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बीकानेर: खेजड़ी बचाओ महापड़ाव में उमड़ा जनसैलाब, बाड़मेर से हजारों पर्यावरण प्रेमी पहुँचे समर्थन में

(पर्यावरण संरक्षण की आवाज — वन्दे भारत लाइव टीवी न्यूज | जनहित की सशक्त पहचान — समृद्ध भारत समाचार पत्र)

ब्यूरो चीफ : मांगीलाल पुत्र श्री पुनमाराम विश्नोई आदर्श सोनड़ी 
संवाददाता — वन्दे भारत लाइव टीवी न्यूज / समृद्ध भारत समाचार पत्र
( पत्रकार, आरटीआई कार्यकर्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता )

खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के लिए बीकानेर में चल रहा खेजड़ी बचाओ महापड़ाव एवं आमरण अनशन आंदोलन अब जनआंदोलन का रूप ले चुका है। राजस्थान के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में लोग आंदोलन स्थल पर पहुँच रहे हैं। विशेष रूप से बाड़मेर जिले क्षेत्र से हजारों की तादाद में ग्रामीण, किसान, युवा, महिलाएँ एवं सामाजिक कार्यकर्ता आंदोलन में भाग लेने पहुँचे, जिससे आंदोलन को और अधिक मजबूती मिली है।

सुबह से ही संत समाज, माताएँ-बहनें एवं युवा साथी आमरण अनशन पर डटे हुए हैं। कई अनशनकारी बीते कई घंटों से बिना कुछ खाए-पिए खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के संकल्प के साथ बैठे हैं। उनका कहना है कि खेजड़ी केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि मरुस्थलीय जीवन, पर्यावरण संतुलन और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।

आंदोलन स्थल पर संतों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विधिवत पूजा-अर्चना के बाद अनशन प्रारंभ किया। कई संतों ने आंखों पर पट्टी बांधकर विरोध प्रदर्शन किया, जिससे आंदोलन की गंभीरता स्पष्ट दिखाई देती है। अनशनकारियों का कहना है कि जब तक खेजड़ी की कटाई पूरी तरह नहीं रोकी जाती और स्थायी संरक्षण कानून लागू नहीं किया जाता, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।

बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर, नागौर सहित कई जिलों से आए लोगों ने आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। बाड़मेर क्षेत्र से पहुँचे लोगों ने बताया कि खेजड़ी वृक्ष उनके जीवन का आधार है, जो पशुपालन, कृषि, पर्यावरण और जल संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके विनाश से पूरे क्षेत्र की आजीविका और प्राकृतिक संतुलन प्रभावित होगा।

महिलाओं की भागीदारी भी आंदोलन में विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। बड़ी संख्या में महिलाएँ अपने परिवारों के साथ आंदोलन स्थल पर पहुँचीं और खेजड़ी संरक्षण को लेकर जागरूकता का संदेश दिया। महिलाओं ने कहा कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए इस संघर्ष में उनका योगदान अनिवार्य है।

आंदोलन के समर्थन में शहर के कई हिस्सों में बाजार बंद रहे तथा सामाजिक संगठनों ने भी सहयोग प्रदान किया। व्यापारिक संगठनों, किसान संगठनों और युवाओं ने प्रशासन से आंदोलनकारियों की मांगों पर शीघ्र निर्णय लेने की अपील की है।

राजनीतिक एवं सामाजिक स्तर पर भी इस आंदोलन को व्यापक समर्थन मिल रहा है। कई जनप्रतिनिधियों और सामाजिक नेताओं ने आंदोलनकारियों के पक्ष में बयान जारी कर सरकार से जनभावना का सम्मान करने की मांग की है। उनका कहना है कि विकास के नाम पर पर्यावरण विनाश किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।

सरकार की जिम्मेदारी

खेजड़ी बचाओ महापड़ाव एवं आमरण अनशन जैसे शांतिपूर्ण आंदोलनों के बीच यह सरकार की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह जनभावनाओं का सम्मान करे और पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दे। खेजड़ी वृक्ष न केवल राजस्थान का राज्य वृक्ष है, बल्कि मरुस्थलीय जीवन, पशुपालन, कृषि और जल संरक्षण का आधार भी है।

सरकार का दायित्व है कि वह खेजड़ी की अवैध कटाई पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाए, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करे तथा स्थायी संरक्षण नीति लागू करे। साथ ही आंदोलनकारियों से शीघ्र संवाद स्थापित कर लोकतांत्रिक तरीके से समाधान निकाला जाए।

संविधान के अनुच्छेद 48(क) एवं 51(ग) के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण राज्य और नागरिक दोनों का कर्तव्य है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह केवल विकास परियोजनाओं पर ही नहीं, बल्कि प्रकृति और जनजीवन की रक्षा पर भी समान रूप से ध्यान दे।

यदि सरकार समय रहते संवेदनशीलता और दूरदर्शिता का परिचय देती है, तो न केवल यह आंदोलन सकारात्मक परिणाम देगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और संतुलित पर्यावरण सुनिश्चित किया जा सकेगा।


आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया है कि खेजड़ी की कटाई से केवल पेड़ नहीं कटेंगे, बल्कि मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर क्षति पहुँचेगी। इससे पशुधन, कृषि उत्पादन, जल संरक्षण और स्थानीय जीवनशैली पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। इसलिए यह संघर्ष केवल वृक्ष बचाने का नहीं, बल्कि जीवन बचाने का आंदोलन है।

अनशनकारियों और समर्थकों ने सरकार से शीघ्र संवाद स्थापित करने, कटाई पर तत्काल रोक लगाने तथा खेजड़ी को पूर्ण कानूनी संरक्षण देने की मांग की है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो आंदोलन को और अधिक व्यापक रूप दिया जाएगा।

आंदोलन स्थल पर मौजूद लोगों का कहना है कि यह संघर्ष व्यर्थ नहीं जाएगा। खेजड़ी की रक्षा के लिए वे अंतिम सांस तक संघर्ष करने को तैयार हैं। जनसहभागिता और जनसमर्थन से यह आंदोलन अब पूरे प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक बन चुका है।

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