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जब ‘नेताजी’ बेईमानों का नहीं ‘उखाड़’ पा रहे, तो ईमानदारों का क्या ‘उखाड़ेंगे’?

बस्ती में 'सिफारिशी राज': जब नेताजी बेईमानों के ढाल बन जाएं, तो ईमानदारी का जनाजा निकलना तय है! कुर्सी नेताओं की, कलम ठेकेदारों की: बस्ती प्रशासन में 'बाबूजी' की पर्ची पर बंट रहा है सरकारी खजाना।

अजीत मिश्रा (खोजी)

विशेष रिपोर्ट: बस्ती में ‘सिफारिशी तंत्र’ का नंगा नाच, नियम-कायदों की बलि चढ़ा रहे सत्ता के ‘बाबूजी’

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • रीढ़ विहीन अफसर और लुटेरे नेता: क्या इसी ‘कमीशन मॉडल’ से चमकेगी बस्ती की किस्मत?
  • वाह रे सिस्टम! फाइल खोजने में लगे 3 महीने, ‘आशीर्वाद’ मिलते ही घंटों में हो गया करोड़ों का खेल। ‘मां काली’ के नाम पर ‘काले’ कारनामे: डेढ़ करोड़ का भुगतान और 20 लाख की ‘दक्षिणा’ का खुला खेल।
  • ईमानदारी को ‘ठेंगा’ और बेईमानों को ‘ठेका’: बस्ती के स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार का ‘इमरजेंसी वार्ड’। खाकी और खादी का ‘नापाक’ गठजोड़: नेताजी की घुड़की से थर-थर कांपता बस्ती का प्रशासनिक ढांचा।
  • साहब, आपकी कलम में स्याही है या नेताओं का डर? जांच के नाम पर सिर्फ जनता की आंखों में धूल! तबादले का डर या मलाईदार पोस्टिंग का मोह? क्यों ‘जीरो टॉलरेंस’ वाली सरकार में ‘फुल भ्रष्टाचार’ जारी है?

बस्ती महाभ्रष्टाचार: 70 लाख का फर्जीवाड़ा और कमीशनखोरी की ‘सुनामी’। नेताओं की चौखट पर ‘नतमस्तक’ जिले के आला अफसर! सिफारिश की ‘जहरीली’ फसल: ईमानदार ठेकेदार बाहर, ‘चहेते’ मालामाल।

बस्ती। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अक्सर ‘जीरो टॉलरेंस’ का नारा गूंजता है, लेकिन बस्ती जनपद के प्रशासनिक गलियारों में हकीकत इसके ठीक उलट है। यहाँ विकास की गंगा नहीं, बल्कि ‘कमीशन की धारा’ बह रही है। जिले में इन दिनों एक ही सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है— “जब नेताजी बेईमानों का कुछ उखाड़ नहीं पा रहे, तो ईमानदारों का क्या उखाड़ेंगे?”

यह महज एक व्यंग्य नहीं, बल्कि उस लाचार प्रशासनिक व्यवस्था पर करारा तमाचा है, जहाँ फाइलों का वजन काम से नहीं, बल्कि नेताजी की ‘पर्ची’ और ‘कमीशन’ की गड्डी से तय होता है।

राजनीति के गलियारों में आजकल एक नया मुहावरा गूंज रहा है— ‘सिफारिश की शक्ति’। आम आदमी अगर अपने जायज काम के लिए चप्पलें घिस दे, तो बाबू की फाइल नहीं सरकती, लेकिन अगर नेताजी का एक फोन आ जाए, तो नियम-कानून ताक पर रखकर फाइल रॉकेट की रफ्तार से दौड़ने लगती है। जिले का प्रशासनिक ढांचा आजकल कुछ इसी ‘चुम्बकीय प्रभाव’ में है।हालिया घटनाक्रम ने प्रशासन की शुचिता की बखिया उधेड़ कर रख दी है। चर्चा है कि ‘बाबूजी’ (एक रसूखदार नेता) की एक सिफारिश पर स्वास्थ्य विभाग और विकास भवन के गलियारों में वह सब हो गया, जो शायद किसी निष्पक्ष जांच में मुमकिन नहीं था।

तीन महीने से लापता फाइल, सिफारिश मिलते ही प्रकट हुई

प्रशासनिक कार्यप्रणाली में ‘चमत्कार’ देखना हो तो सीएमओ कार्यालय आइए। सूत्रों के अनुसार, एडी हेल्थ पिछले तीन महीनों से एक महत्वपूर्ण पत्रावली (फाइल) की मांग कर रहे थे, लेकिन विभाग के बाबू और अधिकारी कुंभकर्णी नींद सोए रहे। लेकिन जैसे ही जिले के एक रसूखदार ‘बाबूजी’ का वरदहस्त जय कंस्ट्रक्शन के जनेश्वर चौधरी पर पड़ा, घंटों के भीतर फाइल भी मिल गई और अनुबंध भी हो गया।कहावत है कि ‘ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती’, लेकिन बस्ती मंडल में ‘बाबूजी’ की लाठी (सिफारिश) में इतनी आवाज है कि नियमों की चीखें साफ सुनी जा सकती हैं। मामला सीएमओ कार्यालय से जुड़ा है, जहां एक चहेते ठेकेदार (जय कंस्ट्रक्शन के जनेश्वर चौधरी) का अनुबंध मात्र कुछ ही घंटों में ‘अद्भुत’ तरीके से कर दिया गया। मजेदार बात यह है कि इस अनुबंध की फाइल एडी हेल्थ पिछले तीन महीने से मांग रहे थे, लेकिन फाइल गायब थी। जैसे ही ‘ऊपर’ का दबाव पड़ा, फाइल न सिर्फ प्रकट हुई, बल्कि रातों-रात स्वीकृत भी हो गई।

हैरानी की बात यह है कि जिस अनुबंध को लेकर नियम-कायदों की दुहाई दी जा रही थी, उसे 30 मार्च और 26 मार्च की तारीखों के हेर-फेर के बीच आनन-फानन में निपटा दिया गया। बिना किसी औपचारिकता और अधूरी निविदा के इस अनुबंध को करना यह साबित करता है कि जिले में संविधान नहीं, बल्कि ‘सिफारिशी सुल्तान’ का हुक्म चलता है।

‘मां काली’ के नाम पर डेढ़ करोड़ का खेल!

भ्रष्टाचार का एक और काला अध्याय ‘मां काली’ के नाम से जुड़ी फर्म के साथ लिखा गया। जहाँ एक तरफ सीडीओ (CDO) और सीटीओ (CTO) जांच का ढोंग रच रहे थे, वहीं दूसरी तरफ पर्दे के पीछे खेल हो गया। बिना जांच रिपोर्ट आए ही लगभग डेढ़ करोड़ रुपये का फर्जी भुगतान कर दिया गया।ईमानदारी का ढोंग रचने वाले तंत्र में ‘मां काली’ के नाम पर भी खेल हो गया। एक तरफ जांच लंबित थी, दूसरी तरफ सीटीओ (CTO) साहब ने अमर नाथ यादव को लगभग डेढ़ करोड़ का ‘फर्जी भुगतान’ कर दिया। अब चर्चा आम है कि इस भुगतान को कराने के लिए कथित तौर पर ’20 लाख’ की दक्षिणा का लेन-देन हुआ है। अधिकारी दावे तो जांच के कर रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि एक हाथ से जांच की फाइल खोली जा रही है और दूसरे हाथ से भुगतान के चेक काटे जा रहे हैं।

कहा जा रहा है कि इस भुगतान की राह आसान करने के लिए 20 लाख रुपये की भारी-भरकम ‘दक्षिणा’ का आदान-प्रदान हुआ है। यह वही भुगतान है जिसके लिए अमर नाथ यादव जैसे लोग सीना ठोक कर कह रहे थे कि उन्होंने ‘बड़े अधिकारियों’ को मैनेज कर लिया है।

कमीशन का गणित: ईमानदारी की सज़ा, बेईमानी को मज़ा

जिले में ठेकेदारी का आलम यह है कि काम की गुणवत्ता मायने नहीं रखती, ‘हिस्सा’ मायने रखता है। मां लक्ष्मी ट्रेडिंग के घनश्याम मिश्र का उदाहरण सामने है। आरोप है कि उन्होंने ‘कमीशन’ देने से इनकार किया, तो उनके सिविल कार्यों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। वहीं दूसरी तरफ, चहेते ठेकेदारों को पुराने कार्यों को ही नया दिखाकर 70 लाख रुपये का फर्जी भुगतान टुकड़ों-टुकड़ों में कर दिया गया।विडंबना देखिए, जिले के नेताओं में इतनी हिम्मत नहीं है कि वे किसी ईमानदार अधिकारी को हिला सकें, क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं भेद न खुल जाए। इसीलिए ‘बेईमान’ अधिकारी और ‘चापलूस’ ठेकेदार आज सिस्टम के दामाद बने हुए हैं। जो ठेकेदार (जैसे मां लक्ष्मी ट्रेडिंग के घनश्याम मिश्र) कमीशन देने से मना कर दे, उसका काम रोक दिया जाता है और जो ‘टुकड़ों’ में हिस्सा पहुंचा दे, उसके पुराने और घटिया कामों को भी नया दिखाकर भुगतान कर दिया जाता है।

अधिकारियों की ‘रीढ़ विहीन’ कार्यप्रणाली

सबसे बड़ा सवाल उन आईएएस, आईपीएस और पीसीएस अधिकारियों पर खड़ा होता है, जो जनता के प्रति नहीं बल्कि ‘नेताओं की चौखट’ के प्रति जवाबदेह नजर आ रहे हैं। क्या जिले में एक भी अधिकारी ऐसा नहीं बचा जो नेताजी की आंखों में आंखें डालकर कह सके कि “यह काम गलत है, मैं नहीं करूँगा”?

शायद नहीं, क्योंकि अधिकारियों को पता है कि अगर वे सच बोलेंगे तो ‘बाबूजी’ उनका तबादला करवा देंगे। विधायक से लेकर रसूखदार नेताओं तक का इतना खौफ है कि सीएमओ और सीटीओ जैसे जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग भी ‘कठपुतली’ बने नजर आ रहे हैं।सवाल उन आईएएस, आईपीएस और पीसीएस अधिकारियों पर भी है, जो कुर्सी पर बैठने के बाद ‘रीढ़ की हड्डी’ घर भूल आते हैं। क्या किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि नेताजी को यह समझा सके कि काम गलत है? शायद नहीं, क्योंकि तबादले का डर और मलाईदार पोस्टिंग का मोह स्वाभिमान पर भारी पड़ रहा है।

व्यंग्य का तड़का: “आजकल के नेता और अधिकारी उस जोड़ी की तरह हैं, जहां एक चोरी करता है और दूसरा गवाही देता है। जनता सिर्फ तमाशा देख रही है और टैक्स के पैसे से ‘कमीशन का अमृत’ पिया जा रहा है।”

निष्कर्ष: जनता का पैसा, नेताओं की ऐश

बस्ती की जनता यह देख रही है कि कैसे उनके टैक्स का पैसा फर्जी भुगतानों और कमीशनखोरी की भेंट चढ़ रहा है। गरीब आदमी अपने जायज हक के लिए कतार में खड़ा है, और नेताजी के ‘खास’ लोग सरकारी खजाने में सेंध लगा रहे हैं।

सीडीओ साहब अब जांच की बात कह रहे हैं, लेकिन सवाल वही है— क्या इस जांच में ‘बाबूजी’ के रसूख को हाथ लगाने की हिम्मत है? या फिर पिछली जांचों की तरह इसे भी फाइलों के ढेर में दबा दिया जाएगा?

कड़वा सच: > बस्ती की राजनीति में अब ‘विकास’ नहीं, ‘विनाशकारी भ्रष्टाचार’ का बोलबाला है। यहाँ ईमानदारी एक अपराध है और बेईमानी सफलता की सीढ़ी।

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