दरभंगाबिहार

बीमा कंपनियों को चेतावनी: राष्ट्रीय लोक अदालत में दिखेगा असर

दरभंगा में क्लेम केसों के त्वरित निष्पादन को लेकर अधिवक्ताओं व अधिकारियों की बैठक, राष्ट्रीय लोक अदालत में अधिकतम निपटारे पर जोर, न्याय में तेजी का प्रयास।

क्लेम मामलों के त्वरित निष्पादन की आवश्यकता और न्यायिक संवेदनशीलता का उदाहरण

दरभंगा, 27 नवम्बर 2025—
क्लेम केस या दावा वाद ऐसे मुकदमे हैं, जिनमें अधिकांशतः पीड़ित परिवार अपने जीवन की सबसे कठिन घड़ी में न्याय और आर्थिक सहायता की प्रतीक्षा करते हैं। सड़क दुर्घटनाएं, बीमा विवाद, एवं मुआवजा संबंधित मामले अक्सर वर्षों तक कोर्ट-कचहरी में उलझे रहते हैं, जिससे पीड़ित परिवार न्याय की प्रतीक्षा में आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव झेलते हैं। ऐसे समय में न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका अत्यंत सराहनीय है, जो केवल कानून की प्रक्रिया तक सीमित नहीं बल्कि मानवीय संवेदनशीलता का भी परिचायक बनती है।

इसी संदर्भ में, प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकार श्री शिव गोपाल मिश्र के निर्देश पर विशेष उत्पाद न्यायाधीश द्वितीय श्री रविशंकर कुमार एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकार की सचिव आरती कुमारी द्वारा क्लेम केसों के निष्पादन को लेकर अधिवक्ताओं और संबंधित अधिकारियों के साथ बैठक आयोजित करना न्यायिक सुव्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। आगामी 13 दिसंबर को प्रस्तावित राष्ट्रीय लोक अदालत में अधिक से अधिक मामलों को सुलझाने के उद्देश्य से की गई यह रणनीतिक तैयारी निस्संदेह न्यायिक व्यवस्था पर बढ़ते बोझ को कम करने में सहायक होगी।

विशेष न्यायाधीश श्री कुमार द्वारा बीमा कंपनियों एवं उनके अधिवक्ताओं के सहयोग पर दिया गया जोर वास्तविक न्याय के मार्ग में सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। अक्सर देखा जाता है कि बीमा कंपनियों की तकनीकी जटिलताओं और प्रक्रिया संबंधी देरी के कारण पीड़ितों को न्याय पाने में विलंब होता है। सचिव आरती कुमारी द्वारा प्री-काउंसलिंग की आवश्यकता पर बल देना यह दर्शाता है कि समाधान का रास्ता संवाद और सहमति से ही निकलेगा, न कि अनावश्यक मुकदमेबाजी से।

अधिवक्ताओं रविशंकर प्रसाद, ध्रुव कुमार ठाकुर, चंद्रधर मल्लिक, शिशिर कुमार दास, जवाहर कुमार झा, हरिवंश कुमार कर्ण, सोहन कुमार सिन्हा, सुरेंद्र कुमार तथा मो. मकसूद सहित न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी के प्रतिनिधि मुकुल रंजन की उपस्थिति यह प्रमाणित करती है कि न्यायिक एवं प्रशासनिक समन्वय के माध्यम से बड़ा बदलाव संभव है।

आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है—
न्याय की गति बढ़े, पीड़ितों की राहत सुनिश्चित हो और लोक अदालत जैसी पहलें न्याय को आम लोगों के द्वार तक पहुँचाएँ।

ऐसी बैठकों के परिणाम तभी सार्थक होंगे जब हर पक्ष जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ अपने दायित्व का निर्वहन करेगा।

Sitesh Choudhary

चढ़ते हुए सूरज की परस्तिश नहीं करता, लेकिन, गिरती हुई दीवारों का हमदर्द हूँ।
Back to top button
error: Content is protected !!