सिद्धार्थनगर: प्रशासनिक आदेशों का उपहास, लेखपाल की ‘दबंगई’ के आगे झुका उपजिलाधिकारी कार्यालय
तबादला आदेश वापस लेने पर मचा बवाल: डूमरियागंज तहसील में लेखपालों का रसूख या सिस्टम की लाचारी? डूमरियागंज में 'जय-वीरू' की जोड़ी का खौफ: सरकारी जमीन और चक मार्ग पर कब्जे की शिकायत, अधिकारियों पर मिलीभगत के आरोप
अजीत मिश्रा (खोजी)
सिद्धार्थनगर: प्रशासनिक तंत्र या ‘दबंग’ लेखपालों की जागीर? तबादला आदेश पलटने पर उठे गंभीर सवाल
- सरकारी जमीन की हेरा-फेरी और तबादले का खेल: सिद्धार्थनगर में लेखपाल की हठधर्मी पर प्रशासन मौन
- तहसील डूमरियागंज का शर्मनाक प्रकरण: जनहित में हुआ तबादला आदेश कुछ ही दिनों में निरस्त, आम जनता के रास्ते बंद
सिद्धार्थनगर: क्या सिद्धार्थनगर की डूमरियागंज तहसील में प्रशासनिक आदेशों की कोई गरिमा बची है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि हाल ही में जारी एक आधिकारिक तबादला आदेश का पालन करने के बजाय, कुछ ही दिनों के भीतर उसे वापस ले लिया गया। इस घटना ने विभागीय कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं और यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर शासन-प्रशासन के ऊपर ये ‘दबंग’ कर्मचारी कितने भारी हैं।

क्या है पूरा मामला?
मामला डूमरियागंज तहसील में तैनात लेखपाल आयुष वैश्य से जुड़ा है। कार्यालय उपजिलाधिकारी के पत्रांक-256 (दिनांक 05 जून 2026) के आदेशानुसार, प्रशासनिक और जनहित में आयुष वैश्य का तबादला क्षेत्र संख्या-80 (बयारा) से हटाकर क्षेत्र संख्या-30 (महतिनिया खुर्द) कर दिया गया था। आदेश में स्पष्ट रूप से ‘तत्काल प्रभाव’ शब्द का प्रयोग किया गया था।
लेकिन, इसके बाद जो हुआ वह प्रशासनिक व्यवस्था का मजाक उड़ाने जैसा है। प्राप्त शिकायतों के अनुसार, उक्त लेखपाल ने न केवल कार्यभार ग्रहण करने से मना कर दिया, बल्कि अपनी ‘दबंगई’ के प्रभाव में उपजिलाधिकारी कार्यालय से अपना तबादला आदेश निरस्त करवा लिया और पुन: 12 जून 2026 को उन्हें वापस उसी क्षेत्र-80 (बयारा) में तैनात कर दिया गया।
गंभीर आरोप: ‘जय-वीरू’ की जोड़ी का रसूख
मुख्यमंत्री को भेजे गए शिकायत पत्र में रमेश (निवासी ग्राम पंचायत बाजार) ने गंभीर आरोप लगाए हैं। शिकायत के अनुसार:
- क्षेत्र-80 (बयारा) में सरकारी जमीन, चक रोड और खलिहान की भूमि की हेरा-फेरी कर धन उगाही की जा रही है।
- आयुष वैश्य और पूर्व लेखपाल दिग्विजय चौरसिया की जोड़ी को क्षेत्र में ‘जय-वीरू’ के नाम से जाना जाता है, जिनके कार्य-व्यवहार पर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं।
- आरोप है कि हाल ही में एक बड़ी रकम लेकर चक मार्ग (गाटा सं0-330) पर अवैध कब्जा कराया गया, जिससे ग्रामीणों का मुख्य रास्ता बंद हो गया है।
प्रशासनिक चुप्पी पर सवाल
सवाल यह है कि एक उपजिलाधिकारी का आदेश, जो जनहित में जारी किया गया था, उसे कुछ दिनों में ही वापस लेने की ऐसी क्या मजबूरी थी? क्या तहसील प्रशासन में बैठे अधिकारी किसी लेखपाल की ‘दबंगई’ के आगे इतने बेबस हो चुके हैं कि उन्हें अपने ही आदेश को वापस लेना पड़ा?
यह मामला न केवल एक कर्मचारी के रसूख को दर्शाता है, बल्कि जिला प्रशासन की कार्यशैली पर भी बदनुमा दाग है। यदि शिकायतों के बावजूद ऐसे कर्मचारियों को संरक्षण मिलता रहा, तो आम जनता का सिस्टम पर से विश्वास उठना लाजमी है। अब देखना यह है कि क्या शासन इस मामले को संज्ञान में लेकर उच्च स्तरीय जांच करवाता है, या फिर यह ‘दबंग’ लेखपाल इसी तरह फाइलों और आदेशों को अपने इशारों पर नचाते रहेंगे।










