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श्री सुदामा कुटी के लोकार्पण के अवसर पर बोलते हुए द्वाराचार्य सुतीक्ष्ण दास महाराज ने कहा भगवान राम की भक्ति ही कल्याण का मार्ग हरिद्वार 

विजय कुमार बंसल हरिद्वार ब्यूरो

श्री सुदामा कुटी के लोकार्पण के अवसर पर बोलते हुए द्वाराचार्य सुतीक्ष्ण दास महाराज ने कहा भगवान राम की भक्ति ही कल्याण का मार्ग हरिद्वार 20260426 172354 COLLAGE

भूपतवाला स्थित श्री सुदामा कुटी भागीरथी नगर के लोकार्पण के अवसर पर बोलते हुए प्रातः स्मरणीय सतगुरु देव जगद्गुरु द्वाराचार्य नाभा पीठाधीश्वर परम पूज्य सुतीक्ष्ण दास महाराज ने कहाजब मनुष्य के हृदय में भगवान श्रीराम की अनन्य, निष्काम और अटूट भक्ति गहराई से बस जाती है, तब उसका संपूर्ण जीवन एक नई दिशा और नई चेतना से भर जाता है। धीरे-धीरे उसके भीतर से सांसारिक आकर्षणों का प्रभाव कम होने लगता है, क्योंकि जिस मन ने प्रभु के नाम और स्वरूप का रस चख लिया हो, उसे फिर साधारण भोग-विलास फीके लगने लगते हैं। ऐसा व्यक्ति संसार में रहते हुए भी संसार से बंधा नहीं रहता, बल्कि एक साक्षी भाव में स्थित होकर अपने कर्म करता है। उसके लिए धन, पद, मान और प्रतिष्ठा का आकर्षण क्षीण हो जाता है और हृदय में केवल एक ही भाव स्थिर रहता है कि हर कार्य प्रभु की प्रसन्नता के लिए हो। यही वह अवस्था है जहाँ वैराग्य अपने आप जन्म लेता है, क्योंकि जब मन ईश्वर से जुड़ जाता है तो संसार का बंधन स्वतः ढीला पड़ने लगता है। इस अवसर पर बोलते हुए महंत श्री अमर दास महाराज ने कहा

श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता इस दिव्य प्रेम और भक्ति का अत्यंत पवित्र उदाहरण है, जहाँ न कोई स्वार्थ था, न कोई अपेक्षा, केवल निश्छल प्रेम और गहरी श्रद्धा थी। सुदामा जैसे अत्यंत निर्धन और साधारण जीवन जीने वाले भक्त के हृदय में जब श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति का सागर उमड़ा, तो उनकी दशा और दिशा दोनों ही बदल गईं। उन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं माँगा, केवल अपने मित्र के दर्शन और स्मरण में ही आनंद पाया, और इसी निष्काम भाव ने उनके जीवन को इतना ऊँचा उठा दिया कि स्वयं भगवान ने उनकी निर्धनता को समृद्धि में बदल दिया। यह कथा यह सिखाती है कि भक्ति केवल भावनाओं का नाम नहीं, बल्कि आत्मा की वह अवस्था है जहाँ अहंकार समाप्त हो जाता है और केवल ईश्वर ही शेष रह जाते हैं।जब कोई मनुष्य अपने जीवन में सच्चे मन से ईश्वर की भक्ति को धारण कर लेता है, तो उसके विचारों में पवित्रता आने लगती है, उसके शब्दों में मधुरता आ जाती है और उसके कर्मों में एक स्वाभाविक धर्मशीलता प्रकट होने लगती है। ऐसा व्यक्ति किसी के प्रति द्वेष नहीं रखता, बल्कि सभी जीवों में परमात्मा का अंश देखता है। उसके हृदय में करुणा, दया और प्रेम का प्रवाह निरंतर बहता रहता है। वह सुख और दुख दोनों अवस्थाओं में समान भाव से स्थित रहने लगता है, क्योंकि उसका आधार अब बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि आंतरिक भक्ति होती है।धीरे-धीरे उसके जीवन में एक ऐसा प्रकाश फैलने लगता है जो केवल उसे ही नहीं बल्कि उसके संपर्क में आने वाले अन्य लोगों को भी प्रभावित करता है। उसकी उपस्थिति ही शांति का अनुभव कराती है, उसकी वाणी ही सांत्वना देती है और उसका आचरण ही प्रेरणा बन जाता है। अंततः ऐसी भक्ति मनुष्य के जीवन को केवल सफल ही नहीं बनाती, बल्कि उसे पूर्ण रूप से सार्थक कर देती है, जहाँ वह अपने जन्म को ईश्वर की सेवा और प्रेम के मार्ग में समर्पित कर देता है और जीवन के परम उद्देश्य, अर्थात आत्मिक शांति और परमात्मा की प्राप्ति की ओर अग्रसर हो जाता है। इस अवसर पर आयोजित विशाल भंडारे में हरिद्वार के अनेकों मठ मंदिर आश्रमों के संत महापुरुषों ने भोजन प्रसाद ग्रहण किया इस अवसर पर महंत श्री राम किशोर दास महाराज महंत राम रतन दास महाराज जगतगुरु रामानंदाचार्य श्री जयरामदास महाराज महंत अमर दास महाराज भक्ति मुकेश धीमन लक्सर अशोक धीमान श्री अमित बंसल मयंक बंसल दिल्ली सहित भारी संख्या में संत तथा भक्त उपस्थित थे

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