‘खाकी’ की मेहरबानी, ‘भू-माफिया’ की मनमानी: बखरया गांव में सरकारी ज़मीन बनी दबंगों की जागीर!
योगी का फरमान, पुलिस का 'अज्ञान': बखरया में सरकारी बंजर ज़मीन पर कब्जा जमाकर बैठा 'माफिया'!
अजीत मिश्रा (खोजी)
‘खाकी’ की सरपरस्ती में फल-फूल रहा ‘भू-माफिया’, बंजर ज़मीन पर कब्ज़ा और प्रशासन मौन!
- क्या थाना लालगंज ‘भू-माफिया’ के हाथ की कठपुतली है? सरकारी खड़ंजे और चकरोड तक निगल गए दबंग!
- कानून को ठेंगा, पुलिस बनी तमाशबीन: बखरया गांव में कब टूटेगी ‘माफिया’ की कमर?
- ‘एसओ’ साहब की ‘खास’ मेहरबानी: सरकारी ज़मीन पर कब्जा, और प्रशासन करता रहा सिर्फ ‘वानी’!
- सरकारी ज़मीन का ‘बंटवारा’: एक तरफ मुख्यमंत्री का आदेश, दूसरी तरफ माफिया का कब्जा!
- बखरया में ‘जंगलराज’ का ट्रेलर: माफिया ने काटा खड़ंजा, पुलिस देखती रही तमाशा!
बस्ती: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तमाम सख्त चेतावनियों और सरकारी ज़मीनों को अतिक्रमण मुक्त कराने के फरमानों के बावजूद, लालगंज थाना क्षेत्र का बखरया गांव ‘जंगलराज’ की तस्वीर पेश कर रहा है। सवाल यह है कि आखिर कौन सी ऐसी अदृश्य ताकत है, जो एक ‘भू-माफिया’ को कानून से ऊपर खड़ा कर देती है? स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का विषय यही है कि क्या लालगंज पुलिस का ‘एसओ’ साहब इस माफिया पर इतने ‘मेहरबान’ क्यों हैं?
सरकारी ज़मीन या ‘माफिया’ की जागीर?
बखरया गांव में गाटा संख्या 12 की लगभग पांच बीघा सरकारी बंजर ज़मीन अब एक रसूखदार व्यक्ति, रंजन मिश्रा की व्यक्तिगत संपत्ति बनी हुई है। आरोप है कि खुलेआम सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए वहां न केवल पक्का मकान खड़ा कर दिया गया, बल्कि सरकारी खड़ंजे को काटकर उसे अपनी निजी ‘सहन’ में तब्दील कर लिया गया। पूर्व प्रधान राजकुमार मिश्रा की निजी भूमि में अवैध ‘नापदान’ खोलकर गंदा पानी बहाना इस बात का सबूत है कि इस माफिया को कानून का रत्ती भर भी डर नहीं है।
प्रशासन का दोहरा चरित्र और खोखले आश्वासन
हैरानी की बात यह है कि मुख्यमंत्री के सख्त निर्देशों के बाद भी लालगंज पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। थाना अध्यक्ष विनय कुमार पाठक के स्तर से जो ‘निरीक्षण’ और ‘आश्वासन’ दिए गए, वे सिर्फ कागजी साबित हुए।
- पहला धोखा: पुलिस के सामने अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया गया, लेकिन माफिया ने उसे ठेंगा दिखा दिया।
- दूसरा झूठ: जब पीड़िता ने दोबारा शिकायत की, तो विपक्ष ने झूठ बोलकर दावा किया कि अतिक्रमण हटा दिया गया है। जब मौके का वीडियो प्रमाण पेश किया गया, तो प्रशासन की पोल खुल गई।
न्याय के लिए तरसती जनता, खामोश क्यों है वर्दी?
पूर्व प्रधान राजकुमार मिश्रा का आरोप है कि उनकी पांच बीघा बाग की तारबंदी तक को दबंगों ने हटा दिया और प्रशासन सब कुछ जानते हुए भी तमाशबीन बना हुआ है। अब आलम यह है कि गांव को जोड़ने वाली मुख्य ‘चकरोड’ को काटकर जोत-बोआई की जा रही है, लेकिन पुलिस की मूक सहमति माफिया के हौसले बुलंद कर रही है।
निष्कर्ष: कानून की मर्यादा या गुंडागर्दी का संरक्षण?
प्रशासन का यह लचर रवैया न केवल पीड़ित पक्ष में भारी आक्रोश पैदा कर रहा है, बल्कि शासन की छवि को भी धूमिल कर रहा है। ग्रामीणों की चेतावनी स्पष्ट है—अगर समय रहते इस अवैध कब्जे को नहीं हटाया गया, तो गांव में किसी भी वक्त बड़ी अनहोनी घट सकती है।
अब देखना यह है कि क्या उच्चाधिकारी इस मामले में संज्ञान लेकर ‘खाकी’ की साख बचाएंगे, या फिर यह ‘भू-माफिया’ इसी तरह सरकारी ज़मीनों को निगलता रहेगा?

















