
समीर वानखेडे :
हजारों आदिवासी भाइयों ने आज कोरपना तहसील कार्यालय पर अपने अधिकारों और मांगों को लेकर जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। आरोप लगाया गया कि सरकार आदिवासी समुदाय की जायज़ मांगों की अनदेखी कर रही है।
आदिवासी समुदाय की 12 ठोस मांगों को लेकर विभिन्न संगठनों के पदाधिकारियों के साथ बड़ी संख्या में महिलाओं और युवाओं ने भाग लिया। “हम अपना अधिकार लेकर रहेंगे!” और “सरकार जागो!” जैसे नारे पूरे तहसील क्षेत्र में गूंजते रहे।
मुख्य मांगें: बंजारा और धनगर जातियों को अनुसूचित जनजाति में शामिल करना रद्द किया जाए। पेसा के तहत 71 श्रेणियों में पदों की भर्ती में आदिवासी उम्मीदवारों को वरीयता दी जाए। आदिवासी भूमि पर राजस्व मंत्री बावनकुले का फैसला रद्द किया जाए।
सरकार का 12 जुलाई 2024 का परिपत्र रद्द किया जाए और 12 अप्रैल 2001 का परिपत्र यथावत रखा जाए। सर्वोच्च न्यायालय के 9 अगस्त 2024 के निर्णय को लागू किया जाए। 50% से अधिक आदिवासी आबादी वाले गाँव, टोले और बस्तियों को पेसा कानून में शामिल किया जाए। आदिवासी लड़कियों को गैर-आदिवासी से विवाह करने पर सरकारी लाभ से वंचित किया जाए।
लंबित वनाधिकार दावों का तुरंत निपटारा किया जाए।
ग्रामीण विकास विभाग शिक्षक भर्ती में योग्य उम्मीदवारों की नियुक्ति करे।
कोरपना तालुका के आश्रम विद्यालयों को सी.बी.सी. पैटर्न के अनुसार पहली से बारहवीं तक का दर्जा दिया जाए। राज्य सरकार को वर्ष 2023 में केंद्र सरकार द्वारा पारित भूमि अधिनियम को निरस्त करने की सिफारिश करनी चाहिए।
आदिवासी समुदाय के इस आंदोलन से क्षेत्र में तनावपूर्ण माहौल बन गया है। संगठनों ने चेतावनी दी है कि सरकार मांगों पर तुरंत सकारात्मक निर्णय ले, अन्यथा संघर्ष तेज होगा। इस समय आदिवासी अरुण मडावी, प्रभाकर गेदाम, प्रमोद कोडापे, लिंगा पाटिल वियाती, कैलास कोरंगे, लक्ष्मण कुरसंगे, लक्ष्मण पंधारे, गजानन जुमनाके, नीलकंठ राव कोरंगे, संजय सोयम आही ने हजारों लोगों की उपस्थिति में तहसीलदार के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपा.










