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धर्मांतरण के झूठे आरोपों का सच: ईसाई विद्यालयों से निकले भारत के प्रधानमंत्री, मंत्री, प्रशासनिक अधिकारी, वैज्ञानिक और सुपरस्टार

लेकिन धर्म और संस्कृति आज भी वही , यही तथ्य धर्मांतरण के आरोपों को स्वतः ही निराधार सिद्ध करता है।

🔴 धर्मांतरण के झूठे आरोपों का सच: ईसाई विद्यालयों से निकले भारत के प्रधानमंत्री, मंत्री, प्रशासनिक अधिकारी, वैज्ञानिक और सुपरस्टार—लेकिन धर्म और संस्कृति आज भी वही

भारत में जब भी ईसाई विद्यालयों और मिशनरी शिक्षण संस्थानों की चर्चा होती है, तो कुछ वर्गों द्वारा बार-बार यह आरोप लगाया जाता है कि ये संस्थान धर्म परिवर्तन कराते हैं। लेकिन यदि इन आरोपों को तथ्यों की कसौटी पर परखा जाए, तो उनकी सच्चाई स्वयं सामने आ जाती है। वास्तविकता यह है कि भारत की राजनीति, प्रशासन, विज्ञान, साहित्य और सिनेमा के सर्वोच्च पदों पर बैठे अनेक ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिन पर देश को गर्व है और जिन्होंने अपनी प्रारंभिक अथवा उच्च शिक्षा ईसाई मिशनरी अथवा कॉन्वेंट विद्यालयों से प्राप्त की है। इसके बावजूद न तो उनका धर्म बदला, न ही उनकी सांस्कृतिक पहचान में कोई परिवर्तन आया। वे आज भी उसी आस्था, उसी परंपरा और उसी सामाजिक ढांचे के साथ जीवन व्यतीत कर रहे हैं, जिसमें उनका जन्म हुआ था। यही तथ्य धर्मांतरण के आरोपों को स्वतः ही निराधार सिद्ध करता है।

राजनीति के क्षेत्र की बात करें तो भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी जैसे प्रतिष्ठित ईसाई शिक्षण संस्थान से शिक्षा प्राप्त की। उनके पुत्र और देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दून स्कूल, देहरादून जैसे एंग्लिकन पृष्ठभूमि वाले विद्यालय में अध्ययन किया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने दिल्ली के सेंट कोलंबाज़ स्कूल से शिक्षा ग्रहण की, जिसे क्रिश्चियन ब्रदर्स द्वारा संचालित किया जाता है। वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने मोंटफोर्ट स्कूल और सेंट स्टीफन कॉलेज जैसे ईसाई संस्थानों से पढ़ाई की, वहीं कपिल सिब्बल और मणिशंकर अय्यर ने भी सेंट स्टीफन कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। यदि ये संस्थान धर्म परिवर्तन कराते, तो प्रश्न उठता है कि क्या आज इन नेताओं की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान वही रहती, जो वर्तमान में है? इसका उत्तर स्पष्ट है—इनमें से किसी का भी धर्म परिवर्तित नहीं हुआ।

फिल्म जगत पर दृष्टि डालें तो स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। अभिनेता शाहरुख खान ने सेंट कोलंबाज़ स्कूल से पढ़ाई की, अमिताभ बच्चन ने नैनीताल के शेरवुड कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की, ऋतिक रोशन बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल में पढ़े, आमिर खान सेंट ऐनी हाई स्कूल से निकले और सैफ अली खान लॉरेंस स्कूल, सनावर के छात्र रहे। इन सभी विद्यालयों का संचालन किसी न किसी रूप में ईसाई मिशनरी व्यवस्था से जुड़ा रहा है। इसके बावजूद आज शाहरुख खान इस्लामिक आस्था के साथ रमज़ान और ईद मनाते हैं, अमिताभ बच्चन खुले रूप से हिंदू धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं और आमिर खान तथा सैफ अली खान जैसे कलाकार अपनी धार्मिक पहचान को लेकर पूरी तरह स्पष्ट हैं। यदि धर्मांतरण होता, तो यह सांस्कृतिक निरंतरता संभव ही नहीं होती।

विज्ञान और राष्ट्र निर्माण के क्षेत्र में भी यही सच्चाई सामने आती है। भारत के ‘मिसाइल मैन’ और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने श्वार्ट्ज़ हायर सेकेंडरी स्कूल जैसे ईसाई मिशनरी विद्यालय से शिक्षा प्राप्त की, लेकिन वे जीवनभर एक आस्थावान मुस्लिम रहे और भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े प्रतीकों में गिने गए। नोबेल पुरस्कार विजेता सी. वी. रमन ने सेंट एलॉयसियस कॉलेज जैसे जेसुइट संस्थान से शिक्षा ली, किंतु उनका जीवन और योगदान भारतीय वैज्ञानिक परंपरा का गौरव बना। इसी प्रकार होमी जे. भाभा और विक्रम साराभाई जैसे महान वैज्ञानिकों की शिक्षा में भी ईसाई संस्थानों की भूमिका रही, परंतु उनके विचार, कर्म और समर्पण पूरी तरह भारतीय राष्ट्र निर्माण से जुड़े रहे।

प्रशासनिक सेवाओं की बात करें तो भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और प्रांतीय सिविल सेवा के अधिकारी देश की शासन व्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में ऐसे सैकड़ों अधिकारी हैं, जिन्होंने कॉन्वेंट, लोरेटो, सेंट जोसेफ, ला मार्टिनियर जैसे ईसाई शिक्षण संस्थानों से शिक्षा प्राप्त की। उत्तर प्रदेश कैडर की चर्चित प्रशासनिक अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल ने आगरा के कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी से पढ़ाई की, वहीं रोशन जैकब जैसी वरिष्ठ अधिकारी ला मार्टिनियर कॉलेज से शिक्षा लेकर लखनऊ की जिलाधिकारी बनीं। पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने भी कॉन्वेंट और सेंट स्टीफन कॉलेज जैसे संस्थानों से शिक्षा प्राप्त की। इन सभी अधिकारियों का चयन संघ लोक सेवा आयोग अथवा राज्य लोक सेवा आयोग जैसी कठिन और निष्पक्ष परीक्षाओं के माध्यम से हुआ, न कि किसी धर्म परिवर्तन के आधार पर।

यहां यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जब इतने स्पष्ट उदाहरण सामने हैं, तो फिर ईसाई संस्थानों पर धर्मांतरण का आरोप क्यों लगाया जाता है? शिक्षाविदों और विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे शिक्षा की गुणवत्ता से ध्यान हटाने और समाज में विभाजन पैदा करने की मानसिकता काम करती है। ईसाई मिशनरी विद्यालय दशकों से अनुशासन, अंग्रेज़ी भाषा की दक्षता, आधुनिक शिक्षा पद्धति और प्रतिस्पर्धात्मक सोच के लिए जाने जाते हैं। इन संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थी हर धर्म, हर वर्ग और हर सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं। भारतीय संविधान भी धर्मनिरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था को मान्यता देता है और प्रत्येक समुदाय को शिक्षा प्रदान करने का अधिकार देता है।

सच्चाई यह है कि ईसाई विद्यालय शिक्षा देते हैं, पहचान नहीं बदलते। वे सोच को व्यापक बनाते हैं, अवसरों के द्वार खोलते हैं और विद्यार्थियों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाते हैं। यदि धर्मांतरण इन संस्थानों का उद्देश्य होता, तो भारत की राजनीति, प्रशासन, विज्ञान और कला की वर्तमान तस्वीर बिल्कुल भिन्न होती। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन संस्थानों से निकले लोग मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च—सभी का सम्मान करते हुए भारतीय समाज का अभिन्न अंग बने हुए हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि ईसाई विद्यालयों पर धर्मांतरण का आरोप तथ्यों पर नहीं, बल्कि पूर्वाग्रह और भ्रांतियों पर आधारित है। ऐसे आरोप न केवल शिक्षा व्यवस्था को बदनाम करते हैं, बल्कि उन लाखों विद्यार्थियों की मेहनत और उपलब्धियों को भी कमतर आंकते हैं, जिन्होंने इन संस्थानों से शिक्षा प्राप्त कर देश का नाम रोशन किया। आज आवश्यकता है आरोपों की राजनीति से ऊपर उठकर सच्चाई को स्वीकार करने की, क्योंकि सच यही है कि ईसाई शिक्षण संस्थानों ने भारत को बेहतर नागरिक दिए हैं, धर्मांतरित नहीं।

इसी संदर्भ में समाज के तथाकथित “धर्म के ठेकेदारों” से एक बेहद अहम और तीखा सवाल भी उठता है। जब देश के अलग-अलग हिस्सों में मासूम बच्चियों और नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार, सामूहिक दुष्कर्म और जघन्य अपराध होते हैं, तब ये कथित धर्मरक्षक कहाँ चले जाते हैं? तब न तो कोई बड़ा आंदोलन दिखता है, न सड़क पर उतरकर न्याय की मांग, और न ही सोशल मीडिया पर वैसी आक्रामकता दिखाई देती है, जैसी ईसाई स्कूलों या शिक्षा संस्थानों पर निराधार धर्मांतरण के आरोप लगाते समय दिखाई देती है। क्या धर्म सिर्फ आरोप लगाने और नफरत फैलाने का औजार बनकर रह गया है? क्या मासूम बच्चियों की अस्मिता, उनका दर्द और उनका भविष्य इन कथित ठेकेदारों के एजेंडे में शामिल नहीं है? यह दोहरा मापदंड समाज को आईना दिखाता है कि असली लड़ाई धर्म की नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, न्याय और नैतिक जिम्मेदारी की कमी की है।

इसके साथ ही उन लोगों की मानसिकता पर भी सवाल उठना जरूरी है, जो आजकल क्रिसमस का विरोध करते हुए सड़कों पर घूम रहे हैं और शिक्षा संस्थानों को निशाना बना रहे हैं। अगर वास्तव में इन्हें क्रिसमस या उससे जुड़े आयोजनों से आपत्ति है, तो सबसे पहले इन्हें बाजार में खुलेआम क्रिसमस ट्री, सांता क्लॉज, केक, लाइटिंग और सजावटी सामान बेचने वाली दुकानों को बंद कराने के लिए आवाज उठानी चाहिए। लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसे लोग वहां कभी नहीं जाते, क्योंकि वहां सवाल पूछने पर जवाब भी मिल सकता है। स्कूलों पर हमला करना आसान है, क्योंकि वहां बच्चे हैं, शिक्षक हैं और अनुशासन है। जबकि यह बुनियादी सच्चाई है कि किसी भी स्कूल की जिम्मेदारी उसके प्रबंधन और प्रशासन की होती है, न कि इन स्वयंभू कट्टरपंथियों की। शिक्षा संस्थान न तो धर्म का अखाड़ा हैं और न ही राजनीतिक एजेंडे का मैदान। बच्चों को पढ़ाना, संस्कार देना और बेहतर नागरिक बनाना स्कूल का काम है—न कि किसी खास विचारधारा के दबाव में चलना।


✍️ रिपोर्ट: एलिक सिंह
संपादक – वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़
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