

**सहारनपुर चर्च कम्पाउंड भूमि घोटाला: एक संगठित आपराधिक साज़िश और धार्मिक संपत्ति की लूट का महा-वृत्तांत — **सहारनपुर विकास प्राधिकरण (SDA), तहसील, फ़र्ज़ी बिशप, भूमाफिया और प्रशासनिक भ्रष्टाचार का उत्तर प्रदेश-व्यापी काला गठजोड़**सहारनपुर: “चर्च कम्पाउंड पर कब्ज़े की साजिश बेनकाब — प्रॉपर्टी ऑफिसर चर्च ऑफ इंडिया (सी०ई०पी०बी०सी ) / इंडियन चर्च ट्रस्टीज ने DM को भेजी कड़ी शिकायत, मोहम्मद नईम हाजी अल्ला रखा पर अवमानना, अतिक्रमण और धार्मिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का गंभीर आरोप”**
**-*एलिक सिंह विशेष महा-जाँच रिपोर्ट —**
सहारनपुर के बाजोरिया मार्ग कॉलोनी में स्थित ऐतिहासिक चर्च कम्पाउंड की ज़मीन का विवाद अब एक सामान्य संपत्ति विवाद नहीं रहा, बल्कि यह उत्तर प्रदेश के इतिहास में धार्मिक संपत्तियों की सबसे बड़ी और सबसे संगठित आपराधिक लूट का मामला बनकर उभरा है। दैनिक आकांशा बुलेटिन की यह महा-जाँच रिपोर्ट, इस पूरे षड्यंत्र के हर पहलू, हर किरदार और हर प्रशासनिक विफलता को बेनक़ाब करती है, जिसकी जड़ें ज़िला प्रशासन, **सहारनपुर विकास प्राधिकरण (SDA), राजस्व विभाग और एक सुनियोजित फ़र्ज़ी धार्मिक सिंडिकेट तक फैली हुई हैं।** यह मामला न केवल वित्तीय धोखाधड़ी का है, **बल्कि यह प्रशासनिक तंत्र के भीतर गहरे पैठे भ्रष्टाचार, न्यायालय के आदेशों की खुली अवहेलना और धार्मिक आस्था के व्यापक दुरुपयोग का भी जीता-जागता प्रमाण है।** **इस पूरे घोटाले के केंद्र में SDA द्वारा अनुमोदित मूल नक्शे में की गई जालसाज़ी, तहसील के अधिकारियों द्वारा बनाई गई मनगढ़ंत जाँच रिपोर्ट, और स्वयं को बिशप घोषित करने वाले एक व्यक्ति का संगठित आपराधिक नेटवर्क है, जिसने भूमाफियाओं के साथ मिलकर करोड़ों की सार्वजनिक और धार्मिक संपत्ति को निजी मुनाफ़े के लिए दाँव पर लगा दिया।*
**सबसे पहले, इस पूरे घोटाले की शुरुआत **सहारनपुर विकास प्राधिकरण (SDA)** के गलियारों से होती है। चर्च कम्पाउंड कॉलोनी का जो मूल नक्शा SDA ने पास किया था, वह कॉलोनी के निवासियों और व्यापक जनहित को ध्यान में रखकर बनाया गया था। इस मूल **नक्शे में स्पष्ट रूप से पार्क, बच्चों के खेलने का मैदान, टैक्सी स्टैंड, सार्वजनिक पार्किंग स्थल, और सामुदायिक उपयोग के लिए निर्धारित भूमि शामिल थी**। ये क्षेत्र ‘सार्वजनिक उपयोग’ के लिए आरक्षित थे, जिनका मालिकाना हक़ किसी निजी व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता था।** हालाँकि, भूमाफियाओं ने SDA के भ्रष्ट अधिकारियों के साथ मिलकर एक घिनौनी साज़िश रची। उन्होंने इस **मूल नक्शे को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया और इसे इस तरह से संशोधित करवा लिया, जिससे सार्वजनिक उपयोग के लिए निर्धारित सभी बेशक़ीमती ज़मीनें ग़ायब हो गईं। नक्शे में इन सार्वजनिक स्थलों को फ़र्ज़ी तरीके से **चर्च ऑफ़ नार्थ इंडिया ट्रस्ट एसोसिएशन ‘**और तथाकथित **आगरा डायोसिस’** के नाम पर दर्शा दिया गया। यह पहला और सबसे निर्णायक क़दम था जिसने सार्वजनिक संपत्ति को निजी मुनाफ़े के लिए इस्तेमाल करने का रास्ता खोल दिया। SDA के अधिकारियों की इस मिलीभगत के बिना, इस स्तर की जालसाज़ी संभव नहीं थी, जो स्पष्ट रूप से सिद्ध करता है कि यह महज़ काग़ज़ी ग़लती नहीं, बल्कि एक सोची-समझी आपराधिक साज़िश थी। सहारनपुर के ऐतिहासिक चर्च कम्पाउंड, बाजोरिया मार्ग पर अवैध कब्ज़े का संगीन मामला अब शहर की सबसे बड़ी ब्रेकिंग बन गया है, जहां चर्च ऑफ इंडिया (सी०ई०पी०बी०सी ) / इंडियन चर्च ट्रस्टीज ने जिला अधिकारी सहारनपुर को भेजे गए सख्त पत्र में **मोहम्मद नईम पुत्र हाजी अल्ला रखा पर ताला लगाकर कब्ज़ा करने, अवैध निर्माण करवाने, चर्च अधिकारी को परिसर में प्रवेश से रोकने और अदालत के आदेशों को खुलेआम चुनौती देने का आरोप लगाया है; पत्र में इसे न सिर्फ आपराधिक अतिक्रमण बल्कि धार्मिक विरासत पर हमला और न्यायालय की सीधी अवमानना बताया गया है। प्रॉपर्टी ऑफिसर चर्च ऑफ इंडिया (सी०ई०पी०बी०सी ) / इंडियन चर्च ट्रस्टीज द्वारा दिए गए आरोपों में कहा गया है कि आरोपी ने न सिर्फ चर्च की भूमि पर कब्ज़ा करने की कोशिश की, बल्कि न्यायालय में **लंबित सिविल सूट संख्या 796/2025 (अलिक जॉन सिंह बनाम मोहम्मद नईम) के दौरान यह कार्रवाई कर कानून की धज्जियाँ उड़ाईं और उच्च न्यायालय के आदेश सहित शासनादेश संख्या 197/1-2-2000-10(4)/97 दिनांक 05.06.2000 का उल्लंघन किया; शिकायत में भारतीय दंड संहिता (BNS–2023) की धाराएँ 357 (आपराधिक अतिक्रमण), 359 (बलपूर्वक कब्ज़ा), 326(2) (धार्मिक संपत्ति को क्षति), 356 (ग़लत प्रवेश) और 463 (सरकारी आदेश की अवहेलना)** के तहत कठोर कार्रवाई की मांग की गई है, साथ ही **कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट्स और इंडियन चर्च एक्ट** के उल्लंघन का भी स्पष्ट उल्लेख है। चर्च ने जिला अधिकारी से मांग की है कि कब्ज़ा तत्काल हटवाया जाए, *आरोपी पर FIR दर्ज की जाए, अवैध निर्माण रोका जाए और चर्च संपत्ति को स्थायी पुलिस सुरक्षा प्रदान की जाए** क्योंकि यह मामला केवल जमीन का विवाद नहीं बल्कि धार्मिक गरिमा, ऐतिहासिक धरोहर और कानून के शासन को चुनौती देने जैसा है। प्रशासन पर अब भारी दबाव है कि वह क्या कार्रवाई करता है — *शहर की नज़रें अब जिला अधिकारी , पुलिस और जिला प्रशासन पर टिकी हुई हैं, क्योंकि यह मुद्दा सहारनपुर का सबसे संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल धार्मिक-भूमि विवाद बन चुका है। SDA के इस नक्शे को आधार बनाकर, भूमाफिया **मो. नईम** और उसके सहयोगियों के नेटवर्क ने करोड़ों रुपये की ज़मीनें बेचनी शुरू कर दीं, मानों ये संपत्तियाँ उनकी निजी पुश्तैनी जायदाद हों। उन्होंने इन जाली दस्तावेज़ों का इस्तेमाल शासन और ज़िला प्रशासन को गुमराह करने के लिए किया। आश्चर्य की बात यह है कि ज़िला प्रशासन ने इन फ़र्ज़ी दावों की वैधता को स्थापित करने के लिए **न्यूनतम सत्यापन प्रक्रिया** भी नहीं अपनाई। वे यह देखने तक मौक़े पर नहीं गए कि जिस **’चर्च ऑफ़ नार्थ इंडिया ट्रस्ट एसोसिएशन ‘** और **’आगरा डायोसिस’** के नाम पर ज़मीनें दर्शाई जा रही हैं, क्या वे संस्थाएँ वास्तव में अस्तित्व में हैं, या क्या उनके पास उस विशिष्ट भूमि का कोई वैध, राजस्व अभिलेखों में दर्ज स्वामित्व है। इसी प्रशासनिक ढिलाई और जानबूझकर की गई उपेक्षा का फ़ायदा उठाकर, भूमाफिया नेटवर्क ने चर्च की और रेलवे की ज़मीन पर खुलकर क़ब्ज़े का खेल चलाया।
इस पूरे प्रकरण में **राजस्व विभाग (तहसील)** की भूमिका सबसे अधिक संदिग्ध और आपराधिक है। जब चर्च ऑफ़ इंडिया (सी ई पी बी सी ) डायोसिस ऑफ़ लखनऊ के संपत्ति अधिकारी ने जिलाधिकारी सहारनपुर को शिकायत दी कि चर्च कम्पाउंड की भूमि, जो अभिलेखों में **’इंडियन चर्च ट्रस्टीज़’** के नाम पर दर्ज है, उसे ज़मीन माफिया हड़पने की कोशिश कर रहे हैं और इस पर तत्काल रोक लगाई जाए, तो प्रशासन ने जाँच के लिए लेखपाल **खानआलमपुरा** को नियुक्त किया। यहाँ से प्रशासनिक भ्रष्टाचार का दूसरा अध्याय शुरू होता है। लेखपाल खान आलमपुरा ने अपनी जाँच रिपोर्ट में साफ़ तौर पर कहा कि खसरा संख्या **166/167 , जो चर्च की संपत्ति बताया जा रहा है, वह उस स्थान पर मौजूद ही नहीं है, बल्कि रेलवे लाइन के पास है। उन्होंने आगे दावा किया कि जिस ज़मीन पर क़ब्ज़ा हो रहा है, वह वास्तव में खसरा 196 है, जो **रेलवे की संपत्ति** है। यह रिपोर्ट न केवल हास्यास्पद थी, बल्कि यह **झूठ पर आधारित** थी। हमारी जाँच में सामने आया है कि लेखपाल ने न तो मौक़े पर जाकर कोई साइट निरीक्षण किया, न ही उन्होंने राजस्व अभिलेखों का मिलान किया, और न ही वास्तविक कब्ज़े की स्थिति का सत्यापन किया। उन्होंने बिना किसी आधार के, सीधे भूमाफियाओं के पक्ष में एक रिपोर्ट तैयार कर दी, जिसने **सत्य को पूरी तरह से उलट दिया**। इस झूठी रिपोर्ट में सबसे अधिक निंदनीय बात यह है कि इस पर **उपजिलाधिकारी सदर, तहसीलदार सदर और नायब तहसीलदार** तक ने हस्ताक्षर कर दिए और इसे अंतिम जाँच रिपोर्ट घोषित कर दिया। यह महज़ लापरवाही नहीं, बल्कि **उच्च प्रशासनिक स्तर पर संगठित मिलीभगत** का स्पष्ट प्रमाण है, जिसका उद्देश्य भूमाफियाओं के अवैध क़ब्ज़े को वैधानिकता प्रदान करना था। यानी, राजस्व अधिकारियों ने चर्च की ज़मीन को फ़र्ज़ी तरीके से रेलवे की ज़मीन घोषित कर दिया, ताकि असली अपराधी बच सकें और कब्ज़े को लेकर भ्रम की स्थिति बनी रहे।
इस घोटाले का तीसरा और सबसे सनसनीख़ेज़ आयाम **फ़र्ज़ी बिशप दीनश कुमार दीवाकर सिंडिकेट** का उदय है। हमारी गहन समीक्षा में पता चला कि भारतीय चर्च से जुड़ी सभी वैध संपत्तियाँ **इंडियन चर्च ट्रस्टीज़** के नाम पर दर्ज हैं, और सहारनपुर, (सीoईoपीoबीoसी ) के लखनऊ डायोसिस ट्रस्ट एसोसिएशन के अधिकार क्षेत्र में आता है। इस डायोसिस के वर्तमान चेयरमैन और अधिकृत बिशप **राइट. रेव. शमूएल पीटर प्रकाश** हैं, जिनका नाम विधिवत **मिनिस्ट्री ऑफ़ कॉर्पोरेट अफ़ेयर्स (एम् सी ऐ)** और ** रजिस्टरार ऑफ़ कम्पनीइसज कानपूर (ROC) कानपुर** की अधिकृत सूची में दर्ज है। इसके बावजूद, सहारनपुर में **दीनश कुमार दीवाकर** नामक व्यक्ति खुलेआम घूमकर ख़ुद को (सीoईoपीoबीoसी) का बिशप बताता है और चर्च की संपत्ति के काग़ज़ात पर हस्ताक्षर करता है। हमारी जाँच में यह साबित हुआ है कि दीवाकर का नाम न तो ** रजिस्टरार ऑफ़ कम्पनीइसज कानपूर (ROC) कानपुर** में दर्ज है, न ही **मिनिस्ट्री ऑफ़ कॉर्पोरेट अफ़ेयर्स (एम् सी ऐ)** की किसी सूची में, और न ही *(सी०ई०पी०बी०सी ) **जनरल काउंसिल** के किसी आधिकारिक दस्तावेज़ में। वह पूरी तरह से **अनाधिकृत और फ़र्ज़ी** व्यक्ति है। सबसे बड़ा ख़ुलासा यह है कि दीवाकर मूल रूप से एक हिंदू परिवार से ताल्लुक़ रखता है, जिसने केवल चर्च की बेशक़ीमती संपत्तियों को बेचने के उद्देश्य से ईसाई धर्म अपनाया। **वह अपनी नियुक्ति के लिए जिस संतोष सागर के पत्रों का सहारा लेता है, उस संतोष सागर को ही तत्कालीन **मेट्रोपोलिटन चर्च ऑफ़ इंडिया राइट रेव शमूएल पीटर प्रकाश द्वारा 2014 में संस्था से निष्कासित किया जा चुका है। यानी, एक **निष्कासित व्यक्ति द्वारा जारी कथित नियुक्ति पत्र** **को आधार बनाकर दीवाकर ख़ुद को बिशप बता रहा है**, और आश्चर्यजनक रूप से, ज़िला प्रशासन असली और वैध बिशप के दस्तावेज़ों को नज़रअंदाज़ करते हुए इस फ़र्ज़ी व्यक्ति से दस्तावेज़ ले रहा है। दीवाकर पर थाना बेहट और थाना जनकपुरी, सहारनपुर में ज़मीन डीलिंग, धमकाने और अवैध लेनदेन के गंभीर आपराधिक मुक़दमे दर्ज हैं। यह स्पष्ट है कि दीवाकर सिंडिकेट, भूमाफिया के साथ मिलकर एक त्रि-स्तरीय संगठित आपराधिक ढाँचा चला रहा है, जिसमें दीवाकर धार्मिक संस्था की मोहर और नाम का दुरुपयोग करता है, भूमाफिया बाज़ार में डील करता है, और भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारी उन्हें सरकारी संरक्षण प्रदान करते हैं।
सबसे गंभीर पहलू **न्यायालय के आदेशों की खुली अवहेलना** है। माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय और शासन द्वारा जारी स्पष्ट आदेशों में यह अनिवार्य किया गया है कि किसी भी ईसाई संपत्ति, चर्च संपत्ति या कब्रिस्तान पर अवैध क़ब्ज़ा पाए जाने पर, बिना किसी विलंब के **तत्काल ध्वस्तीकरण और अतिक्रमण हटाना** आवश्यक है। सहारनपुर के अधिकारियों ने इन आदेशों को फ़ाइलों में दबाकर रखा और जानबूझकर उन पर कोई कार्रवाई नहीं की, जिससे अवैध क़ब्ज़ा करने वालों का मनोबल बढ़ा। यह प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा पर सीधा प्रहार और **न्यायिक अवमानना** का गंभीर मामला है।
संक्षेप में, सहारनपुर का चर्च कम्पाउंड भूमि घोटाला महज़ एक ज़मीन का टुकड़ा हड़पने का मामला नहीं है। यह एक **बहुआयामी, संगठित आपराधिक नेटवर्क** है जिसमें निम्नलिखित मुख्य तत्त्व शामिल हैं:
1. **SDA नक्शा घोटाला:** सार्वजनिक उपयोग की भूमि को साज़िशन फ़र्ज़ी संस्थाओं के नाम पर चढ़ाना।
2. **तहसील की जाली रिपोर्ट:** उच्च राजस्व अधिकारियों द्वारा भूमाफियाओं के पक्ष में फ़र्ज़ी रिपोर्ट को प्रमाणित करना।
3. **फ़र्ज़ी बिशप सिंडिकेट:** दीनश कुमार दीवाकर द्वारा धार्मिक पदवी का दुरुपयोग कर संपत्ति की अवैध बिक्री करना।
4. **भूमाफिया-प्रशासनिक गठजोड़:** मो. नईम और अन्य भूमाफियाओं को भ्रष्ट अधिकारियों द्वारा संरक्षण मिलना।
5. **ROC और MCA रिकॉर्ड से खिलवाड़:** वैधानिक संस्थाओं के रिकॉर्ड को नज़रअंदाज़ कर फ़र्ज़ी संस्थाओं को मान्यता देना।
6. **न्यायिक आदेशों की अवहेलना:** हाईकोर्ट के स्पष्ट ध्वस्तीकरण आदेशों को फ़ाइलों में दबाना।
7. **सरकारी संपत्ति पर क़ब्ज़ा:** रेलवे की ज़मीन को भी चर्च की संपत्ति बताकर अवैध बिक्री करना।
इस पूरे महा-घोटाले का पर्दाफ़ाश यह स्पष्ट करता है कि सहारनपुर में धार्मिक संपत्तियों के नाम पर अब तक का सबसे बड़ा घोटाला चल रहा है, जिसका सीधा असर क़ानून-व्यवस्था, न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता और आम जनता के धार्मिक संस्थाओं पर विश्वास पर पड़ रहा है। यदि इस पूरे मामले की तत्काल **केंद्रीय जाँच एजेंसी (CBI/EOW) या एक विशेष जाँच दल (SIT)** से गहन जाँच नहीं कराई गई, तो इस नेटवर्क में शामिल आधा ज़िला प्रशासन और भूमाफिया गिरोह क़ानून की पहुँच से बाहर रहेंगे। यह घोटाला यह भी चेतावनी देता है कि धार्मिक संस्थाओं के भीतर पैठ बनाकर संपत्ति की लूट करने वाले फ़र्ज़ी बिशपों और संस्थाओं पर सख़्त कार्रवाई आवश्यक है। अब यह केवल ज़िला प्रशासन का नहीं, बल्कि **उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्रीय गृह मंत्रालय** का दायित्व है कि वे इस महा-घोटाले की जड़ों को काटकर न्याय सुनिश्चित करें, ताकि सहारनपुर जैसे शहरों में धार्मिक आस्था का दुरुपयोग काले कारोबार का अड्डा न बन जाए।














