
अजीत मिश्रा (खोजी)
सिद्धार्थनगर: पीएम श्री विद्यालय के बाहर ‘विकास’ का कीचड़, नौनिहालों की शिक्षा पर भारी बदहाल सड़क
- सड़क है या नर्क? ‘पीएम श्री’ विद्यालय जाने के लिए कीचड़ में जान जोखिम में डाल रहे नन्हे छात्र।
- ‘साहेब, हमारी राह आसान कराइए!’ – सिद्धार्थनगर में कीचड़ में फंसा बच्चों का भविष्य, जिम्मेदार अधिकारी बेखबर।
- डुमरियागंज: पीएम श्री स्कूल के बाहर बदहाल सड़क, नौनिहालों के इम्तिहान का ‘कीचड़’ वाला रास्ता।
- विकास के दावों पर सवाल: स्कूल जाने के लिए गंदे पानी और कीचड़ से संघर्ष करते बच्चे।
- प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ा स्कूल का रास्ता, नन्हे कदमों की पुकार अनसुनी।
डुमरियागंज, सिद्धार्थनगर। एक तरफ देश में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए ‘पीएम श्री’ जैसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं, वहीं सिद्धार्थनगर के डुमरियागंज में ‘पीएम श्री विद्यालय’ के बाहर की हकीकत इन दावों पर करारा तमाचा मार रही है। स्कूल का रास्ता पिछले एक साल से बदहाली के आंसू रो रहा है, जहाँ भविष्य के निर्माता कहलाने वाले बच्चे अपनी किताबों के साथ कीचड़ और गंदे पानी से होकर गुजरने को मजबूर हैं।

विकास के दावों के बीच ‘इम्तिहान’ देते नौनिहाल
स्कूल जाने वाली यह सड़क पिछले एक साल से पूरी तरह जर्जर हो चुकी है। बारिश होते ही यहाँ कीचड़ और जलजमाव की स्थिति इतनी भयावह हो जाती है कि छोटे-छोटे बच्चों के पैर उसमें धंस जाते हैं। अभिभावकों को हर दिन अपने बच्चों की सुरक्षा की चिंता सताती है। कई बार बच्चे इस फिसलन भरी राह पर गिरकर चोटिल भी हो चुके हैं, लेकिन सिस्टम की संवेदनहीनता का आलम यह है कि किसी को इसकी परवाह नहीं है।
जिम्मेदार खामोश, नेताओं की चौखट पर पुकार बेअसर
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह बदहाली किसी से छिपी नहीं है। लोकसभा से लेकर विधानसभा और नगर पंचायत की चौखट तक बच्चों की पीड़ा पहुंचाई गई, लेकिन हर बार उन्हें कोरे आश्वासन ही मिले। नगर पंचायत प्रशासन हो या स्थानीय जनप्रतिनिधि, सबकी चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि उनके लिए ‘विकास’ के दावे केवल कागजों तक ही सीमित हैं।
प्रधानाध्यापक की गुहार भी बेकार
विद्यालय के प्रधानाध्यापक नसीम ने बड़ी हताशा के साथ बताया कि उन्होंने स्वयं कई बार नगर पंचायत डुमरियागंज के अधिशासी अधिकारी (EO) से पत्राचार किया और मौखिक रूप से भी समस्या से अवगत कराया। उन्होंने कहा:
“हमने ईओ से लेकर स्थानीय नेताओं तक सबको बताया कि रास्ता चलने लायक नहीं है। बच्चे रोजाना गंदे पानी से होकर आने को मजबूर हैं और चोटिल हो रहे हैं, लेकिन कोई भी सुनने को तैयार नहीं है। क्या हमारी पुकार कोई नहीं सुनेगा?”
जिलाधिकारी से न्याय की उम्मीद
थक-हारकर अब नन्हे बच्चों ने जिला प्रशासन की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देखा है। मासूमों ने जिलाधिकारी, सिद्धार्थनगर से गुहार लगाई है— “साहब! हमारी राह आसान कराइए, क्या कीचड़ से होकर गुजरना ही हमारी पढ़ाई का हिस्सा है?”
अब देखना यह है कि प्रशासन की नींद कब टूटती है और इन बच्चों को कब तक कीचड़ से मुक्ति मिलती है। क्या जिम्मेदार अधिकारी अपनी जिम्मेदारी समझेंगे, या फिर नौनिहालों का भविष्य इसी तरह बदहाल सड़कों के बीच दम तोड़ता रहेगा?
सवाल: क्या स्थानीय प्रशासन बच्चों की सुरक्षा के लिए तत्काल प्रभाव से अस्थायी मरम्मत के निर्देश जारी करेगा, या फिर किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार किया जाएगा?






















