
छत्तीसगढ़/कोरबा ब्यूरो: देश
दिल्ली में विधानसभा की 70 सीटें हैं, जहां 7 महीने बाद चुनाव होने हैं. INDIA का हिस्सा आप और कांग्रेस ने इस चुनाव में अकेले लड़ने का फैसला किया है. दोनों पार्टियां हाल ही के लोकसभा चुनाव में मिलकर लड़ी थी. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि विधानसभा चुनाव में दोनों की राहें क्यों जुदा हो गई है?”
सात महीने बाद राजधानी दिल्ली में विधानसभा के चुनाव होने हैं, लेकिन सियासी बिसातें अभी से बिछने लगी हैं. बीजेपी जहां 27 साल का सियासी सूखा खत्म करने की रणनीति पर काम कर रही है. वहीं आप और कांग्रेस भी जोर-अजमाइश को लेकर स्ट्रैटजी तैयार करने में जुटी गई है. INDIA गठबंधन में शामिल आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने अलग-अलग चुनाव लड़ने का फैसला किया है. पिछले एक महीने में दोनों दलों की ओर से इसको लेकर कम से कम 3 बार घोषणाएं की गई है.
आप और कांग्रेस के अलग लड़ने की घोषणाएं इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि हालिया लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियों ने एकसाथ मिलकर उम्मीदवार उतारे थे.
राहें क्यों हुई जुदा, 3 पॉइंट्स
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही थी. आप केंद्रीय स्तर पर अभी भी इंडिया गठबंधन में शामिल है, लेकिन कांग्रेस ने दिल्ली में एकला चलो का फैसला किया है. आखिर इस फैसले की वजह क्या है?
1. AAP के साथ बेहतर तालमेल नहीं
लोकसभा चुनाव के दौरान गठबंधन के तहत दिल्ली में कांग्रेस को लड़ने के लिए 3 सीटें मिली. ये सीटें थी- नॉर्थ वेस्ट दिल्ली, नॉर्थ ईस्ट दिल्ली और चांदनी चौक. गठबंधन में रहने के बावजूद कांग्रेस सभी 3 सीटों पर बुरी तरह हार गई. हार के बाद कांग्रेस हाईकमान ने पीएल पुनिया और रजनी पाटिल को समीक्षा के लिए भेजा.
दोनों की फैक्ट फाइंडिंग टीम को जो हार का कारण मिला, वो काफी चौंकाने वाला था. तीनों ही उम्मीदवार ने हार के लिए आप से बेहतर तालमेल का न होना बताया.
रिपोर्ट्स के मुताबिक पार्टी उम्मीदवारों का कहना था कि जिन सीटों पर आप के विधायक थे, वहां भी बढ़त नहीं मिली, जो हार के कराण बन गए. मसलन, चांदनी चौक की सभी 10 सीटों पर आप के विधायक थे, लेकिन लोकसभा चुनाव में सिर्फ 3 सीटों पर ही कांग्रेस को बढ़त मिल पाई. कांग्रेस यह सीट 83 हजार वोटों से हार गई.
दिलचस्प बात है कि आप भी गठबंधन में रहकर एक भी सीट नहीं जीत पाई, लेकिन उसके खेमे से इस तरह का कोई आरोप बाहर नहीं आया.
2. समझौते में कांग्रेस को सीट मिलना मुश्किल
राजधानी दिल्ली में पिछले 10 सालों में लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव का गणित अलग-अलग रहा है. लोकसभा में जहां बीजेपी को बढ़त मिलती रही है, वहीं विधानसभा में आप एकतरफा जीतती रही है. 2014 में दिल्ली की सभी 7 लोकसभा सीटों पर बीजेपी जीत गई, लेकिन अगले ही साल विधानसभा के चुनाव में 70 में से 67 सीटों पर आप को जीत मिली.
2019 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी ने सभी 7 सीटों पर जीत दर्ज कर ली, लेकिन जब 2020 में विधानसभा के चुनाव हुए तो आप को बड़ी जीत हासिल हुई. 2024 में लोकसभा में बीजेपी जीती है और आप को फिर से 2015 और 2020 जैसा रिजल्ट आने की उम्मीद है.
ऐसे में आप कांग्रेस के साथ विधानसभा चुनाव में सीट शेयरिंग करे, यह मुश्किल है. आप ने लोकसभा के तुरंत बाद ही विधानसभा में सीट शेयरिंग नहीं करने की बात कही थी. कहा जा रहा है कि आप अगर कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग करती है तो उसे कई सीटिंग विधायकों के टिकट काटने पड़ेंगे और यह पार्टी के लिए मुश्किल हो सकता है.
3. कांग्रेस को 2024 के इन डेटा से भी उम्मीद
2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी. पार्टी के अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई थी, लेकिन लोकसभा चुनाव में पार्टी को विधानसभा की 8 सीटों पर बढ़त मिली है.
इतना ही नहीं, पार्टी को दिल्ली में गठबंधन के तहत करीब 18 प्रतिशत वोट मिले हैं. पार्टी ने मुस्लिम बहुल मुस्तफाबाद, सीलमपुरी, मटियामहल और बल्लीमारान जैसी सीटों पर भी बढ़त हासिल की है.
दिल्ली में करीब 9 प्रतिशत मुस्लिम हैं. पार्टी की नजर दलित जातियों पर भी है. राजधानी में करीब 17 प्रतिशत दलित हैं. लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी ने देवेंद्र यादव को कमान सौंपी है. राजधानी में यादव मतदाताओं की आबादी करीब 2 प्रतिशत है.
विधानसभा की 70 सीटें, इनमें 12 आरक्षित
दिल्ली विधानसभा में कुल 70 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी या गठबंधन को कम से कम 36 सीटों की जरूरत होती है. विधानसभा की 12 सीटें दलित समुदाय के लिए आरक्षित है. 2020 के चुनाव में आम आदमी पार्टी को 61 सीटों पर जीत मिली थी.
दिल्ली में साल 1993 से नियमित रूप से चुनाव कराए जा रहे हैं. राजधानी दिल्ली में सबसे ज्यादा दिनों तक कांग्रेस की शीला दीक्षित मुख्यमंत्री रही हैं. शीला 15 साल 25 दिन तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं



