बस्ती आरटीओ: भ्रष्टाचार का ‘हाइवे’, जहां कागजों पर दौड़ रहे भारी वाहन और रेंग रहा सिस्टम
बस्ती RTO बना 'भ्रष्टाचार का हाइवे': अरुणाचल के फर्जी कागजों पर बस्ती में बन रहे 'हैवी' लाइसेंस! मुर्दा सिस्टम, ज़िंदा दलाल: करोड़ों के टेस्टिंग ट्रैक पर धूल, आरटीओ में 'सुविधा शुल्क' का बोलबाला!
अजीत मिश्रा (खोजी)
विशेष रिपोर्ट: बस्ती आरटीओ बना ‘भ्रष्टाचार का जंक्शन’, अरुणाचल के रास्ते बन रहे फर्जी हैवी लाइसेंस
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
- यूपी के बस्ती में अरुणाचल का ‘खेल’: बैकलॉग एंट्री के जरिए माफिया काट रहे सुरक्षा की जेब!
- सेंसर खराब, सिम्युलेटर बंद; फिर भी बस्ती आरटीओ में रोज ‘पास’ हो रहे 40 ड्राइवर!
- साहब कहते हैं ‘सत्यापन’ का नियम नहीं, दलाल बोले- ‘पैसा दो, घर बैठे लाइसेंस लो’!
- डिजिटल इंडिया को ठेंगा: बस्ती में बाबू और दलालों के सिंडिकेट ने ‘सारथी पोर्टल’ को बनाया उगाही का जरिया!
- बस्ती आरटीओ एक्सपोज़: 4 हजार में LMV और 20 हजार में हैवी डीएल, दलालों की मुट्ठी में पूरा विभाग!
- गोरखपुर से आए ‘शातिर बाबू’ का जलवा, फाइलों के पहिए घुमाने के लिए तय है मोटी रकम!
- सावधान! आपकी सड़क पर दौड़ रहे हैं ‘फर्जी’ हैवी ड्राइवर, बस्ती परिवहन विभाग का खौफनाक कारनामा!
बस्ती। उत्तर प्रदेश का परिवहन विभाग इन दिनों भ्रष्टाचार के ऐसे ‘सर्कस’ में तब्दील हो गया है, जहां नियम-कायदे केवल कागजों तक सीमित हैं। बस्ती मंडल के संभागीय परिवहन कार्यालय (RTO) और ड्राइविंग ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (DTI) में एक ऐसा संगठित गिरोह सक्रिय है, जो सरकारी पोर्टल की खामियों का फायदा उठाकर देश की सुरक्षा और सड़कों पर चलने वाले राहगीरों की जान से खिलवाड़ कर रहा है। यहाँ ‘बैकलॉग एंट्री’ के नाम पर जो खेल खेला जा रहा है, उसके तार उत्तर-पूर्वी राज्य अरुणाचल प्रदेश तक जुड़े हुए हैं।
1. अरुणाचल का ‘बैकलॉग’ कनेक्शन: ऐसे होता है फर्जीवाड़ा
जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि बस्ती में बैठे दलाल अरुणाचल प्रदेश और अन्य सुदूर राज्यों के परिवहन कार्यालयों से मिलीभगत कर वर्ष 2013 या उससे पुरानी तारीखों में ‘मैनुअल’ ड्राइविंग लाइसेंस तैयार करवाते हैं।
बस्ती परिवहन विभाग में भारी वाहनों के फर्जी डीएल बनाने का एक ऐसा सिंडिकेट सक्रिय है, जिसके तार सात समंदर पार नहीं तो सात राज्यों पार ‘अरुणाचल प्रदेश’ से जरूर जुड़े हैं। जाँच में खुलासा हुआ है कि वर्ष 2013 की पिछली तारीखों में अरुणाचल प्रदेश और अन्य राज्यों से फर्जी मैनुअल डीएल तैयार कराए जाते हैं। इसके बाद ‘सार्थी पोर्टल’ पर इनकी ‘बैकलॉग एंट्री’ कर दी जाती है।
जैसे ही यह डेटा पोर्टल पर दिखने लगता है, बस्ती के दलाल सक्रिय होकर फर्जी एड्रेस प्रूफ के जरिए यहाँ का पता बदलवा देते हैं। इस खेल में विभाग के ‘बाबू’ और ‘अधिकारी’ इस कदर शामिल हैं कि बिना किसी एनओसी (NOC) या सत्यापन के इन्हें धड़ल्ले से मंजूरी दी जा रही है।
- ऑनलाइन एंट्री का खेल: इन मैनुअल लाइसेंसों को ‘सारथी पोर्टल’ पर बैकलॉग एंट्री के जरिए डिजिटल किया जाता है।
- पता बदलने का खेल: जैसे ही डेटा पोर्टल पर दिखने लगता है, बस्ती के दलाल सक्रिय हो जाते हैं। स्थानीय पते का फर्जी ‘एड्रेस प्रूफ’ लगाकर आवेदन किया जाता है और रातों-रात अरुणाचल का लाइसेंस बस्ती के पते पर तब्दील हो जाता है।
- बिना वेरिफिकेशन मंजूरी: विभागीय मिलीभगत ऐसी है कि न तो पिछले पते का सत्यापन किया जाता है और न ही एनओसी (NOC) की मांग की जाती है। सीधे ‘अप्रूवल’ देकर हैवी लाइसेंस जारी कर दिए जाते हैं।
2. डीटीआई का ‘सफेद हाथी’: करोड़ों का ट्रैक बंद, दलाली चालू
बस्ती के ड्राइविंग ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (DTI) की हालत और भी बदतर है। यहाँ करोड़ों की लागत से बना ‘ऑटोमेटेड टेस्टिंग ट्रैक’ और ‘सिम्युलेटर मशीन’ सफेद हाथी साबित हो रहे हैं।
- सिस्टम फेल, दलाली पास: जहाँ टेस्ट ट्रैक पर सेंसर और कैमरों की निगरानी में टेस्ट होना चाहिए, वहाँ सब कुछ मैनुअल हो रहा है।
- रेट लिस्ट फिक्स: यहाँ आवेदक खुद चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि एलएमवी (LMV) लाइसेंस के लिए 4 हजार और हैवी डीएल के लिए 18 से 20 हजार रुपये की ‘सुविधा शुल्क’ (रिश्वत) वसूली जा रही है।
- प्रतिदिन का राजस्व: अनुमान के मुताबिक, इस कार्यालय में रोजाना केवल दलाली के जरिए 1 लाख रुपये से अधिक की अवैध वसूली की जा रही है, जो ऊपर से नीचे तक बंदरबांट का हिस्सा बनती है।
बस्ती में करोड़ों रुपये की लागत से बना ड्राइविंग ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (DTI) भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है। यहाँ की स्थिति किसी से छिपी नहीं है:
- बंद पड़ी मशीनें: यहाँ आधुनिक टेस्टिंग ट्रैक और सिम्युलेटर मशीनें धूल फांक रही हैं। सेंसर और कैमरे खराब पड़े हैं।
- मैनुअल टेस्ट का ड्रामा: जब मशीनें बंद हैं, तो टेस्ट कैसे हो रहा है? जवाब है- ‘कागजी खानापूर्ति’। बिना किसी वास्तविक टेस्ट के ही आवेदकों को पास कर दिया जाता है।
- रिश्वत की फिक्स दरें: आवेदकों के मुताबिक, एलएमवी (LMV) लाइसेंस के लिए 4,000 रुपये और हैवी डीएल (Heavy DL) के लिए 18,000 से 30,000 रुपये तक की अवैध वसूली दलालों द्वारा की जा रही है। यह पैसा ऊपर तक के अधिकारियों और बाबूओं में ‘सुविधा शुल्क’ के नाम पर बंटता है।
3. ‘शातिर बाबू’ और दलालों का सिंडिकेट
कार्यालय के भीतर की चर्चाओं की मानें तो गोरखपुर से स्थानांतरित होकर आए एक ‘शातिर बाबू’ ने यहाँ आते ही अपना सिक्का जमा लिया है। इस बाबू के संरक्षण में दलालों का एक ऐसा सिंडिकेट काम कर रहा है जो सीधे आरआई (RI) और आरटीओ (RTO) के दफ्तरों में दखल रखता है। हालत यह है कि बायोमेट्रिक कक्ष के बाहर संविदा कर्मियों के नाम पर दलाल तैनात हैं, जो फाइलों को एक पटल से दूसरे पटल तक पहुंचाते हैं।
4. जिम्मेदारी से बचते अधिकारी: “हमें तो बस डेटा देखना है”
जब इस महा-फर्जीवाड़े पर अधिकारियों से सवाल किया गया, तो उनके जवाब हैरान करने वाले थे। संभागीय निरीक्षक (RI) सीमा गौतम का कहना है कि शासन ने एनओसी की अनिवार्यता खत्म कर दी है, इसलिए वे केवल डेटा देखकर अप्रूवल दे देते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या विभाग की जिम्मेदारी केवल ‘बटन दबाना’ है? क्या फर्जी पतों और संदिग्ध दस्तावेजों की जांच करना उनकी ड्यूटी का हिस्सा नहीं?
5. शासन में हलचल, मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचा मामला
जब यह मामला उजागर हुआ, तो लखनऊ तक हड़कंप मच गया।
- मंत्री की सक्रियता: परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह ने मामले की फाइलें तलब की हैं।
- तात्कालिक कार्रवाई: फिलहाल अरुणाचल प्रदेश से बैकलॉग एंट्री कराकर आए 8 संदिग्ध डीएल को ब्लॉक कर दिया गया है।
- विस्तृत जांच: पिछले 6 महीनों के दौरान जारी किए गए सभी हैवी लाइसेंसों के डेटा को खंगाला जा रहा है।
निष्कर्ष: बस्ती आरटीओ में चल रहा यह खेल सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि सड़क सुरक्षा के साथ किया जा रहा एक बड़ा अपराध है। बिना टेस्ट के हैवी लाइसेंस लेकर जब अनाड़ी चालक सड़कों पर ट्रक और बसें दौड़ाएंगे, तो होने वाली मौतों का जिम्मेदार कौन होगा? क्या योगी सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत इन भ्रष्ट बाबूओं और अधिकारियों पर बुलडोजर चलेगा या जांच के नाम पर केवल लीपापोती होगी?क्या यह जाँच केवल निचले स्तर के मोहरों तक सीमित रहेगी या उन ‘सफेदपोश’ अधिकारियों पर भी गाज गिरेगी जिनकी नाक के नीचे सालों से यह करोड़ों का भ्रष्टाचार पनप रहा है? बस्ती की जनता पूछ रही है कि आखिर कब तक परिवहन विभाग की फाइलों में ‘भ्रष्टाचार का यह इंजन’ बिना किसी ब्रेक के दौड़ता रहेगा?
बस्ती की जनता की नजरें अब कार्रवाई पर टिकी हैं।









