
अजीत मिश्रा (खोजी)
स्वास्थ्य व्यवस्था पर ‘अवैध’ प्रहार: क्या रसूख के आगे नतमस्तक है प्रशासन?
- फर्जीवाड़े की परतें: जनता सेवा अस्पताल की सीलिंग के बाद लक्ष्मी अल्ट्रासाउंड सेंटर के अवैध संचालन पर उठे सवाल!
- स्वास्थ्य विभाग बेखबर या मेहरबान? लक्ष्मी अल्ट्रासाउंड सेंटर के संदेहास्पद कामकाज की जांच की मांग तेज़!
सिद्धार्थनगर में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर चल रहे खेल ने एक बार फिर प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जनता सेवा अस्पताल के सील होने के बाद जिस तरह से ‘लक्ष्मी अल्ट्रासाउंड सेंटर’ का नाम सामने आया है, वह न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि व्यवस्था की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है।
मिलीभगत या प्रशासनिक विफलता?
हैरानी की बात यह है कि एक तरफ स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी अनभिज्ञता जाहिर कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर लक्ष्मी अल्ट्रासाउंड सेंटर में बिना किसी वैध रजिस्ट्रेशन के सीटी स्कैन जैसी संवेदनशील सेवाएं बेधड़क संचालित की जा रही हैं। सवाल यह है कि यदि विभाग को जानकारी नहीं है, तो क्या यह सेंटर किसी अदृश्य ताकत के संरक्षण में चल रहा है? या फिर ‘अवैध’ को ‘वैध’ मान लेने की कोई अनकही परंपरा चल पड़ी है?
जनता सेवा अस्पताल और लक्ष्मी सेंटर: एक गहरा रिश्ता?
जनता सेवा अस्पताल के सीलिंग के दौरान भारी मात्रा में पैरामेडिकल डिग्रियां और संदिग्ध दस्तावेज बरामद हुए थे, जिसमें राकेश यादव का नाम भी प्रमुखता से चर्चा में आया। अब उसी क्षेत्र में लक्ष्मी अल्ट्रासाउंड सेंटर का यह खुला खेल यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या इन दोनों के बीच कोई गहरा साठ-गांठ का रिश्ता है? क्या ‘सीलिंग’ महज एक दिखावा बनकर रह गई है, जबकि असली धंधा दूसरे रूप में उसी तरह जारी है?
जनता की मांग: अब बस, कार्यवाही हो!
जनता अब केवल आश्वासन नहीं, ठोस कार्यवाही चाहती है। स्थानीय लोगों की मांग स्पष्ट है:
- लक्ष्मी अल्ट्रासाउंड सेंटर के वास्तविक संचालक की पहचान कर उसे सार्वजनिक किया जाए।
- सीटी स्कैन मशीन की वैधता, रेडियोलॉजिस्ट की उपलब्धता और संस्थान के सभी दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच हो।
- यदि नियमों का उल्लंघन या फर्जीवाड़े का प्रमाण मिलता है, तो दोषियों पर कठोरतम कानूनी कार्यवाही सुनिश्चित की जाए।
प्रशासन को यह समझना होगा कि स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वालों की ‘बुलंद हौसलों’ को कुचलना अब अनिवार्य हो गया है। जनता की निगाहें अब विभाग की कार्यप्रणाली पर टिकी हैं—देखना यह है कि क्या यह जांच केवल फाइलों में दबेगी या वास्तव में कोई नजीर पेश करेगी?























