छत पक्की है, न ही सरकारी सहारा।
वार्ड15 स्थित इस निर्धन परिवार के मुखिया को एक वर्ष पूर्व लकवा (पैरालिसिस) हो गया, अब घर की पूरी ज़िम्मेदारी एक महिला के कंधों पर है जो लोगों के घरों में काम करके चार बेटियों को पढ़ा रही है। बेटियाँ कन्या शाला में पढ़ रही हैं, पर भविष्य का उजाला धुंधलकों में खोता नजर आ रहा है।
सवाल यह है कि— ➡️ क्या प्रशासन ने कभी इस कॉलोनी का सर्वे किया?
➡️ क्या बड़ी इमारतों के बीच यह झोपड़ी उन्हें दिखाई नहीं देती?
➡️ क्या BPL कार्ड सिर्फ रसूख़ वालों के लिए बनते हैं?
पीड़ित परिवार का कुटी योजना का फॉर्म भी वर्षों से अटका है, केवल राशन पर्ची के सहारे गेहूं मिल रहा है। लेकिन न मकान निर्माण की मदद, न विकलांगता सहायता और न ही गरीबी रेखा का प्रमाण पत्र।
“क्या प्रशासन की नज़र केवल AC कमरों तक सीमित है?”
“क्या आँखें बंद कर के कागज़ी सर्वे ही विकास कहलाता है?”
आष्टा युवा संगठन ने इस पीड़ित परिवार की सुध ली और एक महीने का किराना उपलब्ध कराया है, लेकिन सवाल अब भी कायम है:
👉 कब जागेगा प्रशासन?
👉 कब इन बच्चियों को उनका अधिकार मिलेगा?
👉 क्या दरवाज़ा नहीं होना गरीबी की पहचान नहीं है?
👉क्या अधिकारी ध्यान देंगे, या उन्होंने देखना ही छोड़ दिया है?









