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उपासना परमात्मा से जुडऩे की विधि है : डॉ चिन्मय पण्ड्या

विजय कुमार बंसल हरिद्वार ब्यूरो IMG 20260322 WA0021 IMG 20260322 WA0024 IMG 20260322 WA0025 IMG 20260322 WA0023

उपासना परमात्मा से जुडऩे की विधि है : डॉ चिन्मय पण्ड्या

हरिद्वार 22 मार्च।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि उपासना परमात्मा से जुडऩे की विधि का नाम है और नवरात्र का यह समय सर्वोत्तम अवसर है। उपासना का वास्तविक अर्थ ‘निकट बैठना’ है, अर्थात ईश्वर और गुरुसत्ता के समीप होना। जब साधक श्रद्धा और विश्वास के साथ उपासना, साधना करता है, तो उसके भीतर सद्ज्ञान, सद्भाव और सत्कर्म का उदय होता है तथा अज्ञान का नाश होता है। नवरात्र साधना एक ऐसा दिव्य अनुष्ठान है, जो साधक के भीतर छिपी आध्यात्मिक ऊर्जा और आत्मबल को जाग्रत करता है। वे गायत्री तीर्थ शांतिकुंज के मुख्य सभागार में आयोजित विशेष सत्संग को संबोधित कर रहे थे।

अखिल विश्व गायत्री परिवार के युवा प्रतिनिधि डॉ. पण्ड्या ने कहा कि जिस प्रकार सावित्री के अटल संकल्प व विश्वास ने मृत्यु को भी पराजित कर दिया, उसी प्रकार साधक का दृढ़ तप और विश्वास उसके जीवन की हर बाधा को समाप्त करने की क्षमता रखता है। उन्होंने बताया कि गायत्री और सावित्री एक ही दिव्य शक्ति के दो रूप हैं। जब यह शक्ति बाहरी जगत का शोधन करती है तो सावित्री कहलाती है, और जब यह मनुष्य के अंत:करण को परिष्कृत करती है तो गायत्री के रूप में कार्य करती है। गायत्री साधना से व्यक्ति के भीतर आत्मतेज, आत्मबल और ब्रह्मवर्चस का विकास होता है। जाने माने आध्यात्मिक चिंतक डॉ चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि सच्ची भक्ति वही है, जिसमें व्यक्ति अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए भी अपनी चेतना को परमात्मा से जोड़े रखता है। गुरुसत्ता के सान्निध्य में बैठने से मानसिक तनाव, द्वंद्व और जीवन की अनेक समस्याएं स्वत: समाप्त होने लगती हैं।

शांतिकुंज पहुंचे साधकों ने अपनी दैनिक दिनचर्या में आरती, ध्यान, हवन और त्रिकाल संध्या जैसे आध्यात्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया। इस अवसर पर शांतिकुंज परिवार के वरिष्ठ कार्यकर्ता श्री शिवप्रसाद मिश्र, व्यवस्थापक श्री योगेन्द्र गिरि, श्री श्याम बिहारी दुबे सहित देव संस्कृति विश्वविद्याल, शांतिकुंज परिवार और देश-विदेश से आये साधकगण उपस्थित रहे।

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