
दशलक्षण धर्म –डॉ एच सी विपिन कुमार जैन
सामान्यतः लोग पूजा-पाठ, जाप, व्रत, दानादिक को ही धर्म कहते हैं , लेकिन आगम के अनुसार ये तो मात्र शुभ-भाव हैं , धर्म का स्वरूप से इससे पूर्ण भिन्न है। वत्थु सहावो धम्मो* अर्थात् धर्म तो वस्तु के स्वभाव को कहते हैं। जैसे अग्नि का स्वभाव उष्णता है , जल का स्वभाव शीतलता है ठीक उसी प्रकार क्षमादि दश धर्म आत्मा का यानि मेरा स्वभाव हैं।
हे आत्मन् ! जो जिसका स्वभाव होता है , वह उसी के आश्रय से ही प्रगट होता है। जैसे अग्नि की उष्णता अग्नि से ही मिलेगी, जल की शीतलता जल से मिलेगी ठीक उसी प्रकार उत्तमक्षमादि दशधर्म भी आत्मा का स्वभाव होने आत्मा की आराधना से ही प्रगट होंगें।
एक और विशेष बात कि धर्म दश नहीं होते है , धर्म तो एक ही है उसके लक्षण यानि प्रकटता दस रूपों में दिखाई देती है , जो क्षमा से शुरू होकर क्षमा पर ही पूर्ण होती है। आइये आज हम उत्तम क्षमा धर्म का स्वरूप समझते हैं !!
🌹 उत्तम क्षमा 🌹
. आज “उत्तम-क्षमा” धर्म का दिन है। सामान्य रूप से लोग यही समझते हैं कि क्रोध का अभाव ही क्षमा है। पर ऐसा नहीं है। भाई ! क्षमा तो आत्मा का स्वभाव है , और स्वभाव तो अनादि अनंत त्रिकाल रहता है। अभाव तो दूर कभी बदलता भी नहीं है। यदि क्षमा का अस्तित्व क्रोध के अभाव रूप स्वीकारेगें तो सिद्ध होगा कि पहले क्षमा नहीं थी बाद में आई , यानि क्षमा मेरा स्वभाव नहीं था , और क्रोध मेरा स्वभाव था , तब तो ये सिद्धांततः ही गलत ठहरेगा , जो संभव नहीं है।
कहने का अभिप्राय यही है कि क्षमा ही आत्मा का स्वभाव है , जब हम क्षमा स्वभावी आत्मा से विमुख होते हैं तब क्रोध की उत्पत्ति होती है।
हे आत्मन् !! जब दृष्टि अंतर्मुख स्वभाव सन्मुख होती है, तो सहज ही क्रोध की उत्पत्ति नहीं होती , बल्कि परम आनंद की अनुभूति होती है। और प्रत्येक जीव भगवान आत्मा दिखाई देता है। परिणामों में इष्ट-अनिष्ट का भाव ही नहीं होता , और जब कोई जग में इष्ट-अनिष्ट ही नहीं तो क्रोध क्यों और किसलिये होगा ? अर्थात् उत्पन्न ही नहीं होगा। तब निज और पर को हितकारी उत्तम-क्षमा सहज वरतेगी।
लेकिन इस कलिकाल में ऐसी उत्तम क्षमा का भाव आये कैसे ?
तब आचार्य भगवन कहते *हे भाई ! तत्त्वभ्यास करो !! स्व-पर का चिंतन करो !! दूसरों के दोष मत देखो। क्यों कि जगत का परिणमन स्वतंत्र है , उसे अनुकूल प्रतिकूल कहना तेरी अज्ञानता है , इन्हीं प्रतिकूल संयोगों में क्रोधित होकर तूने अपार संसार खड़ा किया है।
इस संबंध में “बाबू युगल जी” की लिखी पंक्तियाँ याद आती हैं…..
जड़ चेतन की सब परिणति प्रभु ,
अपने अपने में होती है।
अनुकूल कहें प्रतिकूल कहें ,
यह झूठी मन की वृत्ति है।
प्रतिकूल संयोगों में क्रोधित ,
होकर संसार बढ़ाया है।
हे आत्मन् ! विचार तो कर यदि तुझे कोई प्रतिकूल-संयोग मिले भी हैं तो वो तेरे अपने ही कर्मों का फल है , इसमें अन्य कोई दोषी नहीं है। इसलिये प्रतिकूल-संयोगों में क्रोध करके पुनः कर्म का बंध मत करो , बल्कि नवीन-कर्म बंध के कारण क्रोधादि को दूर करने का उपाय करो, प्रतिकूलताओं में साम्यभाव रखते हुये उत्तम क्षमा धर्म को धारण करो।







