उत्तर प्रदेशबस्ती

क्या शहर ‘मौत के कुओं’ पर बसा है? सुरक्षा मानकों की अनदेखी और प्रशासन की आपराधिक चुप्पी

120 कोचिंग सेंटर बिना फायर एनओसी के चल रहे, फायर विभाग और शिक्षा विभाग की संयुक्त टीम ने शुरू की जांच शहर के शॉपिंग मॉल भी असुरक्षित: फायर विभाग के नोटिस के बावजूद सुरक्षा मानकों में सुधार नहीं

​अजीत मिश्रा (खोजी)

क्या हम किसी ‘बड़े हादसे’ के इंतज़ार में हैं? शहर की सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल

  • मौत के जाल में तब्दील शहर: संकरी गलियों और ऊपर की मंजिलों पर जान जोखिम में डालकर चल रहे कोचिंग सेंटर
  • पचपेड़िया मार्ग समेत कई इलाकों के होटलों और अस्पतालों में नहीं है आपातकालीन निकास की व्यवस्था, कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा

​लखनऊ में हुए हालिया अग्निकांड ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है, लेकिन ऐसा लगता है कि हमारे शहर का प्रशासन अभी भी गहरी नींद में है। शहर की संकरी गलियों में चल रहे कोचिंग सेंटर, अस्पताल, होटल और शॉपिंग मॉल—ये सब इमारतें सुरक्षा मानकों के नाम पर एक ‘टाइम बम’ की तरह हैं, जो किसी भी वक्त फट सकते हैं।आग की त्रासदी के बाद पूरे प्रदेश में हड़कंप मच गया है। इस घटना के बाद बस्ती में शुरू हुई जांच में जो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं, वे न केवल डराने वाले हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि प्रशासन ने शहर को एक बड़े हादसे के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।

सुरक्षा मानकों की खुलेआम धज्जियां

शहर के विभिन्न इलाकों (आवास विकास, ब्लॉक रोड, मालवीय रोड, गांधीनगर आदि) का हाल बेहाल है। एक ही इमारत में तीन-तीन कोचिंग सेंटर चल रहे हैं, जहाँ सैकड़ों छात्र जान जोखिम में डालकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। विडंबना यह है कि इन भवनों में न तो पर्याप्त अग्निशमन यंत्र हैं और न ही आपातकालीन निकास (इमरजेंसी एक्जिट) की कोई सुविधा। अधिकांश जगह एक ही गेट से प्रवेश और निकास होता है। अगर ईश्वर न करे, ऐसी किसी इमारत में आग लग जाए, तो छात्रों और नागरिकों का सुरक्षित बाहर निकलना लगभग असंभव होगा।शहर में 120 से अधिक कोचिंग संस्थान बिना किसी फायर एनओसी (NOC) के संचालित हो रहे हैं। ये संस्थान न केवल सुरक्षा मानकों के विपरीत हैं, बल्कि रिहायशी इलाकों में बिना किसी सरकारी अनुमति के चल रहे हैं। विडंबना यह है कि प्रशासन ने इन संस्थानों को न तो सील किया और न ही कोई ठोस कार्रवाई की, जिससे छात्रों की जान हमेशा खतरे में बनी रहती है।

क्या जान की कीमत मुनाफा है?

अस्पतालों और होटलों की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। पचपेड़िया मार्ग हो या रेलवेज क्षेत्र, घनी आबादी के बीच संचालित इन बहुमंजिला इमारतों में क्षमता से अधिक भीड़ जुट रही है। प्रशासन ने कुछ जगहों पर नोटिस तो जारी किए, लेकिन क्या वह नोटिस सिर्फ कागजी खानापूर्ति है? एक प्रमुख शॉपिंग मॉल को सुरक्षा में कमी के कारण नोटिस दिया गया, पर आज भी वहां हजारों लोग बेखौफ आवाजाही कर रहे हैं। क्या प्रशासन जवाब मिलने का इंतज़ार करेगा या तब तक, जब तक कोई बड़ी अनहोनी न हो जाए?आवास विकास मुख्य मार्ग से लेकर गांधीनगर और ब्लॉक रोड तक, स्थिति भयावह है। बहुमंजिला इमारतों में एक साथ तीन-तीन कोचिंग सेंटर चल रहे हैं, जहाँ एक समय में 100 से अधिक छात्र पढ़ाई करते हैं। इन कक्षाओं तक पहुँचने के लिए केवल एक संकरा रास्ता है। स्थानीय लोगों का स्पष्ट कहना है कि यदि आग जैसी कोई घटना हो जाए, तो छात्रों का सुरक्षित बाहर निकलना लगभग असंभव है।

प्रशासन की ढिलाई और नागरिकों की मजबूरी

अभिभावक चिंतित हैं, स्थानीय लोग डर के साये में जी रहे हैं, लेकिन जिम्मेदारों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। व्यावसायिक लाभ की अंधी दौड़ में सुरक्षा के साथ किया जा रहा यह समझौता अक्षम्य है। शहर के रिहायशी इलाकों में बिना मानक पूरे किए कोचिंग, अस्पताल और होटल खोलने की अनुमति आखिर दी किसने?शहर की पचपेड़िया मार्ग पर कतार से खुले अस्पताल हों या रेलवेज, दक्षिण दरवाजा, रौता चौराहा और ब्लॉक रोड पर स्थित होटल, इनमें से किसी के पास भी आपातकालीन द्वार (Emergency Exit) की व्यवस्था नहीं है। घनी आबादी के बीच संचालित इन इमारतों में न तो अग्नि सुरक्षा यंत्र हैं और न ही पर्याप्त चौड़े प्रवेश द्वार। ऐसा लगता है कि व्यावसायिक लाभ के लिए नागरिकों की जान को पूरी तरह दांव पर लगा दिया गया है।

शॉपिंग मॉल: सुरक्षा नियमों की खुली चुनौती

शहर के प्रमुख शॉपिंग मॉल्स का हाल भी जुदा नहीं है। अग्निशमन विभाग द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बावजूद, प्रबंधन की ओर से कोई जवाब नहीं मिला है। रोडवेज क्षेत्र स्थित एक बड़े मॉल में प्रतिदिन करीब एक हजार लोग आते हैं, लेकिन यहाँ न तो पर्याप्त पार्किंग है और न ही अलग से निकास मार्ग। यहाँ अक्सर जाम जैसी स्थिति बनी रहती है, जिससे भगदड़ मचने का खतरा हमेशा बना रहता है।

अब समय कठोर कार्रवाई का है

सिर्फ खानापूर्ति के लिए औचक निरीक्षण (मौका मुआयना) से काम नहीं चलेगा। शहर के उन सभी संस्थानों को तुरंत सील किया जाना चाहिए जो सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरते। प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि नागरिकों की जान से बढ़कर कोई व्यावसायिक मुनाफा नहीं है।

​अगर आज सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो कल किसी बड़े अग्निकांड की त्रासदी के लिए सीधे तौर पर प्रशासन और नियम तोड़ने वाले संचालक जिम्मेदार होंगे।

जागो प्रशासन, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए!

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