।। खलीलाबाद हादसा: सबूत मिटाने की साजिश या इत्तेफाक? 24 घंटे बाद ‘सुलगती’ डीसीएम ने खड़े किए गंभीर सवाल।
लदा हुआ माल कहाँ गया? क्या आग लगने से पहले सामान 'ठिकाने' लगाया गया था?
अजीत मिश्रा (खोजी)
।। खलीलाबाद हादसा: सबूत मिटाने की साजिश या इत्तेफाक? 24 घंटे बाद ‘सुलगती’ डीसीएम ने खड़े किए गंभीर सवाल।।
बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।
संतकबीरनगर। खलीलाबाद के मगहर में सोमवार को हुए उस खौफनाक मंजर की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी, जिसमें दो पत्रकारों की जान चली गई, कि मंगलवार दोपहर एक नई ‘अग्नि-लीला’ ने पूरे मामले को संदिग्ध बना दिया। जिस डीसीएम ने दो घरों के चिराग बुझाए, वह पुलिस की नाक के नीचे धू-धू कर जल गई। सवाल यह है कि क्या यह महज एक हादसा है, या फिर साक्ष्यों को खाक करने की कोई गहरी साजिश?
सवालों के घेरे में ‘रहस्यमयी’ आग
सोमवार भोर में रसूलाबाद के पास डिवाइडर फांदकर कार को रौंदने वाली डीसीएम नेशनल हाईवे पर ही खड़ी थी। बताया गया था कि इसमें लीची ड्रिंक की बोतलें लदी थीं। लेकिन मंगलवार दोपहर करीब 3 बजे अचानक लगी आग ने कई पेचीदा सवाल छोड़ दिए हैं:
गायब सामान का रहस्य: सूत्रों का दावा है कि जब आग लगी, तब गाड़ी खाली थी। अगर ऐसा है, तो लदा हुआ माल कहाँ गया? क्या आग लगने से पहले सामान ‘ठिकाने’ लगाया गया था?
24 घंटे बाद ही क्यों?: खड़ी गाड़ी में अचानक आग लगना गले नहीं उतर रहा। क्या यह हादसा था या फिर गाड़ी के भीतर मौजूद किसी ऐसे सबूत को मिटाने की कोशिश, जो जाँच की दिशा बदल सकता था?
पुलिस की चौकसी पर प्रश्नचिह्न: पत्रकारों की मौत से जुड़े इतने संवेदनशील मामले में दुर्घटनाग्रस्त वाहन की सुरक्षा सुनिश्चित क्यों नहीं की गई?
साजिश की बू, जांच पर टिकी निगाहें
स्थानीय लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों के बीच इस घटना को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं व्याप्त हैं। लोगों का सीधा आरोप है कि साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करने के लिए सुनियोजित तरीके से आग लगाई गई है। वाहन स्वामी रमाकांत यादव की सूचना पर फायर ब्रिगेड ने आग तो बुझा दी, लेकिन तब तक डीसीएम और उसके भीतर का सच (सामान) पूरी तरह स्वाहा हो चुका था।
बड़ा सवाल: जिस डीसीएम ने दो पत्रकारों की जान ली और दो को अस्पताल पहुँचाया, उसका इस तरह ‘राख’ हो जाना क्या पुलिसिया तफ्तीश को कमजोर करने की कोशिश है?
निष्कर्ष
चौकी प्रभारी विनोद कुमार यादव और उनकी टीम अब इस आग के कारणों की तलाश में जुटी है। लेकिन जनता की अदालत में पुलिस और सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लग चुके हैं। क्या विभाग इस ‘अग्निकांड’ के पीछे के असली चेहरों को बेनकाब कर पाएगा, या फिर पत्रकारों की मौत का यह मामला भी राख की ढेर में दबकर रह जाएगा?















