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अधिकारी के खास, जनता के पास… सिर्फ दिखावे का ‘लाइव’ और असली ‘लेन-देन’।

अधिकारी के खास, जनता के पास... सिर्फ दिखावे का 'लाइव' और असली 'लेन-देन'।

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। बस्ती का ‘कमीशन तंत्र’: रुधौली से हर्रैया तक, खबर के नाम पर ‘वसूली’ का खेल।।

बुधवार 21 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

😇जब पत्रकार ही बन जाए ‘ठेकेदार का पार्टनर’, तो जनता किससे गुहार लगाए?

💫कलम की धार या ‘मैनेजमेंट’ का जुगाड़?

💫बस्ती की पत्रकारिता का बदलता चेहरा

बस्ती ।।  जिसे कभी साहित्य और शुचिता की धरती कहा जाता था, आज वहां की पत्रकारिता के गलियारों में एक नई ‘कला’ का जन्म हुआ है। इसे पत्रकारिता कहना शायद थोड़ा पुराना हो गया है, अब तो इसे ‘इवेंट मैनेजमेंट’ कहना ज्यादा सटीक लगता है।

💫यूट्यूब की ‘माइक’ और मैनेज करने का हुनर

जनपद के कुछ ‘वरिष्ट और सम्मानित’ पत्रकार अब खबर लिखते नहीं, बल्कि खबर ‘मैनेज’ करते हैं। हाथ में यूट्यूब का माइक और चेहरे पर व्यवस्था को सुधारने का झूठा दंभ, लेकिन असल खेल कैमरे के पीछे शुरू होता है। खबर की तीखापन जनहित के लिए नहीं, बल्कि सामने वाले की ‘जेब’ के वजन को मापने के लिए इस्तेमाल की जा रही है।

💫खबरों का बाज़ार और सौदेबाजी

आजकल खबर बनना उतनी बड़ी बात नहीं है, जितनी बड़ी बात उस खबर को ‘दबा देना’ है।

दहाड़ सिर्फ दिखावे की: कैमरे के सामने जो शेर की तरह दहाड़ते हैं, वही बंद कमरों में ‘मैनेजमेंट’ की मेज पर भीगी बिल्ली बन जाते हैं।

प्रशासन से ‘मधुर’ संबंध: तथाकथित वरिष्ठों का काम अब जनसमस्याओं को उठाना नहीं, बल्कि अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच सेतु बनकर अपना ‘हिस्सा’ सुनिश्चित करना रह गया है।

सम्मान का मुखौटा: सम्मानित होने का चोला ऐसा ओढ़ा है कि सरेआम हो रही लूट पर भी इनकी कलम (या कीबोर्ड) तभी चलती है, जब ‘सम्मान राशि’ में देरी हो जाए।

💫सोशल मीडिया बना ‘वसूली’ का नया हथियार

फेसबुक और यूट्यूब ने इन ‘मैनेजमेंट विशेषज्ञों’ को वो ताकत दे दी है, जिसका उपयोग वे ब्लैकमेलिंग के आधुनिक टूल के रूप में कर रहे हैं। सनसनीखेज हेडलाइन डालकर पहले माहौल बनाया जाता है, और फिर शाम ढलते-ढलते वही खबर गायब हो जाती है। जनता पूछती रह जाती है—साहब, वो खबर क्या हुई? जवाब मिलता है—’जांच चल रही है’। दरअसल, जांच पत्रकार के बैंक खाते में पूरी हो चुकी होती है।

बस्ती जनपद में पत्रकारिता अब मिशन नहीं, बल्कि एक ‘मल्टी-करोड़’ इंडस्ट्री बन चुकी है। जनपद के रुधौली, हर्रैया, भानपुर और सदर की तहसीलों में घूमने वाले कुछ ‘वरिष्ठ’ चेहरों ने पत्रकारिता के चोले में दलाली का ऐसा जाल बुना है कि विकास की गंगा अब फाइलों से निकलकर सीधे इनके घरों के लॉन में बह रही है।

⭐हर्रैया और रुधौली: सड़कों के नाम पर ‘मैनेजमेंट’ का खेल

हर्रैया और रुधौली में सड़कों के पैच वर्क और नए निर्माण में 🔥घटिया सामग्री का उपयोग किसी से छिपा नहीं है।

🔥यहाँ के ‘यूट्यूबिया शूरवीर’ कैमरा लेकर मौके पर पहुँचते तो हैं, लेकिन उनका मकसद गिट्टी की क्वालिटी चेक करना नहीं, बल्कि ठेकेदार का ‘हिसाब-किताब’ चेक करना होता है।

🔥जैसे ही ‘लेन-देन’ का तालमेल बैठता है, घटिया से घटिया सड़क भी इनके कैमरों में ‘स्वर्ग’ जैसी दिखने लगती है।

🔥भानपुर और सदर: स्वास्थ्य और ब्लॉक में सेटिंग का अड्डा

🔥भानपुर और सदर ब्लॉक के दफ्तरों में ये ‘वरिष्ठ’ पत्रकार कम और ‘बिचौलिए’ ज्यादा नजर आते हैं।

🔥अस्पतालों में दवाओं की कमी हो या ब्लॉक में आवास योजना की धांधली, इन ‘मैनेजमेंट उस्तादों’ की आवाज तभी निकलती है जब इनका अपना हिस्सा फंसता है।

🔥स्वास्थ्य विभाग के ठेके: एम्बुलेंस से लेकर सफाई तक के ठेकों में इन सम्मानित पत्रकारों की मौन सहमति और कमीशन फिक्स है।

⭐सिंचाई विभाग और ड्रेनेज: भ्रष्टाचार की बहती गंगा

बस्ती में सिंचाई विभाग और नहरों की सफाई के नाम पर हर साल करोड़ों का वारा-न्यारा होता है। इन ‘वरिष्ठों’ की कलम उन सूखी नहरों पर कभी नहीं चलती जहाँ किसान पानी के लिए तरस रहा है। क्यों? क्योंकि विभाग के बड़े साहब और इन पत्रकारों के बीच ‘सांयकाल’ की गोष्ठियों में सब कुछ पहले ही ‘मैनेज’ कर लिया जाता है।

⭐सम्मानित ‘मैनेजरों’ की आलीशान जीवनशैली

एक साधारण अखबार की नौकरी या छोटा सा यूट्यूब चैनल चलाने वाले इन ‘माननीयों’ के पास आखिर इतनी संपत्ति कहाँ से आई?

⭐बस्ती शहर की पॉश कॉलोनियों में मकान और लग्जरी गाड़ियाँ इस बात का सबूत हैं कि ‘खबर मैनेज’ करने का धंधा किसी भी बड़ी फैक्ट्री से ज्यादा मुनाफा दे रहा है।

⭐अधिकारी भी इन्हें ‘पत्रकार’ नहीं, बल्कि अपना ‘पीआर एजेंट’ मानते हैं।

⭐लोकतंत्र का चौथा स्तंभ या भ्रष्टाचार का खंभा?

🔥बस्ती की जनता को अब यह तय करना होगा कि वे इन ‘मैनेजमेंट विशेषज्ञों’ को सम्मान देते रहेंगे या इनसे सवाल पूछेंगे। अगर यही हाल रहा, तो हर्रैया की सड़कें टूटती रहेंगी, रुधौली की जनता प्यासी रहेगी और भानपुर के गरीब का हक ये ‘सम्मानित’ पत्रकार और भ्रष्ट अधिकारी मिलकर डकारते रहेंगे।

⭐सड़क के गड्ढों से लेकर दफ्तरों की फाइलों तक… सब ‘मैनेज’ है

💫बस्ती जनपद में इन दिनों पत्रकारिता का एक नया ‘सिलेबस’ चल रहा है। यहाँ के कुछ तथाकथित ‘वरिष्ठों’ ने कलम को हल और यूट्यूब को कुदाल बना लिया है, जिससे वे जनता की समस्याओं को नहीं, बल्कि अपनी किस्मत को जोत रहे हैं।

⭐सड़कें टूट रही हैं, पर ‘कलम’ खामोश है

💫जनपद में पीडब्ल्यूडी (PWD) और नगर पालिका की सड़कें पहली बारिश में ही बह जाती हैं। जनता धूल फांक रही है, लेकिन हमारे ‘मैनेजमेंट गुरु’ पत्रकार सड़क की गिट्टियां नहीं गिनते।

⭐वे सड़क पर खड़े होकर लाइव तो करते हैं, लेकिन वह लाइव ठेकेदार को डराने के लिए होता है, सुधार के लिए नहीं।

⭐जैसे ही ठेकेदार का ‘संदेश’ पहुँचता है, अगले दिन वही सड़क इनके लिए ‘विकास का मॉडल’ बन जाती है।

⭐विकास भवन से तहसील तक का ‘टोल टैक्स’

🔥भ्रष्टाचार के खिलाफ चिल्लाने वाले ये चेहरे असल में सिस्टम के सबसे बड़े हिस्सेदार बन चुके हैं।

🔥फाइलें दबाने का हुनर: किसी गरीब की फाइल अटकी हो तो ये चुप रहेंगे, लेकिन अगर किसी अधिकारी की फाइल में ‘मलाई’ की खुशबू आ जाए, तो ये गिद्ध की तरह मंडराने लगते हैं।

🔥दलाली का नया नाम ‘सम्मान’: कलेक्ट्रेट से लेकर ब्लॉक तक, इन वरिष्ठों का काम अब खबर कवर करना नहीं, बल्कि ‘सेटिंग’ करना रह गया है। अधिकारी भी खुश हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि कुछ ‘कागज के टुकड़ों’ से इन शेरों का मुँह बंद किया जा सकता है।

⭐यूट्यूब का ‘लाइव’ और हकीकत का ‘डेड’ होना

🔥सुबह यूट्यूब पर तीखी हेडलाइन आती है— “बड़ा घोटाला, अधिकारी की उड़ी नींद!” लेकिन शाम होते-होते वह वीडियो ‘प्राइवेट’ हो जाता है या हटा लिया जाता है। आखिर ऐसा कौन सा जादू है जो चंद घंटों में भ्रष्टाचार को ईमानदारी में बदल देता है? बस्ती की जनता जानती है कि यह जादू ‘गांधी छाप’ नोटों का है।

⭐जनता की अदालत में एक सवाल

🔥जब पत्रकार ही ठेकेदार का साझीदार बन जाए और संपादक ही ‘मैनेजर’ की भूमिका निभाने लगे, तो बस्ती का विकास कैसे होगा? इन ‘मैनेजमेंट विशेषज्ञों’ ने उन गिने-चुने ईमानदार पत्रकारों की साख को भी दांव पर लगा दिया है जो आज भी सच के लिए लड़ रहे हैं।

🔥कड़वा सच: बस्ती में अब खबर वो नहीं जो घट रही है, खबर वो है जो ये ‘वरिष्ठ’ दिखाना चाहते हैं। और ये वही दिखाते हैं, जिसकी इन्हें ‘कीमत’ मिलती है।

📢 याद रखिये, जब कलम बिकती है, तो सबसे पहले गरीब की किस्मत कटती है। बस्ती की पत्रकारिता को इन ‘मैनेजरों’ से आजाद कराना ही होगा।

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