
वंदेभारतलाइवटीव न्युज, मंगलवार 24 फरवरी 2026।
*होली विशेषांक *
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सभी माताओं बहनों भाईयों को होली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं।।
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====-:: आज मंगलवार 24 फरवरी से होलाष्टक प्रारंभ हो रहा है। होली त्योहार आने के पहले आठ दिनों को होलाष्टक कहते हैं। होलाष्टक इन आठ दिनों के दौरान शुभ मांगलिक कार्यों के लिए मुहूर्त नहीं रहते हैं, होलाष्टक के दौरान मांगलिक कार्य वर्जित माना जाता है। होलिका दहन होने के बाद होलाष्टक भी समाप्त हो जाता है। इस वर्ष 2026 में होलीका दहन, फाल्गुन मास पूर्णिमा पर चंद्रग्रहण भी होगा। तिथियों के घटने बढ़ने और पूर्णिमा पर होने वाले चंद्रग्रहण के कारण होली मनाने की तारीख को लेकर भी पंचांग भेद है। कुछ पंचांग मे 03 फरवरी 2026, तथा कुछ पंचांग में 04 फरवरी 2026 होली त्योहार मनाने की तारीख बता रहें हैं। 03 मार्च मंगलवार 2026 को चंद्रग्रहण दोपहर में भारतीय समयानुसार 03:20 बजे शुरू होगा, और शाम को 06:47 बजे यह चंद्रग्रहण समाप्त होगा। भारत में यह चंद्रग्रहण स्पष्ट रूप से दिखाई देगा, अत: इस चंद्रग्रहण का सूतककाल भी देश में मान्य रहेगा। चंद्रग्रहण शुरू होने से लगभग नौ घंटे पहले ही ग्रहण का सूतककाल शुरू हो जाता है। 03 मार्च मंगलवार को सुबह करीब 06:20 बजे चंद्रग्रहण का सूतककाल शुरू हो जायेगा, और यह सूतककाल शाम के 06:47 बजे चंद्रग्रहण के समाप्त होते ही समाप्त होगा। धार्मिक मान्यतानुसार ग्रहण और सूतककाल के दौरान शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं, इसके अनुसार ज्योतिषविदों का यह मानना है कि 03 मार्च को होली रंग गुलाल आदि खेलना उचित नही है। ग्रहण के दौरान मानसिक रूप से अपने ईष्टदेव ईश्वर के मंत्रों का जाप, दान- पुण्य आदि कर्म करना चाहिए। इस बार होली पर चंद्रग्रहण और ग्रहण का सूतककाल होने से 04 मार्च बुधवार 2026 को (धुलंडी) होली मनाए जाने की सलाह भी दी जा रही है। कुछ पंचांग में 03 मार्च मंगलवार को होली की सलाह दी गई है। फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष अष्टमी की तिथि से होलाष्टक प्रारंभ हो जाता है। होलाष्टक का तात्पर्य यह है कि – होली आने से पहले आठ दिनों का समय। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार होली के आठ दिन पहले होलाष्टक के दौरान शुभ मांगलिक कार्य जैसे कि गृह प्रवेश, विवाह, बच्चों के नामकरण संस्कार आदि के शुभ मुहूर्त नहीं रहते हैं, होलाष्टक के दौरान ग्रहों की स्थिति उग्र हो जाती है, और ग्रहों की उग्रता के कारण ही मांगलिक शुभ कार्यों के लिए मुहूर्त नहीं बनते हैं। धार्मिक कथनानुसार- असुरराज हिरण्य कश्यपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवान विष्णु की भक्ति करने के कारण अनेक प्रकार से यातनाएं दी थी। इन यातनाओं के बावजूद भी प्रह्लाद की विष्णु भक्ति अटूट रही। अंत में परेशान होकर हिरण्य कश्यप ने अपनी बहन होलिका जिसे की अग्नि में नहीं जलने का वरदान प्राप्त था, होलिका को प्रह्लाद को गोद मे लेकर अग्नि में बैठने को कहा। किन्तु होलिका के अग्नि में बैठते ही ईश्वर की कृपा से प्रह्लाद तो अग्नि से सुरक्षित रूप से बच गए, और होलिका अग्नि में जलकर पूरी तरह से भस्म हो गई। और तभी से ही होलिका दहन की यह परंपरा होलिका दहन जो कि बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व भी माना जाता है, मनाया जाने लगा। होलिका जब भक्त प्रह्लाद को गोद मे लेकर अग्नि मे बैठी और जलकर भस्म हो गई वह दिन फाल्गुन मास पूर्णिमा का दिन था। ।।। होलाष्टक के आठ दिन के दौरान ईश्वर का चिंतन, जप तप, ध्यान करना चाहिए। इस दौरान शिवलिंग पर जल दूध, बिल्व पत्र, अर्पित करते हुए शिव पंचाक्षरी मंत्र “ॐ नम: शिवाय का जप करना चाहिए। हनुमान जी की मूर्ति के समक्ष दीपक प्रज्वलित कर हनुमान चालिसा का पाठ करना, रामायण सुंदरकांड का पाठ करना उत्तम रहता है।।इस दौरान दान पुण्य, हवन ध्यान, शुभ मंगलदायक होता है। परंपरा अनुसार होलाष्टक और ग्रहण के दौरान धैर्य, संयम, साधना पर अधिक ध्यान देना चाहिए। प्राचीनकाल पुराने समय से चली आ रही यह मान्यता रही है कि होलाष्टक के दौरान और ग्रहण काल पर मांगलिक शुभ कार्यों में रूकावट या परेशानी आ सकती है, इसलिए इस समय पर मांगलिक कार्य करने को वर्जित माना जाता है। धार्मिक मान्यतानुसार होलाष्टक के दौरान आठ दिनों में प्रत्येक ग्रह प्रभावशाली माना जाता है, ऐसा कहा जाता है कि इन दिनों में मानव मन भी थोड़ा अस्थिर रह सकता है, और नकारात्मक शक्ति बढ़ सकती है। इसी कारण से होली आने से आठ दिन पहले होलाष्टक के दिनों में अपने मन को शांत रखने तथा विवाद आदि से दूर रहने की भी सलाह बड़े बुजुर्ग देते हैं। होलाष्टक के दौरान जहां तक हो सके शराब मांस आदि तामसिक चींजों से बचना चाहिए, और नकारात्मक सोच से भी बचने की कोशिश करनी चाहिए। इस दौरान घर में रोज दीप प्रज्वलित करके सकरात्मक माहौल बनाने की कोशिश करनी चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इन दिनों में संयम और सादगीपूर्ण रहने से नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं मन को शांति मिलती है। होलाष्टक के अंत में होलिका दहन वाले दिन शुभ मुहूर्त पर विधि विधान से होलिका की पूजा करनी चाहिए, ऐसी मान्यता है कि होलिका पूजन से जीवन में आने वाली व्याधि नकारात्मक शक्तियां दूर होती है और जीवन में सुख सौभाग्य की प्राप्ति होती है। प्राचीन धार्मिक मान्यतानुसार होलाष्टक का यह समय भक्त प्रह्लाद की यातनाओं और कामदेव होलिका के भस्म होने जुड़ा हुआ है, इसलिए इस समय को संयम और साधना काल भी माना जाता है। होलाष्टक के दौरान नये काम करने से भले ही वर्जित माना जाता है परंतु होलाष्टक का यह समय ईश्वर भक्ति साधना के लिए बहुत ही शक्तिशाली समय होता है। इन दिनों में भगवान विष्णु और महादेव भोलेनाथ का मंत्र जाप करना विशेष फलदायक सिद्ध होता है। ( उपरोक्त जानकारी धार्मिक आस्था विश्वास और लोक मान्यताओं पर आधारित है। हम किसी भी अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते हैं। पाठकगण स्वविवेक से निर्णय ले सकते है। )




