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बस्ती स्वास्थ्य विभाग की बेशर्मी: करोड़ों की मशीन, फूटी किस्मत और धूल फांकता सरकारी सिस्टम!

मुख्यमंत्री की योजनाओं पर 'बस्ती के बाबुओं' का पलीता, मुंडेरवा में दम तोड़ती स्वास्थ्य सेवाएँ! गरीबों की जेब पर 'सरकारी डाका': मशीन सफेद हाथी बनी, निजी लैब वाले चांदी काट रहे!

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। बस्ती के मुंडेरवा में स्वास्थ्य सेवाओं का ‘खून’ पी रही सरकारी लापरवाही: करोड़ों की मशीन धूल फांक रही, गरीब मरीजों की जेब कट रही ।।

बस्ती (मंडल ब्यूरो रिपोर्ट):

  • साहब को खबर नहीं, सिस्टम को फिक्र नहीं; मुंडेरवा CSC में लापरवाही का ‘महा-संग्राम’!
  • मुंडेरवा CSC: केमिकल के अभाव में बेकार हुई सलेक्ट्रा मशीन, ₹1 की जांच के लिए ₹500 दे रहे मरीज।
  • जिम्मेदारों की कुर्सी-कुर्सी का खेल: एडिशनल सीएमओ बोले पता नहीं, डिप्टी सीएमओ बोले—हो नहीं सकता!
  • 32 तरह की जांचों का दावा निकला हवाई, एक महीने से ‘रीजेंट’ का इंतजार कर रही हाईटेक मशीन।

  मुंडेरवा / बस्ती।। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार प्रदेश में हाईटेक स्वास्थ्य सेवाओं का दम भर रही है, लेकिन बस्ती जिले का स्वास्थ्य विभाग मुख्यमंत्री की मंशा को पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। ताजा मामला सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएससी) मुंडेरवा का है, जहां लाखों रुपये की लागत से आई ‘सलेक्ट्रा प्रो-एम’ मशीन महज एक शो-पीस बनकर रह गई है। आलम यह है कि सरकारी लापरवाही के कारण यह कीमती मशीन अस्पताल के किसी कोने में धूल फांक रही है और गरीब मरीज निजी पैथोलॉजी केंद्रों पर अपनी गाढ़ी कमाई लुटाने को मजबूर हैं।1776839787

🧭32 जांचों का दावा, हकीकत में ‘सन्नाटा’

मुंडेरवा सीएससी में मार्च के अंतिम सप्ताह में मरीजों को 32 तरह के पैरामीटर्स की जांच की सुविधा देने के लिए अत्याधुनिक मशीन स्थापित की गई थी। लैब टेक्नीशियन के अनुसार, इस मशीन से एक साथ 50 मरीजों के ग्लूकोज, केएफटी, लिपिड प्रोफाइल, यूरिक एसिड और कैल्शियम जैसी महत्वपूर्ण जांचें केवल ₹1 के सरकारी पर्चे पर होनी थीं। लेकिन विडंबना देखिए, मशीन तो आ गई पर उसे चलाने वाला ‘रीजेंट’ (केमिकल) एक महीने बाद भी उपलब्ध नहीं कराया जा सका।

🧭अधिकारियों की ‘बयानबाजी’ और जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना

  • जब इस गंभीर लापरवाही पर स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल किया गया, तो विभाग का ‘टालमटोल’ वाला रवैया साफ नजर आया।
  • एडिशनल सीएमओ अशोक चौधरी को मामले की जानकारी तक नहीं थी और उन्होंने गेंद डिप्टी सीएमओ (आरसीएच) के पाले में डाल दी।
  • वहीं, डिप्टी सीएमओ बी.के. शुक्ल ने यह कहकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की कि “ऐसा हो ही नहीं सकता कि रीजेंट न पहुंचा हो।”

अधिकारियों की यह अनभिज्ञता दर्शाती है कि जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह बेलगाम हो चुकी है। जिन्हें जिम्मेदारी निभानी थी, वे दफ्तरों में बैठकर फाइलों के साथ ‘पास-पास’ का खेल खेल रहे हैं, जबकि धरातल पर मरीज सिसक रहा है।

🧭सरकार की साख पर बट्टा लगाते ‘सफेदपोश’ जिम्मेदार

लाखों की मशीन का उपयोग न होना न केवल सरकारी धन का दुरुपयोग है, बल्कि यह सीधे तौर पर आम जनता के साथ धोखाधड़ी है। एक तरफ एक्स-रे से लेकर तमाम उपकरण मौजूद होने का ढिंढोरा पीटा जाता है, वहीं दूसरी तरफ जरूरी सामान के अभाव में मरीजों की जेब पर डाका डाला जा रहा है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या इन लापरवाह अधिकारियों पर कोई सख्त कार्रवाई होगी, या फिर मुंडेरवा की यह मशीन यूं ही धूल फांकते हुए कबाड़ में तब्दील हो जाएगी? बस्ती मंडल का स्वास्थ्य विभाग आखिर कब तक अपनी कमियों को छिपाने के लिए झूठ का सहारा लेता रहेगा?

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश

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