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इटवा आपूर्ति कार्यालय: सरकारी कुर्सी पर ‘प्राइवेट’ डकैती, बिचौलियों के हाथों बंधक बनी व्यवस्था!

बिना 'सुविधा शुल्क' नहीं हिलती फाइल, आखिर कब जागेगा प्रशासन?

अजीत मिश्रा (खोजी)

🚨सरकारी कुर्सी पर ‘प्राइवेट’ डकैती: इटवा आपूर्ति कार्यालय बना भ्रष्टाचार का अड्डा 🚨

💫सरकारी फाइलों पर प्राइवेट लड़कों का पहरा, क्या यही है सुशासन?

💫सरकारी कंप्यूटर और अवैध वसूली का खेल: मास्टरमाइंड का चेहरा कब होगा बेनकाब?

💫भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता इटवा आपूर्ति विभाग: आखिर कौन है इनका आका?

विशेष संपादकीय | उत्तर प्रदेश।

सिद्धार्थनगर ।। लोकतंत्र में सरकारी दफ्तर जनता की सेवा के लिए होते हैं, लेकिन सिद्धार्थनगर जनपद के इटवा तहसील का आपूर्ति कार्यालय इन दिनों भ्रष्टाचार की ऐसी प्रयोगशाला बन चुका है, जहां नियम-कानून नहीं, बल्कि ‘प्राइवेट गुर्गों’ की मर्जी चलती है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि आम जनता के हक पर सीधी डकैती है।

⭐पर्दे के पीछे का खेल: आखिर मास्टरमाइंड कौन?

हैरानी की बात यह है कि जिस कार्यालय में गोपनीय सरकारी दस्तावेज और राशन कार्ड से जुड़ी संवेदनशील फाइलें होनी चाहिए, वहां प्राइवेट लड़के कंप्यूटरों पर जमे हुए हैं। ये ‘नटवरलाल’ न तो सरकारी कर्मचारी हैं और न ही किसी जवाबदेही से बंधे हैं। फिर भी, सरकारी फाइलों तक इनकी पहुंच और विभागीय कार्यों का संचालन यह साफ करता है कि इन्हें ऊपर बैठे अधिकारियों का वरदहस्त प्राप्त है।

⭐अवैध वसूली का ‘सुविधा शुल्क’ मॉडल

क्षेत्र के कोटेदारों और आम जनता का आरोप है कि इस दफ्तर में बिना “सुविधा शुल्क” दिए पत्ता भी नहीं हिलता।

👉राशन कार्ड: नया कार्ड बनवाना हो या संशोधन, बिचौलियों के बिना काम असंभव है।

👉फाइलों का निस्तारण: सरकारी बाबू फाइलों पर तब तक कलम नहीं चलाते, जब तक प्राइवेट गुर्गों का ‘ग्रीन सिग्नल’ न मिल जाए।

👉तानाशाही: इन बाहरी लड़कों की मनमानी ऐसी है कि ये खुद को ही असल अधिकारी समझने लगे हैं।

⭐जिम्मेदार मौन क्यों?

सवाल यह उठता है कि जिला प्रशासन की नाक के नीचे चल रहे इस खेल पर जिम्मेदार अधिकारी कुंभकर्णी नींद क्यों सो रहे हैं? क्या इन अनधिकृत व्यक्तियों की सक्रियता अधिकारियों की मिलीभगत का हिस्सा है? सरकारी दफ्तरों को ‘आउटसोर्सिंग के नाम पर लूट का अड्डा’ बनाना संवैधानिक मूल्यों का अपमान है।

तहसील मुख्यालय स्थित आपूर्ति कार्यालय इन दिनों भ्रष्टाचार की ऐसी प्रयोगशाला बन चुका है, जहाँ नियम-कानून कागजों तक सीमित रह गए हैं। यहाँ सरकारी कुर्सियों पर तैनात ‘प्राइवेट नटवरलाल’ न केवल फाइलों का संचालन कर रहे हैं, बल्कि अवैध वसूली का एक ऐसा सिंडिकेट चला रहे हैं जिसने आम जनता और कोटेदारों का दम घोंट रखा है। हैरानी की बात यह है कि अधिकारियों की नाक के नीचे चल रहे इस खुले खेल पर जिला प्रशासन ने रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है।

💫प्रशासन से सीधे सवाल:

👉अधिकार: किस हैसियत से प्राइवेट लड़के सरकारी कंप्यूटर और गोपनीय फाइलों को छू रहे हैं?

👉मजबूरी: क्या विभाग के पास कर्मचारियों की इतनी कमी है कि ‘बाहरी गुर्गों’ को ठेका दे दिया गया है?

👉हिस्सेदारी: अवैध वसूली का यह पैसा आखिर किन-किन ‘बड़े साहबों’ की जेब तक पहुँच रहा है?

👉जवाबदेही: अगर कोई सरकारी दस्तावेज गुम या लीक होता है, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?

🔥एक नज़र में समस्या:

👉बिना ‘सुविधा शुल्क’ के काम ठप: राशन कार्ड में संशोधन हो या नया आवेदन, बिना चढ़ावे के फाइल आगे नहीं बढ़ती।

👉कोटेदारों का शोषण: क्षेत्र के कोटेदारों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इन प्राइवेट लड़कों की मर्जी के बिना विभागीय प्रक्रिया पूरी नहीं होती।

👉जनता की जेब पर डाका: बिचौलिए खुलेआम जनता को गुमराह कर अवैध वसूली कर रहे हैं।

💫अब आर-पार की लड़ाई जरूरी

जनता अब ठगी का शिकार होने को तैयार नहीं है। प्रशासन को यह जवाब देना होगा कि क्या इटवा आपूर्ति कार्यालय इन बिचौलियों के चंगुल से मुक्त होगा या भ्रष्टाचार का यह खेल इसी तरह बदस्तूर जारी रहेगा?

 चेतावनी: यदि जिला प्रशासन ने इन ‘प्राइवेट मास्टरमाइंडों’ को कार्यालय से बाहर का रास्ता नहीं दिखाया और दोषियों पर कार्रवाई नहीं की, तो यह मान लिया जाएगा कि भ्रष्टाचार की इस बहती गंगा में ऊपर से नीचे तक सबके हाथ रंगे हुए हैं।

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