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बभनान नगर पंचायत का ‘बेंच घोटाला’: झाड़ियों में सिसक रहा विकास, फाइलों में डकार गए बजट!

शर्मनाक! जनता के पैसे पर 'जंग' की मार: बभनान में विकास की बेंचें बनीं झाड़ियों की शोभा।

अजीत मिश्रा (खोजी)

बभनान में विकास का ‘कबाड़’ मॉडल: झाड़ियों में सड़ रही जनता की गाढ़ी कमाई, जिम्मेदारों ने ओढ़ी चुप्पी

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • बभनान में सरकारी धन की डकैती? चौराहे खाली, झाड़ियों में मिलीं लोहे की बेंचें!
  • चेयरमैन और ईओ की नाक के नीचे बंदरबांट: झाड़ियों में फंसी विकास की गाड़ी, जनता बेहाल।
  • साहब! ये विकास है या विनाश? झाड़ियों में क्यों सड़ रही है जनता की सुविधा?
  •  कागजों पर सज गईं सड़कें, हकीकत में कूड़े के ढेर में पड़ी बेंचें।
  • बभनान का अनोखा ‘विकास मॉडल’: इंसानों के बैठने के लिए बेंच खरीदी, झाड़ियों को दे दी!
  • वाह रे बभनान प्रशासन! राहगीर धूप में खड़े रहे और सरकारी बेंचें झाड़ियों में आराम फरमाती रहीं।

बभनान, बस्ती। सरकारी धन की बंदरबांट और भ्रष्टाचार की दीमक किस कदर विकास कार्यों को चाट रही है, इसका जीता-जागता उदाहरण नगर पंचायत बभनान में देखने को मिला है। जहाँ जनता की सुविधा के लिए खरीदी गई लोहे की बेंचें किसी सार्वजनिक स्थल की शोभा बढ़ाने के बजाय नगर पंचायत कार्यालय के पीछे झाड़ियों में ‘शहीद’ हो रही हैं। यह दृश्य न केवल प्रशासन की संवेदनहीनता को दर्शाता है, बल्कि एक बड़े घोटाले की ओर भी साफ इशारा कर रहा है।

कागजों पर ‘सुविधा’, जमीन पर ‘सफाई’

​नगर पंचायत कार्यालय के पीछे उगी घनी झाड़ियों के बीच दबी ये बेंचें चीख-चीखकर जिम्मेदारों की लापरवाही की कहानी बयां कर रही हैं। नियमानुसार, इन बेंचों को चौराहों, बाजारों या सड़क किनारे स्थापित किया जाना था ताकि बुजुर्गों, राहगीरों और असहाय लोगों को सुस्ताने का सहारा मिल सके। लेकिन बभनान की सत्ता के गलियारों में बैठे ‘सिंडिकेट’ ने शायद जनता की सुविधा से ज्यादा अपनी जेब भरने को प्राथमिकता दी।

घोटाले की बू: क्या भुगतान के लिए हुआ खेल?

​मौके की स्थिति देखकर यह सवाल उठना लाजिमी है कि:

  • ​क्या इन बेंचों की स्थापना कागजों पर दिखाकर बजट का भुगतान करा लिया गया है?
  • ​बेंच के चारों ओर उगी घनी झाड़ियाँ गवाही दे रही हैं कि ये हफ्तों से नहीं, महीनों से यहाँ पड़ी हैं; तो क्या अधिशासी अधिकारी (EO) और अध्यक्ष की आँखों पर पट्टी बंधी थी?
  • ​सरकारी संपत्ति को इस तरह लावारिस छोड़ना क्या वित्तीय गबन की श्रेणी में नहीं आता?

जनता में भारी आक्रोश, उच्चस्तरीय जांच की मांग

​स्थानीय नागरिकों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। लोगों का दोटूक आरोप है कि नगर पंचायत में विकास के नाम पर सिर्फ ‘कागजी लीपापोती’ चल रही है। ग्रामीणों ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि, “एक तरफ जनता धूप और थकान से बेहाल है, दूसरी तरफ हमारे टैक्स के पैसे से खरीदी गई सीटें झाड़ियों में जंग खा रही हैं। यह सीधे तौर पर जनता के अधिकारों का हनन और सरकारी धन की डकैती है।”

जिम्मेदार मौन, जवाबदेही से भाग रहे अधिकारी

​जब इस संबंध में जिम्मेदार अधिकारियों से तीखे सवाल पूछे गए, तो उनके पास कोई संतोषजनक जवाब नहीं था। टालमटोल भरा रवैया और जांच का रटा-रटाया आश्वासन यह बताने के लिए काफी है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। बिना उच्च अधिकारियों की मौन सहमति के इतनी बड़ी लापरवाही संभव नहीं है।

“डीएम साहब! खोलिए अपनी जांच की फाइल”

स्थानीय जनता ने अब जिलाधिकारी बस्ती से गुहार लगाई है कि इस ‘बेंच कांड’ की निष्पक्ष जांच कराई जाए। क्या यह सिर्फ लापरवाही है या एक सुनियोजित घोटाला? इसकी तह तक जाना जरूरी है ताकि विकास की योजनाएं झाड़ियों से निकलकर जनता तक पहुँच सकें।

 

बड़ा सवाल: क्या प्रशासन उन भ्रष्ट चेहरों को बेनकाब करेगा जिन्होंने विकास को झाड़ियों में झोंक दिया, या फिर एक और जांच की फाइल धूल फांकने के लिए छोड़ दी जाएगी?

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