उत्तर प्रदेशबस्ती

ब्लॉक में हुआ विवाद: सदर ब्लॉक में दो अधिकारी चार्ज लेने-देने को लेकर आपस में भिड़ गए, जिससे पूरा मामला मुख्य विकास अधिकारी (CDO) और जिला विकास अधिकारी (DDO) तक पहुँच गया।

पूर्व बीडीओ शिवमणि का यह तर्क कि उनके पास नाम का आदेश नहीं है, अपनी जगह तकनीकी हो सकता है, परंतु एक महिला आईएएस अधिकारी के साथ कर्मचारियों के सामने ऐसा बर्ताव और कुर्सी छोड़ने से इस तरह का हठधर्मिता भरा इंकार करना प्रशासनिक अनुशासन के दायरे से बाहर माना जा रहा है।

बस्ती सदर ब्लॉक विवाद: जब कुर्सी के मोह में एक ‘बीडीओ’ ने ‘आईएएस’ मैडम को कर दिया अपमानित

​बस्ती जिले के सदर विकास खंड में 5 अगस्त 2026 की सुबह एक ऐसी घटना घटी, जिसने प्रशासनिक गलियारों से लेकर आम जनता के बीच भूचाल ला दिया है। मुख्य विकास अधिकारी (CDO) के आधिकारिक आदेश पर कार्यभार ग्रहण करने पहुँची एक प्रशिक्षु आईएएस (IAS) अधिकारी को जिस प्रकार प्रशासनिक कुर्सी के मोह और मनमानी का सामना करना पड़ा, उसने पूरे महकमे की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

​पूरा घटनाक्रम: कैसे गरमाया मामला?

  • तैनाती का आदेश: मुख्य विकास अधिकारी (CDO) सार्थक अग्रवाल ने मंगलवार को एक आदेश जारी किया था, जिसके तहत प्रशिक्षु आईएएस अधिकारी एवं सहायक कलेक्टर/मजिस्ट्रेट अपूर्वा सिंह को बस्ती सदर विकास खंड के खंड विकास अधिकारी (BDO) का कार्यभार संभालने का निर्देश दिया गया था।
  • ब्लॉक मुख्यालय पर आमना-सामना: तय कार्यक्रम के अनुसार, गुरुवार की सुबह करीब 10 बजे अपूर्वा सिंह ब्लॉक मुख्यालय पहुँचीं और वहाँ तैनात बीडीओ शिवमणि से चार्ज देने को कहा।
  • आदेश की कॉपी का विवाद: बीडीओ शिवमणि ने चार्ज देने से साफ इंकार करते हुए कहा कि उनके पास या आदेश में नवीन तैनाती और उनके तबादले का कोई स्पष्ट जिक्र या कॉपी नहीं है, इसलिए वे चार्ज नहीं दे सकते।
  • स्टाफ के सामने असहज स्थिति: आरोप है कि बीडीओ साहब ने लेखाकार और अन्य कर्मियों को मैडम के सामने ही बुलाकर यह सवाल किया कि क्या बिना आदेश के कुर्सी छोड़ देनी चाहिए, जिस पर सभी ने ‘न’ में जवाब दिया।
  • कुर्सी न मिलने पर खड़ा रहना: स्थिति यह बन गई कि महिला आईएएस अधिकारी को अपनी कुर्सी नहीं मिली और उन्हें कुछ देर खड़े रहना पड़ा। बाद में बीडीओ द्वारा एक दूसरी कुर्सी मंगवाई गई, तब जाकर वे बैठ पाईं।

​उच्चाधिकारियों का हस्तक्षेप और समाधान

​जब बात उलझ गई और मामला तूल पकड़ने लगा, तो यह सूचना सीडीओ और डीडीओ तक पहुँचाई गई। डीडीओ ने खंड विकास अधिकारी को फोन कर निर्देश दिया कि वे अपूर्वा सिंह को सदर बीडीओ का चार्ज सौंपें और खुद विकास भवन आकर संबद्ध हों।

​इसके बाद शाम को प्रशासनिक निर्देशों का पालन करते हुए अपूर्वा सिंह ने सदर बीडीओ का कार्यभार प्राप्त कर लिया, और पूर्व बीडीओ शिवमणि को जिला मुख्यालय पर संबद्ध कर दिया गया।

​प्रशासनिक समन्वय और व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल

​यह पूरा प्रकरण कई तीखे और गंभीर सवाल खड़े करता है:

  • डिस्पैच और समन्वय में चूक: सवाल यह उठ रहा है कि यदि मुख्य विकास अधिकारी स्तर से प्रशिक्षु आईएएस का चार्ज संभालने का आदेश जारी हुआ था, तो क्या उससे संबंधित प्रति या समन्वय की सूचना समय पर संबंधित बीडीओ तक नहीं पहुँची थी? यदि यह प्रशासनिक चूक थी, तो इतनी बड़ी गलती कैसे हुई?
  • अधिकारियों का हठधर्मिता रवैया: पूर्व बीडीओ शिवमणि का यह तर्क कि उनके पास नाम का आदेश नहीं है, अपनी जगह तकनीकी हो सकता है, परंतु एक महिला आईएएस अधिकारी के साथ कर्मचारियों के सामने ऐसा बर्ताव और कुर्सी छोड़ने से इस तरह का हठधर्मिता भरा इंकार करना प्रशासनिक अनुशासन के दायरे से बाहर माना जा रहा है।
  • पुराना इतिहास: चर्चा यह भी है कि बस्ती में इस तरह के विवाद नए नहीं हैं, और इससे पहले भी प्रशासनिक अधिकारियों के बीच निरीक्षण या चार्ज को लेकर टकराव की स्थितियाँ सामने आती रही हैं।

​यह घटना एक प्रशिक्षु आईएएस अधिकारी के जीवन भर याद रहने वाले अनुभवों में से एक बन गई है, जहाँ उन्हें अपने पहले ही प्रशिक्षण दौर में व्यवस्था की खींचतान और असहजता का सामना करना पड़ा।

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