अजीत मिश्रा (खोजी)
विशेष रिपोर्ट: बस्ती रेडक्रॉस में ‘लोकतंत्र’ का चीरहरण; सेवा के नाम पर ‘सिंडिकेट’ का कब्जा!
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
- कुर्सी के लिए ‘ईमान’ की नीलामी? आखिर किस लालच में रेडक्रॉस के सूरमाओं ने बदला पाला?
- वफा के बदले ‘बेवफाई’: बंद कमरे की साजिश ने रेडक्रॉस की साख को किया तार-तार!
- नियमों की धज्जियां: बिना साधारण सभा की बैठक, कैसे बन गए संतोष सिंह ‘सभापति’?
- डीएम की अनुमति का इंतज़ार या कानून को ठेंगा? रेडक्रॉस में ‘जबरन’ ताजपोशी पर उठे सवाल!
- शर्मनाक! जिनके खिलाफ लाए थे ‘अविश्वास प्रस्ताव’, उन्हीं की गोद में जा बैठे कल के विद्रोही!
- गिरगिट भी शरमा जाए: बस्ती रेडक्रॉस में ‘राजनीतिक रंग’ बदलने की रेस, सेवा हुई गौण!
- साजिश का ‘सिंडिकेट’: बस्ती रेडक्रॉस में मानवता शर्मसार, रसूखदारों का कब्जा!
- रेडक्रॉस कांड: ‘डर्टी गेम’ के खिलाड़ी बेनकाब, बस्ती की जनता पूछ रही— आखिर कितनी बड़ी थी डील?
- सेवा के नाम पर ‘सियासी अखाड़ा’ बना बस्ती रेडक्रॉस, इतिहास नहीं करेगा माफ!
बस्ती। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में मानवता की सेवा का पर्याय कही जाने वाली ‘इंडियन रेडक्रॉस सोसाइटी’ आज भ्रष्टाचार, गुटबाजी और अवसरवादिता के दलदल में फंसी नजर आ रही है। अखबार के पन्नों से लेकर गलियों की चर्चा तक, हर तरफ एक ही सवाल गूँज रहा है— “वो कौन सी बड़ी डील थी, जिसके लिए वफादारी की सरेआम नीलामी कर दी गई?” जनपद में सेवा और मानवता का प्रतीक मानी जाने वाली ‘इंडियन रेडक्रास सोसाइटी’ इन दिनों चर्चा में है, लेकिन अपनी सेवा के लिए नहीं, बल्कि उस ‘डर्टी गेम’ के लिए जिसने संस्था की गरिमा को तार-तार कर दिया है। सवाल हवा में तैर रहा है— आखिर ऐसी कौन सी ‘डील’ हुई कि अपनों को ही ‘बेवफाई’ का कड़वा घूंट पीना पड़ा?
साधारण सभा को ठेंगा, बंद कमरे में ‘चेयरमैन’ का चयन?
जीबीएम स्कूल के संतोष सिंह को नया सभापति बनने पर बधाई तो मिल रही है, लेकिन इस चयन की प्रक्रिया ने पूरी व्यवस्था पर ही सवालिया निशान लगा दिए हैं। नियम कहते हैं कि चयन साधारण सभा की बैठक में होना चाहिए, लेकिन यहां खेल ‘बंद कमरे’ में खेला गया। बुद्धिजीवियों का सवाल सीधा है— जब डीएम ने अभी तक डॉ. प्रमोद चौधरी का इस्तीफा मंजूर ही नहीं किया, तो आनन-फानन में संतोष सिंह की ताजपोशी का आधार क्या है? क्या रेडक्रास अब सेवा की जगह राजनीति का अखाड़ा बन चुका है?
नियमों की धज्जियां: बंद कमरा और गुप्त ‘डील’
रेडक्रॉस के संविधान को ताक पर रखकर जिस तरह संतोष सिंह की ताजपोशी की गई, उसने प्रशासनिक शुचिता पर कालिख पोत दी है। नियमानुसार, किसी भी नए सभापति का चयन ‘साधारण सभा’ (General Body) की बैठक में पारदर्शी तरीके से होना चाहिए था। लेकिन बस्ती में लोकतंत्र का गला घोंटते हुए इस चयन को एक ‘बंद कमरे’ की साजिश तक सीमित कर दिया गया।
बड़ा सवाल: आखिर ऐसी क्या जल्दबाजी थी कि बिना किसी सार्वजनिक सूचना या लोकतांत्रिक प्रक्रिया के, गुपचुप तरीके से नए सभापति का नाम घोषित कर दिया गया?
अविश्वास से ‘अति-विश्वास’ का सफर: नैतिकता का जनाजा
इस पूरे ड्रामे का सबसे शर्मनाक पहलू एल.के. पांडेय (उपाध्यक्ष) और राजेश कुमार ओझा (कोषाध्यक्ष) के इर्द-गिर्द घूमता है। कुछ समय पहले तक जो लोग इन पदाधिकारियों के खिलाफ ‘अविश्वास प्रस्ताव’ लेकर सड़कों पर उतरे थे, आज वही लोग उनके बगल में बैठकर ठहाके लगा रहे हैं।
- आखिर वह कौन सा ‘जादुई समझौता’ था जिसने कल के ‘दुश्मनों’ को आज का ‘परम मित्र’ बना दिया?
- क्या बस्ती के प्रबुद्ध वर्ग को यह नहीं दिख रहा कि यह केवल कुर्सी बचाने और बंदरबांट करने का एक ‘डर्टी गेम’ है?
अविश्वास का ‘यू-टर्न’: कल तक दुश्मन, आज ‘विश्वासपात्र’!
इस पूरी पटकथा के सबसे हैरान करने वाले पात्र वे लोग हैं जिन्होंने कल तक उपाध्यक्ष एल.के. पांडेय और कोषाध्यक्ष राजेश कुमार ओझा के खिलाफ ‘अविश्वास प्रस्ताव’ का झंडा बुलंद किया था। आखिर रातों-रात ऐसा कौन सा चमत्कार हुआ कि जिन पर अविश्वास था, उन्हीं की अध्यक्षता में नए सभापति का चयन स्वीकार कर लिया गया?
- क्या इसे ही अवसरवादी राजनीति कहते हैं?
- किस लालच में निष्ठा की चादर बदल दी गई?
- क्या पैसे और रुतबे की हनक ने सिद्धांतों का गला घोंट दिया?
- मदद के बदले ‘धोखा’: अहसान का बदला बेवफाई से!
रेडक्रास सोसाइटी के गलियारों में चर्चा है कि जिन लोगों ने डॉ. प्रमोद चौधरी, एल.के. पांडेय और राजेश ओझा को हटाने के लिए मोर्चा खोला था, वे अचानक उन्हीं के पाले में कैसे जा खड़े हुए? जिस व्यक्ति ने रेडक्रास को पहचान दी, उसे ही किनारे लगा दिया गया। यह केवल सत्ता का परिवर्तन नहीं, बल्कि उन लोगों के साथ विश्वासघात है जो इसे एक निष्पक्ष संस्था मानते थे।
डॉ. प्रमोद चौधरी का इस्तीफा: रहस्य या साजिश?
एक तरफ डॉ. प्रमोद चौधरी का इस्तीफा अभी तक जिला प्रशासन (DM) द्वारा औपचारिक रूप से मंजूर नहीं किया गया, तो दूसरी तरफ नई कुर्सी बिछा दी गई। यह सीधा-सीधा प्रशासनिक अनुशासनहीनता और सत्ता की हनक का प्रदर्शन है। जिस व्यक्ति ने रेडक्रॉस को सींचा, उसे ही साजिशों के मकड़जाल में फंसाकर बाहर का रास्ता दिखाना, उन सभी लोगों के लिए एक चेतावनी है जो ईमानदारी से काम करना चाहते हैं।
साख पर बट्टा: ‘वफा’ के बदले ‘बेवफाई’
रेडक्रॉस में सालों से काम कर रहे निस्वार्थ कार्यकर्ताओं के मन में आज भारी आक्रोश है। चर्चा है कि जो लोग इस पूरे ‘तख्तापलट’ के सूत्रधार रहे हैं, उन्होंने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए संस्था की साख को गिरवी रख दिया है। यह केवल एक पद का परिवर्तन नहीं है, बल्कि उन दानदाताओं और शुभचिंतकों के साथ धोखा है जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई इस संस्था को दी थी। बस्ती की जनता देख रही है कि कैसे सेवा के मंदिर को ‘राजनीति का अखाड़ा’ बनाया जा रहा है। बार-बार पाला बदलने वाले ये ‘सियासी गिरगिट’ शायद यह भूल रहे हैं कि इतिहास में उनकी पहचान सेवादारों के रूप में नहीं, बल्कि ‘डील’ करने वालों के रूप में दर्ज होगी।
बस्ती की जनता पूछ रही है सवाल…
गुटबाजी और खींचतान के इस तमाशे ने यह साफ कर दिया है कि यहाँ सेवा गौण और पद की लोलुपता सर्वोपरि है। अगर दस में से एक व्यक्ति भी असंतुष्ट है, तो वह सहमति नहीं, बल्कि ‘जबरन थोपा गया निर्णय’ है।
सावधान! रेडक्रास सोसाइटी जैसी पवित्र संस्था में यह ‘सियासी वायरस’ आने वाले समय में इसके वजूद को खत्म कर सकता है। जिन लोगों ने ‘वफा के बदले बेवफाई’ की है, उन्हें इतिहास शायद ही माफ करे। अगर अब भी जिला प्रशासन ने हस्तक्षेप नहीं किया और इस अवैध चयन प्रक्रिया की जांच नहीं कराई, तो बस्ती रेडक्रॉस सोसाइटी केवल कुछ रसूखदारों की निजी जागीर बनकर रह जाएगी।
बस्ती मंडल ब्यूरो उत्तर प्रदेश










