
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती में बाल श्रम उन्मूलन अभियान या ‘फोटो सेशन’ का तमाशा?
वृहस्पतिवार 22 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।
बस्ती।। जनपद में बाल एवं किशोर श्रम उन्मूलन के दावों की हवा निकलती नजर आ रही है। शासन के निर्देश पर 16 से 30 जनवरी तक चलाए जा रहे ‘विशेष अभियान’ की जमीनी हकीकत कागजी दावों से कोसों दूर है। एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (AHTU), श्रम विभाग और चाइल्ड लाइन की संयुक्त टीम सड़कों पर कार्रवाई करने के बजाय केवल ‘ज्ञान और भाषण’ की औपचारिकता निभाकर अपनी पीठ थपथपा रही है। आलम यह है कि अभियान अब कार्रवाई का माध्यम न बनकर महज एक ‘फोटो सेशन’ का इवेंट बनकर रह गया है।
💫कागजों पर जागरूकता, ढाबों पर मजदूरी
कप्तानगंज, हरैया, छावनी और परशुरामपुर जैसे प्रमुख इलाकों में जागरूकता के नाम पर भारी-भरकम पोस्टर तो चस्पा किए गए, लेकिन धरातल पर सन्नाटा पसरा है। इन क्षेत्रों के चाय के स्टालों, छोटे होटलों और ढाबों पर मासूमों के हाथों में आज भी कलम के बजाय जूठे बर्तन और भारी बोझे नजर आ रहे हैं। जिम्मेदारों की टीम इन रास्तों से गुजरती तो है, लेकिन उनकी नजर इन मासूमों पर नहीं पड़ती।
💫आठ बच्चों की ‘मुक्ति’ का दावा, पुनर्वासन पर चुप्पी
AHTU ने पूरे अभियान के दौरान महज 8 बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराने का दावा किया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल संख्या गिना देने से जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? इन बच्चों के पुनर्वासन और संरक्षण को लेकर विभाग ने पूरी तरह चुप्पी साध रखी है। क्या ये बच्चे वापस उन्हीं तंग गलियों और मजबूरियों में नहीं धकेले जाएंगे? सिस्टम के पास इसका कोई जवाब नहीं है।
“जब रक्षक ही केवल कागजी खानापूर्ति में व्यस्त हों, तो उन मासूमों का भविष्य अंधकारमय होना निश्चित है जिनकी उंगलियां अभी कलम पकड़ना भी नहीं सीख पाईं।”
💫टोल फ्री नंबर का प्रचार, पर शिकायतों पर ‘काॅमा’
अभियान के दौरान टोल फ्री नंबरों का खूब प्रचार किया गया, लेकिन जब स्थानीय लोग जमीनी स्तर पर बाल श्रम की शिकायतें करते हैं, तो सिस्टम ‘वेटिंग मोड’ पर चला जाता है। श्रम प्रवर्तन विभाग और AHTU की सुस्ती यह बताने के लिए काफी है कि उन्हें बच्चों के भविष्य से ज्यादा अपनी फाइलों को दुरुस्त रखने की चिंता है।
💫जिम्मेदारों की मौज-मस्ती, बच्चों से खिलवाड़
सूत्रों की मानें तो अभियान के नाम पर निकलने वाली टीमें अक्सर औपचारिकता पूरी कर ‘मैदानी भ्रमण’ के नाम पर मौज-मस्ती में समय बिता रही हैं। संयुक्त टीम के बीच तालमेल का इतना अभाव है कि नतीजे शून्य दिखाई दे रहे हैं।
💫अधिकारियों का पक्ष:
मामले में जब श्रम प्रवर्तन अधिकारी से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा कि— “हमने कई जगहों पर छापेमारी की है और लोगों को जागरूक किया है।” (हालांकि, जब उनसे पुनर्वासन के ठोस आंकड़ों पर सवाल किया गया, तो उन्होंने चुप्पी साध ली।)
वहीं, एटीएचयू (AHTU) प्रभारी का कहना है कि— “हमारी टीम लगातार सक्रिय है, 8 बच्चों को रेस्क्यू किया गया है और आगे भी कार्रवाई जारी रहेगी।”
💫बड़ा सवाल: कब मिलेगी असली आजादी?
बस्ती को बाल श्रम मुक्त बनाने का सपना क्या केवल सरकारी फाइलों में ही पूरा होगा? क्या प्रशासन की नीयत वाकई इन मासूमों को न्याय दिलाने की है, या यह 15 दिनों का नाटक केवल बजट खपाने के लिए रचा गया था? शहर की जनता और समाज के जागरूक नागरिक अब सीधे सवाल पूछ रहे हैं— दिखावा बंद करिए, कार्रवाई दिखाइए!




















