उत्तर प्रदेशबस्ती

बस्ती का ‘बभनगांवा घोटाला’: एक करोड़ खर्च, नतीजा फिर वही ‘कचरा कुंड’

विकास की भेंट चढ़ा बभनगांवा तालाब: सौंदर्यीकरण का ढोंग या सरकारी पैसे की बर्बादी? सफाई के नाम पर बहा पानी, तालाब फिर बना गंदे पानी का नाला

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती का बभनगांवा तालाब: ‘विकास’ का ढोंग और पानी में डूबे करोड़ों रुपये!

  • अजब ‘सौंदर्यीकरण’: मशीनें लौटीं, पैसे डूबे और बभनगांवा तालाब फिर गंदा हुआ!
  • बस्ती में विकास का ‘शॉर्ट सर्किट’: एक करोड़ की योजना, 15 दिन से काम बंद। कागजों पर चमकता तालाब, धरातल पर कचरे का अंबार
  • बभनगांवा तालाब: जिम्मेदारों की ‘तकनीकी’ चुप्पी, जनता के एक करोड़ पानी में
  • क्या एक करोड़ की सौंदर्यीकरण परियोजना सिर्फ दिखावा थी? अधर में लटका काम
  • नगर पालिका के दावों की खुली पोल: सौंदर्यीकरण के नाम पर सरकारी धन का पलीता

बस्ती: विकास की चकाचौंध वाली फाइलों और धरातल की कड़वी सच्चाई के बीच का अंतर देखना हो, तो बस्ती के गांधीनगर स्थित बभनगांवा तालाब का दौरा कर लीजिए। जिस तालाब के कायाकल्प के लिए सरकार ने एक करोड़ रुपये पानी की तरह बहाने का दावा किया था, आज वही तालाब फिर से गंदे पानी और जलकुंभी का ‘कचरा कुंड’ बन चुका है।

दिखावे की सफाई, भारी-भरकम खर्चा

​लगभग एक महीने पहले जब लखीमपुर से हाईटेक मशीन मंगवाई गई, तो लगा कि अब बभनगांवा तालाब के ‘अच्छे दिन’ आने वाले हैं। 3,000 रुपये प्रति घंटे का किराया और ऊपर से डीजल का भारी-भरकम खर्च—सरकारी खजाने से यह पैसा जनता की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि शायद फोटो खिंचवाने और वाहवाही बटोरने के लिए खर्च किया गया था। पांच दिनों की मशक्कत के बाद तालाब थोड़ा साफ क्या हुआ, जिम्मेदार अधिकारी कुंभकर्णी नींद में सो गए।

सवाल सिस्टम की मंशा पर

​पिछले 15 दिनों से सौंदर्यीकरण का कार्य पूरी तरह ठप है। जिम्मेदार कौन है? बारिश का मौसम या मोहल्ले का गंदा पानी? नहीं, असली दोषी वह ‘सुस्त सिस्टम’ है जो योजना तो बनाता है, लेकिन उसे अंजाम तक पहुँचाने का माद्दा नहीं रखता। जब कार्य छह माह के भीतर पूरा होना था, तो फिर बीच में काम रोकने की नौबत क्यों आई? क्या यह जनता के टैक्स के पैसों की बर्बादी नहीं है?

‘तकनीकी कारण’ का पुराना ढर्रा

​नगर पालिका अध्यक्ष का बयान आया है— “तकनीकी कारणों से कार्य रुका था।” यह घिसा-पिटा जवाब अब जनता को रास नहीं आता। सवाल यह है कि यदि तकनीकी अड़चनें थीं, तो उन्हें कार्य शुरू करने से पहले दूर क्यों नहीं किया गया? जब तालाब की स्थिति फिर से पहले जैसी हो गई है, तो उस सफाई पर खर्च किए गए लाखों रुपये का हिसाब कौन देगा?

निष्कर्ष: समाधान की उम्मीद या महज एक और वादा?

​बभनगांवा तालाब का सौंदर्यीकरण महज एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि स्थानीय निवासियों के विश्वास का प्रतीक था। फिलहाल, यह परियोजना लापरवाही का स्मारक बनकर रह गई है। अगर जल्द ही काम युद्धस्तर पर शुरू नहीं हुआ, तो यह एक करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट बस्ती के विकास के नाम पर एक ‘सफेद हाथी’ साबित होगा।

जनता पूछ रही है: क्या सौंदर्यीकरण के नाम पर यह महज एक खानापूर्ति थी, या वास्तव में प्रशासन के पास इसे पूरा करने की कोई ठोस कार्ययोजना है?

सुझाव: प्रशासन को अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि कार्यस्थल पर मजदूरों और मशीनों की सक्रिय उपस्थिति से अपना पक्ष रखना होगा।

Back to top button
error: Content is protected !!