टिकट मिलने से पहले ही क्षेत्रीय अध्यक्ष विनोद राय के सामने सदर विधानसभा के संभावित उम्मीदवार विपिन शुक्ल और मोदू चौधरी के समर्थक आपस में भिड़े
हार-जीत चुनावी प्रक्रिया का एक हिस्सा है, लेकिन इस तरह का खुलेआम शक्ति प्रदर्शन और अनुशासनहीनता पार्टी की नैया डूबोने के लिए काफी है।
‘अनुशासन’ के दावों की खुली पोल: क्षेत्रीय अध्यक्ष के सामने भिड़े भाजपा दावेदारों के समर्थक
- होटल में कुर्सियों पर बैठने को लेकर हुआ जमकर हंगामा, पुलिस के बीच-बचाव से टली बड़ी अनहोनी
- पार्टी की अनुशासनहीनता और गुटबाजी पर उठ रहे गंभीर सवाल, क्षेत्रीय अध्यक्ष के पहले ही आगमन पर दिखी ऐसी बदइंतजामी
‘अनुशासित’ पार्टी में अराजकता का नंगा नाच
बस्ती जिले में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की अनुशासन की परिभाषा एक बार फिर सरेआम तार-तार होती नजर आई। सदर विधानसभा सीट से टिकट की दावेदारी ठोक रहे दो संभावित उम्मीदवारों—मोदू चौधरी और विपिन शुक्ल—के समर्थक पार्टी के क्षेत्रीय अध्यक्ष विनोद राय के स्वागत समारोह में ही आपस में भिड़ गए। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि पार्टी के भीतर टिकट की महत्वाकांक्षा किस हद तक हावी हो चुकी है कि नेताओं और समर्थकों को अब पार्टी के बड़े पदों और गरिमा का भी लिहाज नहीं रहा।
कुर्सी से शुरू हुई जंग, होटल बना अखाड़ा
घटना की शुरुआत तब हुई जब होटल ‘बालाजी प्रकाश’ में क्षेत्रीय अध्यक्ष के आगमन पर कुर्सियों पर बैठने को लेकर वर्चस्व की जंग छिड़ गई। हालांकि, इसकी पटकथा बहुत पहले ही बाहर ‘मोदू भैया जिंदाबाद’ और ‘विपिन भैया जिंदाबाद’ के नारों के साथ लिखी जा चुकी थी। दोनों पक्षों के समर्थकों के बीच होटल के बाहर से ही तनाव का माहौल था, जो भीतर पहुंचते ही लात-घूंसों और जमकर हुई मारपीट में बदल गया। स्थिति इतनी भयावह हो गई थी कि यदि समय रहते पुरानी बस्ती पुलिस मौके पर पहुंचकर बीच-ब बचाव न करती, तो यह हंगामा बस्ती के राजनीतिक इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो जाता।
टिकट की रेース और गिरता राजनीतिक स्तर
यह कोई पहला मौका नहीं है जब बस्ती में भाजपा कार्यक्रमों के दौरान अनुशासनहीनता देखने को मिली हो; इससे पहले मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में भी ऐसी ही बदइंतजामी और अनुशासनहीनता सामने आ चुकी है। सवाल यह उठता है कि जो पार्टी खुद को ‘दुनिया की सबसे अनुशासित पार्टी’ होने का दावा करती है, उसके कार्यकर्ता और नेता क्षेत्रीय अध्यक्ष के प्रथम आगमन पर ही इस तरह की गुटबाजी का प्रदर्शन करेंगे, तो आम जनता और विपक्ष के बीच क्या संदेश जाएगा?
हार-जीत चुनावी प्रक्रिया का एक हिस्सा है, लेकिन इस तरह का खुलेआम शक्ति प्रदर्शन और अनुशासनहीनता पार्टी की नैया डूबोने के लिए काफी है। दोनों संभावित प्रत्याशियों के समर्थकों की इस हरकत ने उनके राजनीतिक भविष्य पर भी गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
निष्कर्ष: सुधार नहीं हुआ तो बुरे दिन दूर नहीं
यदि समय रहते भाजपा हाईकमान ने इस आंतरिक कलह और गुटबाजी पर नकेल नहीं कसी, तो आने वाले चुनावों में इसका खामियाजा पार्टी को भारी नुकसान के रूप में भुगतना पड़ेगा। पार्टी नेताओं को अब सिर्फ बयानों से नहीं, बल्कि कड़े वैचारिक और अनुशासनात्मक कार्यशालाओं के जरिए कार्यकर्ताओं को संयम का पाठ पढ़ाने की सख्त जरूरत है। यदि यही हाल रहा, तो पार्टी के ‘अच्छे दिन’ बीतने और ‘बुरे दिन’ आने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।















